दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
भोजन आवश्यक है वैसे ही बुद्धि के लिए सत्संग का भोजन
परमावश्यक है। ‘मुनिना तेन सत्कृतः’ मननशील महातपा मेधा
ने उन्हें उनके स्वरूप का बोध कराया । यही सत्कृतः' शब्द का
अर्थ है । उन्होंने कहा—‘‘तुम तो राजा हो, अजर, अमर, अवि-
नाशी असंग आत्मा हो। सभी इन्द्रियाँ तुम्हारे शासन में हैं।
जिस परिवार से तुम अपमानित हुए हो, जिस राज्य और कोष
से तुम अपने को वञ्चित (रहित) समझ रहे हो, वह तो तुम्हारा
था ही नहीं।
सपने होइ भिखारी नृप, राजा रंक ते होइ ।
जागे हानि न लाभ कछु, तिमि प्रपञ्च जिय जोइ ॥
स्वप्न में एक राजा भिखारी हो जाता है और भिखारी राजा
बन जाता है; किन्तु जगने पर वह पूर्ववत् अपना स्वरूप ज्यों का
त्यों ही देखता है। ठीक इसी तरह 'तुमने राज्य और परिवार
मेरा है' भूल से यह कल्पना कर ली थी। इसी कल्पना के कारण
तुम दुःखी हो रहे हो। माँ के पेट से आने पर भला कौन मेरा,
कौन तेरा होता है । ‘बीच ही मिले बीच ही छूट जावें। ऐसे
साथी, सामान के प्रति मोह करके दुःखी होना ना समझी है ।
बचपन में बताया अर्थ काम सत्य है ।
जवानी में बताया धरा धाम सत्य है ।
पक्षी जब पिंजड़े से उड़कर चला गया,
तब लोगों ने बताया राम नाम सत्य है ।
इन बातों का ही परिणाम है कि आज समाज में वयोवृद्ध
लोगों की अवहेलना हो रही है । यदि बचपन में बच्चों को यह
शिक्षा दी गई होती कि केवल अर्थ और काम ही सत्य नहीं है,
वरन् राम नाम भी सत्य है; तो बड़े होने पर बालक अपने बड़ों
का अपमान कदापि न करते ।
मेधा ऋषि ने राजा सुरथ को समझाया कि तुम जो यह
चिन्तन कर रहे हो—'मेरी रानी कैसी होगी, बच्चे कैसे होंगे,