दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ३८
सत् तत्व में ही कर्म-लीला होती है। पैर गति तथा हाथ कर्म
वाचक है। जहाँ जो कुछ, जैसे भी हो रहा है, होगा और हुआ,
सब कुछ करुणामयी माँ ही हैं। ये भाव धारण करना चाहिए।
इसी माँ को नमन कर प्रारंभ करते हैं। इसमें तीन प्रकरण हैं-
(१) मधु-कैटभ (राग-द्वेष) जन्म (२) ब्रह्मा जी को अभय
प्राप्ति (३) दैत्य-संहार ।
मार्कण्डेय ऋषि कहते हैं-कथा माध्यम से जीव मात्र
का परिचय सुनिए-
सावर्णि सूर्यस्तनयो यों मनुः कथ्यते ऽष्टमः......।
स्वरोचिषेऽन्तरे पूर्वं चैत्र वंशं समुद्भवः ।
सुरथो नाम राजाभूत् समस्ते क्षिति मण्डले ।
आठवें मनु सूर्य के पुत्र सावर्णि की उत्पत्ति कथा विस्तार
से कहता हूँ। सूर्य कुमार महाभाग सावर्णि भगवती महामाया के
अनुग्रह से जिस प्रकार मन्वंतर के स्वामी बने वही प्रसङ्ग
सुनाता हूँ। पूर्वकाल में स्वरोचिष मन्वन्तर में चैत्र वंश में सुरथ
नाम का राजा उत्पन्न हुआ, जिसका समस्त भूमण्डल पर अधि-
कार था।
आठों सिद्धियों से युक्त स्वरोचिष मन्वन्तर में दसों दिशाओं
का स्वामी सुरथ नाम का राजा प्रत्येक जीव ही तो है, जरा इसे
यूँ समझना चाहिए-
(१) सूर्य पुत्र कहने का तात्पर्य है कभी न थके, कभी न
रुके, निरन्तर गतिशील, परम प्रकाशमय स्वरूप, निष्पक्ष कर्म-
शील सूर्य हैं। देखो वेद में भगवान् कहते हैं-सूर्यस्य पश्य श्रेमाणं
यो न तन्द्रयते चरंश्चरैवेति । ऐतरेय ब्राह्मण ३३, ३.५ सूर्य की
विशेषता - निरन्तर परिश्रम - आगे बढ़ते रहना। अतः तुम भी
जीवन में आगे बढ़ो, बढ़ते चलो, यही आपको शिक्षा लेनी है।
भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम् । गीता ४/१