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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 68

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४४
यही वासना उसके वैराग्य को शिथिल कर देती हैं यदि इस
वासना का उपासना में परिवर्तन हो जाये, तो काम से हटकर
राम में लगा देती है ।
राजा एक आश्रम में पहुँचा । घोड़े से उतरकर आश्रम के
पवित्र वातावरण को देखने लगा, बहुत से महात्मा साधना में
संलग्न हैं ब्रह्मचारी वेद-ध्वनि कर रहे हैं, होम-धूम अपनी दिव्य
गन्ध समस्त दिशाओं में विकीर्ण कर रहा है, पशु-पक्षी निर्भय
निर्द्वन्द्व निर्वैर विचरण कर रहे हैं । यही आश्रम शब्द का अर्थ
भी है । 'श्रमु तपसि खेदेच' जहाँ धर्म और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ
होता हो वह आश्रम है; और जहाँ अर्थ, काम के लिए पुरुषार्थ
होता है उसे परिश्रम कहते है । आश्रम में अहिंसा की प्रतिष्ठा
होने के कारण निर्वैर भाव नैसर्गिक है । 'अहिंसा प्रतिष्ठाभ्यां
बैर त्यागः' यह निर्वैर भाव मैंने स्वयं देखा है ।
हमारे गुरुदेव पीताम्बरा पीठ दतिया (मध्य प्रदेश) में
प्रातः अपने कक्ष से निकलकर जैसे ही बाहर आते थे; और
प्रसाद वितरण करने लगते थे, वैसे ही कौआ, गिलहरी, बिल्ली
और कुत्ता चारों दौड़कर पृथ्वी पर पड़े प्रसाद को पाने लगते
थे । उनमें परस्पर किसी प्रकार का विरोध नहीं था । अपने -
अपने हिस्से का प्रसाद पा लौट जाते थे । एक बात यह और
निश्चित है कि भजन के परमाणु इतने प्रबल होते हैं कि भजनीय
स्थल आश्रम में विकारों का प्रभाव नहीं पड़ता है; जैसे अकेले
प्रह्लाद पर असंख्य दैत्य बालकों का प्रभाव नहीं पड़ा, अपितु
प्रह्लाद ने ही उपदेश देकर सबको प्रभावित कर लिया था । यही
आश्रम की विशेषता है ।
जिस पवित्र, शान्त, सुरम्य, सिद्ध स्थल पर 'सुरथ' जो
पहुँचे वह 'मेधा' ऋषि का आश्रम था । वे महर्षि बड़े तपस्वी
और धर्मनिष्ठ योगी थे । उन्होंने शान्त, क्लान्त एवं तृषार्त पथिक
को विश्राम दिया और मन को शान्त किया । जैसे शरीर के लिए