दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४६
घोड़े कैसे होंगे सो यह सब तुम्हारे राग के कारण हो रहा है।
इस राग को छोड़ो और भगवान् का चिन्तन करो।
आत्म-दर्शन से राग-द्वेष को मारने का सिद्धान्त भगवान्
ने गीता में भी दिया है। गीता के लगभग पन्द्रह-सोलह श्लोकों
में आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी, नित्य शुद्ध-प्रबुद्ध होने
का वर्णन है और देह नाशवान है अतः किसी प्रकार के शोक
का कारण केवल तुम्हारा राग ही है।
जितनी भी आकृतियाँ हैं वे सत् तत्व से भाषित हो रही
हैं, जितनी भी प्रतीतियाँ हैं वे चित् तत्व से और सुख की प्रती-
तियाँ आनन्द तत्व से भाषित हो रही हैं। बुद्धि में यह दृढ़
निश्चय होना चाहिए कि सभी देश में, सभी वेश, सभी काल में
एक परमात्मा ही दीख रहा है—
हर देश में तू, हर वेश में तू,
तेरे नाम अनेक तू एक ही है॥
तेरीं रंग भूमि यह विश्व - धरा,
हर खेल में, मेल में तू ही तू है॥
इस निश्चय के बनाये रखने पर अच्छी या बुरी परिस्थितियों
के आने पर मन सुखी दुःखी नहीं होगा। दिन में न जाने
कितनी बार सत्व, रज, तमोगुण सम्बन्धी नाना वृत्तियाँ आती
और जाती रहती हैं। इनके बदलने पर स्वयं को बदला हुआ
नहीं समझना चाहिए। शास्त्रों में बताई गई परम्परा को नष्ट
करने वाले इन राग-द्वेषादि से सदा ही सावधान रहना
चाहिए।
सावधान जाना ही होगा,
ओ आने वाले इतना समझ ले,
इस जग से तुमको जाना ही होगा।
यदि रह गई हैं कुछ वासनायें,
उनके लिए फिर आना ही होगा॥