दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 67, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ें४३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“अमात्यैर्बलिभिर्दु ष्टै दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोशोवलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥”
इस मन्त्र से यही शिक्षा ग्रहण करनी है कि व्यवहार में
अन्तरंग दुष्टात्माओं से किसी भी प्रकार शत्रुता का भाव प्रकट
न होने दें । सुरथ के कोष लुटने का यही भाव है कि शारीरिक
और मानसिक सामर्थ्य समाप्त हो गई । मानव-शरीर में पांच
कोष होते हैं :-(१) अन्नमय कोष-(स्थूल शरीर) (२)
प्राणमय कोष-जिस शक्ति या एनर्जी से क्रियायें सम्पादित होती
हैं (३) मनोमय कोष-(इच्छा-शक्ति) (४) विज्ञानमय कोष
(बुद्धि शक्ति) जिससे सत्-असत्, उचित, अनुचित का निर्णय
किया जाता है । (५) आनन्दमय कोष-जिसके द्वारा सुख की
प्रतीति होती है ।
ये पाँचों कोष आत्मा के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं ।
इन सबका शासक, राजा जीवात्मा है । वही सुरथ है; किन्तु जब
वह अपने को सामर्थ्यहीन, दीन दुर्बल, कंगाल समझने लगता है
तो उसे अपना ही जीवन भार प्रतीत होता है, और सोचता है
कि समाज के सभी लोग हमसे चाहते हैं न कि हमको, सुरथ
की यह अवस्था सभी की है । अब बेचारा स्त्री, पुत्रादि से
अपमानित होने पर घोड़े पर बैठकर बन की ओर चल दिया ।
‘वन-षण सम्भक्तौ’ वन का अर्थ भजनीय स्थान होता है । प्रायः
व्यक्ति ऐसी अवस्था में वैराग्य प्राप्त करता है । जबतक समाज
तथा संसार से निराशा नहीं होती, तब तक भगवान् की ओर कोई
नहीं चलता । इसी से जिन परिवारों में स्त्री-पुत्रादि से बहुत
सुख मिलता है; उन परिवारों में पूर्वज लोग “चौथेपन जाइये नृप
कानन” की बात भूल जाते हैं । सुरथ घर से निकला हुआ
अकेला ही समझ रहा है; किन्तु वासना रूपी घोड़े पर बैठ
कर गया है; तब भला एकाकी कैसे ? ‘एकाकी हयमारुह्य
जगाम गहनं बनम्, विचार करने से विदित होता है कि
साधना स्थल की ओर बढ़ते समय यह वासना साथ नहीं छोड़ती ।