दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
पृष्ठ 64, कुल 156 में से
संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४०
(१) सूर्य-पुत्र (ज्ञान, कर्म, उपासना में पूर्ण समर्थ)
(२) मनन-श्रद्धा सम्पन्न (३) समस्त सिद्धियों से युक्त
(४) परमात्मा का वंशज (५) सुरथ-समस्त योनियों में श्रेष्ठ
शरीर (६) परम स्वाधीन इन्द्रियों का प्रकाशक (७) राजा-
मन, बुद्धि, इन्द्रियों का शासक (८) पाप-पुण्य पैदा करने
वाला ।
आठ विशेषण सम्पन्न होने पर भी यह अपने को कैसे
दुःखी और कंगाल समझ लेता है-यही मोह लीला का खेल है।
जिस पराम्बा की कृपा से 'महामायानुभावेन यथा मन्वन्तराधिपः'
सर्वश्रेष्ठ राजा होता है। उस कृपा का अनुभव न करके कंगाल
बन जाता है। कहा है-कबहूँक कर करुणा नर देही, देत ईश
बिन हेतु सनेही (मानस)
महामाया प्रभावेण संसार स्थिति कारिणा ।
तन्नात्र विस्मयः कार्यो योगनिद्रा जगत्पतेः ॥ प्रथम ॥५४
आश्चर्य मत करो, यदि कोई राजकुमार अपने को भिखारी
के साथ रहने से भिखारी दास समझ कर दर-दर मांगता घूमे,
तो इसमें पराम्बा का क्या दोष ?
'क्षिति मण्डले'-क्षिति मण्डल का संकेत मूलाधार से है।
अर्थात् पैर के अंगूठे से सिर तक सभी का राजा है - प्रजा पालन
में तत्पर है। प्रजा शब्द से विद्वानों ने भावों को भी ग्रहण किया
है 'प्रकृष्ट रूपेण जायते' इस अर्थ में अपने बनाये मनो राज्यों का
पालन करता है। और यह भी अर्थ है कि व्यवहार में जो
परिवार-समाज मिला है। उसके प्रति स्नेह-प्रेम, सद्भाव पूर्ण
कर्तव्य का निर्वाह कर रहा है। संसार रंगमंच पर प्रत्येक सुरथ
ही सूत्रधार के इशारे से अपना-अपना अभिनय कर रहा है।
कौन किस रूप में निर्वाह कर पाता है यह तो वही जाने। व्यव-
हार में परस्पर सद्भाव प्रेम और सौहार्द आवश्यक है किन्तु यह
पूर्ण निश्चय रहे कि यह रङ्गमंच है। वास्तविक सम्बन्ध पात्रों