दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(ग) यहाँ समाधि एक का अर्थ समाहित चित्त अधिक
अच्छा है।
(२) वैश्य - जैसे वर्ण-व्यवस्था में समाज के लिए
अत्यन्त उपयोगी है वैसे ही साधक जीवन में लाभप्रद हैं; जो
साधक अभी तक घर-द्वार-परिवार में आसक्त रहा, अब वहाँ से
ऊबकर साध्य को ओर जाना चाहता है वह वैश्य साधक है ।
'विशति साधना विशेषेषु' इस व्युत्पत्ति से यह अर्थ निष्पन्न होता
है । जो अपने भीतर सत्य, क्षमा आदि गुणों की रक्षा के लिए
सावधान है वह क्षत्रिय है और जो ब्रह्म-विज्ञान रस में निमग्न
होना चाहता है अथवा निमग्न है वह ब्राह्मण है । जो इन तीनों
साधकों की प्रेम और श्रद्धा से सेवा करता है वह शूद्र प्रकृति का
है । यद्यपि ब्रह्म-सूत्र भाष्य में 'शुचा द्रवति इति शूद्रः' शोक
ग्रस्त को शूद्र कहते हैं । इसी दृष्टि से सुरथ और समाधि दोनों
शोक-ग्रस्त होने से शुद्र ही हैं; तथापि यहाँ क्षत्रिय और वैश्य
बतलाये गये हैं । इसका अर्थ है राजा सुरथ अपने विकारों
को सावधानी से देख रहा है और उनसे बचने के लिए भी
आतुर है ।
समाधि ने भी राजा को अपनी चिन्ता का कारण अपने
पुत्र स्त्री आदि से अपमानित होना ही बताया उसने
कहा-मित्र ! घर-परिवार वालों से तिरस्कृत होकर निकाला
गया समाधि नाम का वैश्य मैं पुनः उन्हीं की कुशलता की चिन्ता
से व्यथित हूँ 'वे मेरे बेटे कहीं दुराचारी न हो जाएँ । यही गहरी
वेदना है ।" राजा ने कहा-प्यारे जैसे तुम वैसे ही हम, घबराओ
नहीं । स्वभाव से एक सी परिस्थिति वालों में शीघ्र मित्रता
हो जाती है ।
एक बार चार मूर्खों ने एक व्यास का सम्मान देखकर
सोचा-हम भी व्यास हो जायें, तो ऐसा ही सम्मान मिलेगा ।
बस, फिर क्या था, तुरन्त पीताम्बर धारण किये, चन्दन चर्चित