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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 71, कुल 156 में से

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पृष्ठ 71

४७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब जाना निश्चय ही है फिर इन गीत पंक्तियों को अपना
कण्ठहार बना लेना ही जीवन को सफल बना लेना है—
हरि के भजन में, हो जा रे दीवाना । (टेक)
सपनों की दुनियाँ का, क्या रे ठिकाना ।
कब तक यह दुनियाँ तुझे अपनायेगी, अन्त में तेरे काम न आयेगी ।
झूठी है दुनियाँ, झूठे हैं सारे मीत, झूठी है रीति यहाँ झूठी है रे प्रीत ।
देख मेरे मनुवा, जाल में न आना, सपनों की दुनियाँ का, क्या रे ठिकाना ।
हरि के भजन में, हो जा रे दीवाना ।
इतना समझाने पर राजा सुरथ को आत्म-स्वरूप का कुछ
बोध हुआ, शान्ति मिली, किन्तु कुछ क्षणों तक ही होश रहा ।
“तस्थौ कंचित् स कालम्” और वहाँ से उठकर चल दिया ।
एक तो वासना के साथ गया था । दूसरी बाधा यह थी कि अभी
समाधि साथ नहीं है । समाहित चित्त होना और श्रद्धा दोनों सद्
सम्पत्ति हैं; इनके बिना उपदेश टिकता नहीं है । 'श्रद्धान्वितो
भूत्वा' का यही अर्थ है कि श्रवण के साथ मनन अत्यन्त अपेक्षित
है । तभी सुना हुआ सफल होता है, जब सुनने वाला समझना
चाहे । दृष्टान्त आपके समक्ष है । घनघोर युद्ध काल में श्रीकृष्ण
ने समझाया और अर्जुन ने समझ लिया, किन्तु सञ्जय ने धृतराष्ट्र
को एकान्त में, शान्त वातावरण में सुनाया तब भी कोई
फल नहीं हुआ ।
प्रायः साधकों के जीवन में भी ऐसा देखा गया है कि कुछ
क्षणों के लिए वैराग्य आ जाता है । कहा भी गया है—
चार ठौर सब नरन के कछु वैराग्य चढ़न्त ।
गर्भ माँहि, शव के निकट,
कथा सुनत, रति अन्त ॥
किन्तु यह श्मशानिया वैराग्य दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान के अभाव
में क्षणिक होता है । सांसारिक जीवों को इसो कथित उपर्युक्त
स्थिति का 'सुरथ' नाम के माध्यम दिग्दर्शन कराया है—