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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 58

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३४
का प्रयोजन है । एक बात और ध्यान देने की है, जिससे कुछ
लिया जाये, उसके प्रति कृतज्ञता अवश्य व्यक्त करनी चाहिए ।
आजकल तो कृतज्ञता-ज्ञापन का अभाव होता जा रहा है । जिन
गुरुजनों से कुछ भी मिला है, उनके प्रति कृतज्ञता अर्पित करना
तो सामान्य धर्म-मात्र है, सर्वस्व समर्पण ही परम धर्म है । मातृ
देवो भव, पितृ देवो भव, आचार्य देवो भव । श्रुति भगवती के
ये वचन उक्त कथन का ज्वलन्त प्रमाण है । अपने गुरुजनों के
दोषों को छिपाने वाला ही तो छात्र है । 'वातस्तप वर्षाभ्यः
त्रायते इति छत्रम्, तथा छत्र शीलमस्य इस विग्रह में छत्रादिभ्योऽणः'
सूत्र से छात्र शब्द निष्पन्न होता है । तथ्य यह है कि जैसे छाता
सर्दी, गर्मी तथा वर्षा से रक्षा करता है ऐसे ही छात्रों को गुरु-
जनों की सेवा करनी चाहिए । ग्राह्य सारमपास्य फल्गु के
सिद्धान्तानुसार उनके दोषों को ढाँकना और गुणों को ग्रहण
करना चाहिए । इस कल्याण कारिणी परम्परा को चिर-अक्षुण्ण
बनाये रखने के लिए मैं हृदय से ब्रह्मा जी तथा माँ काली को
कृतज्ञता अर्पित करता हूँ । ये दोनों इस अध्याय में प्रमुख हैं ।
इसमें 'गायत्री छन्द से भी शिक्षा मिलती है, कि सद्बुद्धि मिले
'धियो यो नः प्रचोदयात्' सभी मंत्रों में गायत्री की श्रेष्ठता इसी
इसी कारण है कि इसमें सद्बुद्धि मांगी गई है । कितनी भी
अच्छी कार, सुन्दर प्रशस्त राज पथ हो, किन्तु ड्राईवर बोतल
पीकर बैठा हो तो क्या परिणाम होगा, आप सोचें ।
अतः चालक - सारथि रूपी बुद्धि का अच्छा होना
सर्वोपरि है ।
गीता में स्पष्ट है :—
इन्द्रियाणां हि चरतां यन्मनोऽनु विधीयते ।
तदस्य हरति प्रज्ञां वायुर्नावमिवाम्भसि ॥ गीता २/६७
यदि इन्द्रियों के अनुसार मन चलेगा तो बुद्धि डगमगा
जायेगी अतः भगवान् श्रीकृष्ण भी बुद्धि की शरण में जाने की
प्रेरणा देते हैं और स्थिर प्रज्ञ होने की दीक्षा देते हैं ।