दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६८
मेरे कहने से ही शुंभ निशुंभ के पास चली जाओ, अन्यथा
अपमानित होकर जाना पड़ेगा । इसे सुनकर भगवती ने कहा-
मैंने बिना विचारे यह प्रतिज्ञा कर ली है । इसका निर्वाह मुझे
करना ही होगा ।” तुम उस दैत्यराज से आदर पूर्वक कह देना,
जैसा उचित समझेंगे वैसा करेंगे ।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ।
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः ।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत् ॥ ५/१२८-१२६
शुम्भ-निशुम्भ की आसक्ति और जगदम्बा की प्रतिज्ञा पर
आप लोग विचार करें-शुम्भादि का आकृष्ट होना कोई बड़ी
बात नहीं । भगवान् के मोहिनी रूप को देखकर असुर ऐसे मुग्ध
हुए कि बेचारे हाथ में आये हुये अमृत को हाथ से खो बैठे;
और पी न सके, क्योंकि सौन्दर्य सम्पदा ही भगवती लक्ष्मी का
रूप है “श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे, नक्षत्राणि
रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुं
म इषाण सर्वलोकं म इषाण ।
(यजुर्वेद अ. ३१ कण्डिका २२)
महीधर ने इस मंत्र में ‘श्री’ शब्द का अर्थ ‘सम्पदा’ किया
है । इसी से मनुष्य आश्रयणीय होता है । लक्ष्मो शब्द का अर्थ
सौन्दर्यं किया है इसी से लोगों की दृष्टि आकृष्ट होती है ।
जिसको हर कोई चाहे, आकृष्ट होकर सब जिसकी ओर दौड़ें,
उसी को लक्ष्मी कहते हैं; किन्तु यह शक्ति, शोभा, सम्पदा, श्री,
लक्ष्मी, वैभव जिसको मिलता है यह देवी स्वयं अपने मुख से
कह रही है- ‘यो मां जयति संग्रामे’ जो मुझे संग्राम में जीतेगा ।
“संग्राम में कौन विजयी होता है ? एक जनपदीय मल्ल
(पहलवान) प्रान्तीय मल्ल से, प्रान्तीय मल्ल राष्ट्रीय मल्ल से
हार ही जायेगा और श्रृंखला क्षेत्रीयता के विस्तार से जय-
६६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पराजय में परिणत होती जायेगी। जो किसी से पराजित हो
जाये वह विजयी कैसा ? अतः महाशक्ति के वरण करने वाला
शूरवीर ऐसा होना चाहिए; जिसे कोई कभी कहीं भी पराजित
न कर सके, न हो सके । और वह है केवल 'जितेन्द्रिय पुरुष' ।
“इन्द्रियाणां जयेच्छूरः”, “न रणे विजयाच्छूरः” यह शास्त्र
दृष्टान्त भी है-(मेघनाद के वध होने पर उसकी सती पत्नी द्वारा
भुजा में पकड़ाई चाक - मिट्टी के द्वारा लिखित वर्णन के माध्यम
से) स्वयं मेघनाद ने अपनी पत्नी को लक्ष्मण की प्रशंसा करते
हुए लिखा है मैं 'इन्द्रजीत' तो हूं, किन्तु लक्ष्मणजी 'इन्द्रियजीत'
हैं। इसी कारण मैं उनसे परास्त हो गया हूँ इन्द्रिय-विजयी
ही अपने ज्ञान-विज्ञान द्वारा रक्षित रह सकता है। अतः भगवान्
श्रीकृष्ण अर्जुन को संग्रामजेता बनने के लिए इन्द्रियों पर विजय
पाने का दिव्य संदेश देते हुये कहते हैं :-
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञान विज्ञान नाशनम् ॥ गीता ३/४१॥
कामनाएँ ही ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करती हैं। पहले
इन्द्रियों को संयमित करो, तभी विजय मिलेगी तथा यो मे दर्पं
व्यपोहति जिसने अभिमान नष्ट कर लिया है। यस्य नाहंकृतो
भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । गीता १८/१७ अभिमान रहित बुद्धि
ही शक्तिशाली होती है। “यो मे प्रतिबलो लोके” (जो मेरे बल
के समान बलशाली हो) नारायण के अतिरिक्त महाशक्ति के
बराबरी वाला और कौन हो सकता है, केवल नारायण ही होंगे,
यह ज्ञान होना चाहिये ।
दिव्य-शक्तियों की उपलब्धियों के अनेक दृष्टान्त भारतीय
आर्ष ग्रन्थों में प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। आधि दैविक शक्ति
प्राप्ति का उदाहरण कुन्ती हैं। उन्होंने अपने तपोभूत मन से
जिसका आह्वान किया, वही उपस्थित हुआ चाहा तो सूर्य को
आहूत किया, चाहे तो धर्म को। आधि भौतिक शक्तियों का पुंज
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १००
भरद्वाज मुनि के इंगित पर नृत्य करता है। जब भरत जी अपने
पूज्य पिता जी के और्ध्वदैहिक संस्कारोपरान्त गुरुजनों की अनुमति
से श्रीराम जी को वन से अयोध्या लौटा लाने के लिये चित्रकूट
को प्रस्थान करते हुए, मार्ग में भरद्वाज मुनि के आश्रम में ससैन्य
परिकर एवं परिवार सहित रात्रि में विश्राम करने के लिए ठहरे;
तब मुनि के द्वारा क्षणभर में समस्त सुख सुविधा उपस्थित
करदी गईं हैं।
इससे स्पष्ट है कि संयमी, निरभिमानी तथा ज्ञानी के लिए
ये महाशक्तियाँ सहज सुलभ हैं।
१०१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
षष्ठोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ नागाधीश्वर विष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली
भास्वद्देहलतां दिवाकर निभां नेत्रत्रयोद्भासिताम् ।
मालाकुम्भ कपाल नीरजकरां चन्द्रार्धचूड़ां परां
सर्वैज्ञेश्वर भैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये ॥
जगज्जननी जगदम्बा जगदीश्वरी नागराज शेष के आसन
पर विराजमान है, उनकी देहलता नागों के फणों में देदीप्यमान,
मणियों की सुन्दर भव्य माला से दीप्तिमान हो रही है, उन सूर्य
के समान तेजस्विनी के तीनों नेत्र उनके सौन्दर्य की और भी
अभिवृद्धि कर रहे हैं । उनके हाथों में माला, कुम्भ, कपाल और
कमल सुशोभित हैं, तथा मस्तक पर अर्द्ध चन्द्र-मुकुट जिनके
सौन्दर्य-माधुर्य में चार-चांद लगा रहा है, सर्वैज्ञेश्वर भैरव के
अङ्क में निवास करने वाली ऐसी परमोत्कृष्ट पद्मावती देवी का
मैं चिन्तन करता हूँ ।
इस छठे अध्याय में यह वर्णन है उस सुग्रीव दूत से शुम्भ
ने भगवती की यह प्रतिज्ञा सुनकर दैत्यराज धूम्रलोचन को उस
सुन्दरी को पकड़कर लाने का आदेश दिया; किन्तु आसुरी भाव
वाला दैत्य बेचारा महाशक्ति को कैसे ग्रहण कर सकता है ?
धूम्र लोचन-जिसके नेत्रों में काला धुआं भरा हो अर्थात् दृष्टि ही
धुँधली हो गई । मानसकार के अनुसार "ज्ञान-विराग नयन
उरगारी" नेत्र तो ज्ञान और वैराग्य ही होते हैं । श्रुति-स्मृति भी
नेत्र बताये गये हैं, इसमें ये किसी प्रकार के लक्षण नहीं हैं ।
उसके लिए महाशक्ति का स्पर्श तो दूर सम्मुख उपस्थित होना
भी असम्भव है । ऐसा ही हुआ,
"हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः । ६/१३
माँ ने हुङ्कार मात्र से उसे भस्मीभूत कर दिया । धूम्र-
लोचन के मरने की सूचना पाकर शुम्भ ने चण्ड-मुण्ड को भेजा ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०२
नमो नमो अम्बे
नमो नमो दुर्गे सुख करनी, नमो नमो अम्बे दुख हरनी ।
शशि ललाट मुख महा विशाला, नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।
तुम संसार शक्ति लय कीना, पालन हेतु अन्न धन दीना ।
अन्नपूर्णा हुई तू जगपाला, तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।
शिव योगी तुम्हारे गुण गावे, ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।
धर्यो रूप नरसिंह को अम्बा, प्रकट भई फाड़ के खम्बा ।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो, हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ।
महिषासुर नृप अति अभिमानी, जेहि अघ भार मही अकुलानो ।
रूप कराल काली को धारा, सेन सहित तुम तिहि संहारा ।
ज्वाला जी में ज्योति तुम्हारी, तुम्हें सदा पूजें नर नारी ।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें, दुःख दारिद्रय निकट नहिं आवें ॥
ध्यावें तुम्हें जो भी मन लाई, जन्म-मरण ताको छुटि जाई ॥
१०३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सप्तमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीम् ।
न्यस्तैकांघ्रिं सरोजे शशिशकलधरां बल्लकीं वादयन्तीम् ॥
कह्लाराबद्धमालां नियमित बिलसच्चोलिकां रक्त वस्त्राम् ।
मातङ्गी शंख पात्रां मधुर मधुमदां चित्रकोद्भासि भालाम् ॥
मैं रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान होकर तोते द्वारा
पठित सुन्दर मधुर शब्द सुनती हुई, अङ्गों की श्यामल कान्ति से
कान्तिवान, अपना एक चरण कमल पर रखकर, ललाट में अर्द्धचन्द्र
तथा कण्ठ में कह्लार पुष्पों की माला धारण किये हुये वीणा
बजा रही हैं; जो रक्त-वर्ण (लाल रंग) की साड़ी पहने हुए है
उसी रंग की कञ्चुकि जिनके अङ्गों में कसी हुई शोभा पा रही
हैं, हाथ में शङ्ख भरा पात्र लिये हैं, जिनके मुख पर मधु का
हल्का सा प्रभाव भाषित हो रहा है, ललाट में मङ्गल-चित्र
बिन्दी शोभित किये हुये हैं उसी मातङ्गी देवी का ध्यान
करता हूँ ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-हे राजन् ! शुम्भ की आज्ञा
पाकर वे चण्ड-मुण्ड आदि दैत्य चतुरङ्गिणी-(पैदल, रथ, हाथी,
घोड़े) सेना साथ ले, अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी पर
आक्रमण करने के लिए चल दिये । गिरिराज हिमालय के
सुवर्णमय उच्चशिखर पहुँचकर उन्होंने मन्द-मन्द मुस्कराते हुए
सिंह-वाहिनी को देखा, तो अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करते हुए
चारों ओर उस देवी पर टूट पड़े ।
तब अम्बिका ने शत्रुओं पर क्रोध किया तो उनका मुख
काला पड़ गया, ललाट में भौंहें टेढी हो गयीं और वहाँ तुरन्त
विकराल काली प्रकट हुईं जो तलवार, पाश और खट्वाङ्ग
धारण किये ये, चीते के चर्म की साड़ी पहने हुये, नर मुण्डों
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०४
की माला से विभूषित थी। मांस रहित अस्थि-पंजर, विशाल
मुख लपलपाती हुई जीभ, डरावनी लाल-लाल भोतर धँसी हुई
आँखें, भयंकर गर्जना करती, अनेक दैत्यों का वध करती,
कुछ को मुँह के द्वारा चबाती हुई, अस्त्र-शस्त्रों को चूर्णित
करती हुई, हाथी घोड़ों को मुँह में डालती सैन्य संहार करने
लगी। तब कुपित होकर दैत्य सेनापति चण्ड-मुण्ड विपरीत दिशाओं
से माँ पर टूट पड़े। दोनों के चक्रों से छुटे हुये बाणों को मुख
में लेकर काली देवी ने भयंकर गर्जना की और खड्ग-से 'हं' का
उच्चारण कर केश पकड़ कर पहले चण्ड का मस्तक काट लिया,
उसे मरा हुआ देख मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा । उसे भी रोष
में भर देवी ने धरती पर सुला दिया। तत्पश्चात् काली ने उन
दोनों के मस्तक हाथ में लेकर चण्डिका के पास जाकर प्रचण्ड
अट्टहास करते हुए कहा—देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड दोनों
महापशुओं को भेंट किया है अब युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और
निशुम्भ का वध स्वयं करना।
चडि कोपे, क्रोध अर्थ में प्रयुक्त होने वाली धातु से :चण्ड'
शब्द प्रतिपादित होता है इसी से चाण्डाल भी बनता है। 'मुडि'
खण्डने से मुण्ड बनता है; खण्डन करने में अश्रद्धा और द्वैत
भाव का होना अनिवार्य है। क्रोध भाव से चाण्डाल के आचरण
होते हैं। क्रोध आने का मूल कारण द्वैत भाव ही है और
द्वैत भाव का जनक अज्ञान ही है । इष्ट पर दृढ़ता करने
के कारण काकभुशुण्डी को लोमश ऋषि के शाप का भाजन
होना पड़ा, किन्तु क्षमा और सहिष्णुता गुणों के द्वारा ही पुनः
ऋषि के कृपा भाजन बन गये ।
उपर्युक्त दृष्टान्त चण्ड-मुण्ड के वध के व्यावहारिक प्रयोग
है। इस अध्याय में माँ काली के द्वारा जो चंड मुंड का वध किया
गया है। वे ये क्रोध रूप चंड और द्वैत बुद्धि रूप मुंड हैं
साधक को इनका बड़ा ध्यान रखना चाहिए । जो इन दोनों
का वध कर लेता है उसे जगत् में ख्याति मिलती है। **
१०५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
अष्टमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशांकुश बाण चापहस्ताम् ।
अणिमादिभिरावृत्तां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
मैं गौर वर्णाङ्गाभामयी, करुणा तरङ्गायित नयना, पाश,
अंकुश, बाण और धनुष हाथ में धारण करने वाली अणिमा
आदि सिद्धियों की किरणों से आवृत्ता भवानी का चिन्तन करता
हूँ।
महर्षि कहते हैं कि चण्ड-मुण्ड दैत्यों के मारे जाने तथा
उनकी सेना के संहार के संदेश से दैत्यराज शुम्भ बड़ा क्रोधित
एवं क्षुभित हुआ और उसने सम्पूर्ण दैत्य सेना को युद्ध के लिए
प्रस्थान करने की आज्ञा दी। उसकी सेना का संकेत-अपनी
सेनाओं सहित उदायुध नाम के छियासी सेनापति, कम्बु नाम
वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक सवाहिनी, कोटिवीर्य कुल के
पचास और धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति अपनी-अपनी सेना
के साथ तथा कालक, दौर्हद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध
के लिए प्रस्थित हुए। इस भयंकर विशाल वाहिनी को देख
चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार, शंख की ध्वनि तथा सिंह की
दहाड़ की ध्वनि से आकाश पृथ्वी को गुँजित कर दिया, घण्टे की
ध्वनि दिशाएँ ध्वनित करने लगी। काली ने उस भयानक ध्वनि
से अपना मुख बढ़ा लिया। इसी बीच असुरों के विनाश और
देवताओं के अभ्युदय के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा
इन्द्र आदि देवों की शक्तियाँ-जो रूप, वेश भूषा, वाहन, बल,
पराक्रम और आयुधों में अपने-अपने देवताओं के समान थी,
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०६
उनके शरीरों से निकलकर चण्डिका की सहायता के लिए दैत्य-
दलन हेतु समरांगण में आ गईं ।
बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, दैत्यों की वाहिनी प्रातः कालीन ओस
की बूँदों की तरह विनष्ट हो रही थी, तभी रक्त बीज इन्द्र की
शक्ति ऐन्द्री के वज्र से घायल हो गया । उसकी प्रत्येक रक्त-बूँद
से उसी के समान बल-पराक्रम सम्पन्न आयुधों से युक्त भयंकर
राक्षस वीर पैदा होकर मातृकाओं को मारने लगे ।
यावन्त पतितास्तस्य शरीराद्रक्त विन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद् वीर्यबल पराक्रमाः ॥ ८/४४
ज्यों-ज्यों इस रक्तबीज के शरीर पर प्रहार होता, रक्त-
पतन से अनेक असुर वर्षा में पैदा होने वाले जीवों की तरह पैदा
हो कर लड़ने लगते । इस दृश्य से देवता बड़े भयभीत हुए । उन्हें
उदास देखकर चण्डिका ने काली को अपने शस्त्रपात से गिरने
वाले रक्त विन्दुओं और उनसे उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को मुख
से भक्षण करने का आदेश दिया । चामुण्डा की इस प्रक्रिया से
महा भयावह रक्तबीज युद्ध में मारा गया । देवताओं को अनुपम
हर्ष प्राप्त हुआ । मातृ-गण नृत्य करने लगा ।
इस अध्याय में रक्तबीज वध का प्रसङ्ग बड़ा शिक्षा प्रद
एवं महत्त्वपूर्ण है । बड़ा सुन्दर संकेत है—यह 'रक्त-बीज'
इच्छाओं का नाम है । मनुष्य की इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं
होती हैं । प्रत्येक इच्छा सगर्भा होती है जैसे ही एक इच्छा
समाप्त होती है वैसे ही उससे भी अधिक प्रबल इच्छा पैदा हो
जाती है । इससे विषयों की अभिलाषा नष्ट करना साधक के
लिए कितना कठिन है । यह इस प्रसङ्ग से समझ सकते हैं ।
इन्द्रियाँ अथवा करण तो चौदह हैं; परन्तु प्रत्येक करण के विषय
अनन्त हैं । उनका पार पाना बहुत कठिन है । जैसे रक्त बीज
के रक्त की एक बूँद में जब इतनी प्रबलता है भला बताइए
कितनी बूँदें हुई होगी । यही असंख्य शब्द का प्रयोग विषयों की
१०७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
वासनाओं के लिए है । इनके मारने का उपाय यही है कि रक्त
बीज के रक्त की बूंद पृथ्वी पर न गिर सके, यह कार्य महाकाली
को सौप दिया, जिसने उसे सम्पन्न किया । विषयासक्ति रक्त-
बोज के मरने पर ही शान्ति को प्राप्त होती है ।
श्री अम्बे जी की आरती
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली.
तेरे ही गण गायें भारती ।
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती ॥ १
तेरे (जगत के) भक्तजनों पर भीड़ पड़ी है भारी,
दानव दल पर टूट पड़ो करके सिंह सवारी,
सौ-२ सिंहों सी बलशाली, अष्टादस भुजाओं वाली,
दुष्टों को तो तू ही संहारती ॥ २ ओ मैया हम सब
माँ बेटे का इस जग में, बढ़ा ही निर्मल नाता ।
पूत कुपुत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता ।
सब पर अमृत बरसाने वाली, सबको हर्षाने वाली-
मैया भँवर उतारती-ओ मैया सम सब उतारें-
नहीं मांगते धन और दौलत, ना मांगे चांदी ना सोना,
हम तो मांगे माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना,
सब पर करुणा दर्शाने वाली, विपदा मिटाने वाली
सतियों के सत को संवारती ॥ ओ मैया सब
चौदस के दिन तेरे भवन में, भीड़ लगी है भारी ।
जो कोई माँगे सोई फल पावे, कोई न जाये खाली ।
सब की झोली भरने वाली, मांगी मुरादों वाली ।
ओ मैया हम सब उतारें तेरो आरती ॥
खनन-खनन घण्टा बाजे, घण्टों की झन्कार ।
तेरे भवन में मैया तेरी हो रहा जय-जय कार ॥
द्वार खड़े माँ तुझे पुकारें, एक बार तो आजा ।
भक्त खड़े, माँ तुझे पुकारें आकर दर्श दिखाजा ॥
अम्बे तू है जगदम्बे कालो, जय दुर्गे खप्पर वाली
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैय्या हम सब उतारें०
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०८
नवमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बन्धूक काञ्चननिभं रुचिराक्षमालां
पाशांकुशौ च वरदां निजवाहुदण्डैः ।
विभ्राणमिन्दु शकलाभरणं त्रिनेत्र
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥
बन्धूक-दुपहरिया पुपहरिया पुष्प की रक्तिमा-लालिमा
तथा स्वर्ण की पीतिमा की कान्ति से सुशोभित अर्द्ध नारीश्वर
के श्री विग्रह की शरण लेता हूँ; जो अपनी भुजाओं में सुन्दर
अक्षमाला, पाश, अंकुश और वरद मुद्रा धारण किये हुए हैं;
जिसके ललाट पर अर्द्ध चन्द्र का आभूषण आभूषित है और तीनों
नेत्रों से सुशोभित है ।
मधु-कैटभ का वध हो या धूम्रलोचन का ध्वंस, अथवा
चण्ड-मुण्ड संहार या फिर रक्तबीज के रक्त-पान से विनाश,
इन सब का उद्धार हुआ करुणामयी माँ के हाथ से। यह दैवी
कृपा का विधान है कि जिसे हम लय, प्रलय, विनाश, ध्वंस
कहते हैं वह कष्टों से, दुःखों से मुक्ति है। इसी में लोक-कल्याण
निहित है, अतः प्रत्येक मङ्गलाकांक्षी को भगवती का ध्यान
करना चाहिए ।
भगवती के चरित्र-लीला के आनन्द में निमग्न जिज्ञासु
राजा ने महामति मेधा से विनत भाव से कहा—भगवन् ! आपके
द्वारा रक्त-बीज के वध से सम्बन्धित देवी-चरित्र की यह अद्भुत
महिमा जानकर बड़ी उत्सुकता हो रही है कि इसके पश्चात्
क्रोध में भरे हुए शुम्भ-निशुम्भ ने क्या किया; सुनना चाहता
हूँ ।
महामुनि मेधा ने बताया—राजन् ! जन-धन-बल का संयोग
जैसे मनुष्य को खुशी देता है उसी प्रकार इनका वियोग महा
१०६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दुःखदायो बन जाता है, वह क्रोध में आग बबूला हो जाता है ।
अतः स्वाभाविक था कि रक्त बीज जैसे सेनापति तथा विशाल
सेना के मारे जाने पर शुम्भ-निशुम्भ का बौखला जाना
स्वाभाविक था । विमर्ष में भरकर निशुम्भ देवी की ओर दौड़ा ।
इसके साथ विशाल दैत्य सेना थी । शुम्भ भी मातृगणों से युद्ध
करके चण्डिका को मारने आ पहुँचा । दिव्य अस्त्रों से भयंकर
युद्ध हुआ । निशुम्भ ने तीखी तलवार से देवी के वाहन पर प्रहार
किया, फिर क्या था ? माँ ने उसके अनेक प्रहारों को अपने रण-
कौशल से छिन्न-भिन्न कर दिया । काली ने दोनों हाथों के आघात
से पृथ्वी को हिला दिया । शिवदूती ने दानवों के लिए अमंगल-
कारी अट्टहास किया, देवों ने जय-जयकार किया, इसी उपयुक्त
अवसर पर देवी ने राक्षस शुम्भ पर अपना शूल चला दिया, वह
मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
भाई के पतन को निशुम्भ सहन न कर सका, उसने अपने
बाणों से देवी, काली तथा सिंह को घायल कर दिया । दुर्गम
पीड़ा विनाशिनी दुर्गा ने कुपित होकर उसके बाणों और चक्रों
को काट कर अपने शूल से उसकी छाती विदीर्ण कर दी, जिससे
दूसरा महाबली पुरुष निकल कर देवी को ललकारने लगा, देवी
ने ठठाकर हँसते हुए तीक्ष्ण खड्ग से उसका सिर काट डाला ।
सिंह ने दैत्यों की गर्दन नोची, कालिका ने अनेक दैत्यों का भक्षण
किया । वैष्णवी ने चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए । शेष
भाग गये । इस प्रकार निशुम्भ का वध हुआ ।
इस युद्ध से विदित हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा
इनकी शक्तियाँ-ब्रह्माणी, रुद्राणी, वैष्णवी, कालिका, दुर्गा सभी
एक हैं; इस एक तत्व की उपासना ही लक्ष्य होना चाहिए चाहे
इष्ट किसी भी स्वरूप को बनायें ।
दूसरी बात यह है कि निशुम्भ की छाती से दूसरे पुरुष का
पैदा होकर पुनः देवी को ललकारने का तात्पर्य यह है कि चित्त
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११०
से आसुरी वृत्तियाँ संयम, नियम के द्वारा नियंत्रित करने पर
भी पैदा हो जाती है, जो हमारी दैवी वृत्तियों को निगलना
चाहती है । अतः साधक को सजग रहना चाहिए, माँ की शरण
लेनी चाहिए । माँ के निम्न मंत्र से सब मनोरथ पूरे हो सकते
हैं-
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ कवच ४४ ॥
माँ की शरण में पहुँचने पर मनुष्य की निश्चित ही समस्त
कामनायें पूर्ण होती हैं और वह परम ऐश्वर्य का भागी होता है ।
अतः माता की शरण लेना जीवन की सार्थकता है ।
१११ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दशमोऽध्याय
ध्यानम्
ॐ उतप्त हेम रुचिरां रवि चन्द्र वह्नि-
नेत्रां धनुश्शर युताङ्कुश पाश शूलम् ।
रम्यैर्भुजैश्चदधतीं शिव शक्ति रूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
मैं तपाये हुए स्वर्ण के समान सुन्दर, सूर्य, चन्द्र और
अग्नि तीनों नेत्र वाली; अपनी सुन्दर भुजाओं में धनुष, वाण
अंकुश, पाश और शूल धारण किए तथा मस्तक पर अर्द्धचन्द्र
धारण किए हुए शिव शक्ति-शक्ति स्वरूपा कामेश्वरी का हृदय
में चिन्तन करता हूँ ।
खोट निकालने के लिए सोने को अग्नि में तपाया जाता
है, अतः देहाभिमान को गलाने के लिए साधना की अग्नि में
रहना चाहिए । रवि - चन्द्र वह्नि, क्रमशः प्रकाश,
आह्लादक एवं दाहक एवं पाचक है, प्रकाश के तीन ही आधार
है, घिना प्रकाश के अन्धकार विलीन हो नहीं सकता, सबकी
प्रकाशिका एक मात्र सच्चिदानन्दमयी माँ ही हैं, वे ही भक्त
पर रीझकर समस्त कामनायें-पूर्ण करती हैं अतः कामेश्वरी हैं
उन्हीं का ध्यान करना अपेक्षणीय है ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-राजन् ! अपने प्राणों के
समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सेना का
संहार जान संहार जान शुम्भ कुपित होकर बोला-“दुष्ट दुर्गे !
तू बल के अभिमान में बड़ी मानिनी बनी हुई है ।” किन्तु दूसरी
स्त्रियों का बल लेकर लड़ती है । माँ ने कहा-‘अरे धूर्त' मैं अकेली
ही हूँ, मेरे सिवा संसार में दूसरा कौन है, ये सब मेरी विभूतियाँ
हैं, मुझमें प्रवेश कर रहीं हैं ऐसा कहते ही केवल अम्बिका देवी
ही अवशेष रहीं ।
रहस्य त्रय: प्राधानिक, वैकृतिक, मूर्ति रहस्य, क्षमा-प्रार्थना व उपसंहार
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११२
इसके पश्चात् देवता-दानवां के देखते देखते देवी और
शुम्भ दोनों में बड़ा भयंकर युद्ध हुआ । एक दूसरे ने अपने
रण कौशल से भयंकर दिव्य अस्त्र-शस्त्रों के प्रयोग से अपने
शत्रु के प्राण लेने चाहे । अन्त में माँ ने अपने त्रिशूल से शुम्भ का
हृदय छेद दिया और उसके प्राण-पखेरु उड़ गये । उस दुरात्मा
के मारे जाने से सम्पूर्ण जगत प्रसन्न एवं पूर्ण स्वस्थ हो गया
और आकाश स्वच्छ दिखाई देने लगा । नदियाँ भी ठीक मार्ग
से बहने लगीं ।
गुरु के द्वारा हृदय-ग्रन्थि के छेदन पर तात्विक ज्ञान
होता है, आसुरी वृत्तियों के नाश पर ही इन्द्रियों के देवता
प्रसन्न होते हैं सद्वृत्तियों से स्तुति की जाती है ।
इस अध्याय की कथा में समस्त दैत्यों की समाप्ति पर
देवताओं ने प्रसन्न होकर भगवती की स्तुति की है, क्योंकि दैवी-
भाव तभी उदय होते हैं जब विकारों के दैत्य नष्ट हो जाते हैं-
इच्छा द्वेष समुत्थेन द्वन्द मोहेन भारत ।
सर्व भूतानि सम्मोहं सर्गेयान्ति परन्तप ॥ २६
येषां त्वन्तगतं पापं जनानां पुण्यकर्मणाम् ।
ते द्वन्द मोह विमुक्ता भजन्ते माँ दृढ़व्रताः ॥ २८
जरा मरण मोक्षाय मामाश्रित्य यतन्ति ये ।
ते ब्रह्म तद्विदुः कृत्स्नमध्यात्मं कर्मचाखिलम् ॥गी०अ०७/२७/२६
अर्थात् इच्छा द्वेष के कारण मोहित हुआ जीव बेचारा
‘जन्म-मरण (पुनरपिजननम् पुनरपि मरणम् पुनरपि जननी
जठरे शयनम्)’ रूपी संसार में पड़ा हुआ है । जिन पुण्य
बातों ने इन पर विजय प्राप्त की है वे ही भगवान् की सच्ची
भक्ति कर सकते हैं । मेरी भक्ति तथा मेरे लिए किया गया
पुरुषार्थ ही संसार को छुड़ा सकता है । वह भक्त ब्रह्म स्वरूप
हो जाता है । मेरी भक्ति अथवा मेरा भजन वही व्यक्ति कर
पाता है जो द्वन्द मोह से विमुक्त है वह ध्यान देने योग्य शब्द
११३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
है साथ ही यह भी जान लेना जरूरी है कि असुर कौन है ?
दम्भो दर्पोऽभिमानश्च क्रोधः पारुष्यमेव च ।
अज्ञानं चाभिजातस्य पार्थ सम्पदमासुरीम् ॥ गीता १६/४
अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकार संयुक्ता कामराग बलान्विता ॥ १७/५
कर्षयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुर निश्चयान् ॥ १७/६
दम्भ अहंकार, काम, राग, मद मोह से भरे लोग असुर
हैं असुषु-देहेन्द्रियादिषु रमते, वासनासु रमन्ते त एव असुराः जो
वासना पूर्ति में, इन्द्रियों को तृप्त करने में लगे हैं; वे ही असुर
हैं । गीता के सोलहवें अध्याय के सातवें मन्त्र से अठारहवें मन्त्र
तक शुम्भ-निशुम्भ की समस्त आसुरी प्रवृत्तियाँ स्पष्ट हो
जाती हैं । उदाहरणार्थ श्लोक १०/११ प्रस्तुत हैं-
काममाश्रित्य दुष्पूरं दम्भमानमदान्विताः ।
मोहाद् गृहीत्वा सद् ग्राहान्प्रवर्तन्तेऽशुचि व्रताः ।
चिन्तामपरिमेयां च प्रलयान्तामुपाश्रिताः ।
कामोपभोग परमा एतावदिति निश्चिताः ॥गी.अ.१६/१०-११
काम भोग परायण असुर होते हैं। ‘नितरां शेरते चेष्टा येषाम्’
जो बेहोश हैं वे निशाचर हैं। शुम्भादि दैत्यों के नाम भी सार्थक
हैं। आपने अभी सुना है कि असुर वे हैं जो इन्द्रियों की पूर्ति
में प्रसन्न होते हैं और साधक या सुर वे हैं जो इच्छाओं की
निवृत्ति में प्रसन्न होते हैं ।
साधक के जीवन में यही प्रबल पुरुषार्थ है कि वह
इच्छाओं की निवृत्ति करे । विषयासक्ति-जिसे रक्त-बीज बताया
गया है, उसका नाश करें तभी काम-क्रोध, लोभ, मोहादि पर
विजय मिलेगी । इसी से परम सुन्दरी, परम सुकुमारी पराम्बा
की सवारी सिंह है जो गहन विपिन का राजा है, स्वयं शिकार
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११४
करता हैं। जो लोग दूसरों की कमाई खाते हैं और भोगी हैं
वे परा शक्ति स्नेह मूर्ति माँ को कैसे प्राप्त कर सकते हैं । श्रुति
भी कहती है “नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” यह आत्मा कमजोर
दिल-दिमाग वालों की पहचान में नहीं आ सकता, क्योंकि
विपर्यय ज्ञान-जो ध्रूमलोचन नाम से है, का मिटाना शूरवीरों
का काम है। लक्ष्मी का वाहन उल्लू-आत्मज्ञान रहित होता
है। धन दुर्मदान्ध होता है अतः उसे ज्ञान विज्ञान रूपी दिन में
विवेक दिखाई नहीं देता ।
इन तीनों चरित्र के मनन से यह स्पष्ट हो जाता है कि
हमारे लक्ष्य में बाधक राग-द्वेष (मधु-कैटभ) अस्मिता अहंकार
(महिषासुर), विषयासक्ति तथा कामादिक विकारों (रक्त बीज,
शुम्भादि) के नष्ट होने पर ही दैवी गुणों का विकास होता है ।
११५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
एकादशोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बालरविद्युतिमिन्दुकिरीटां तुंगकुचां नयन त्रय युक्ताम् ।
स्मेरमुखीं वरदांकुश पाशामीति करां प्रभजे भुवनेशीम् ॥
प्रातः कालीन सूर्य कान्ति के समान देदीप्यमान, चन्द्र -
मुकुट धारिणी, उच्च स्तनों से युक्त, तीनों नेत्र-सूर्य, चन्द्र, अग्नि
धारिणी, मन्द-मन्द मुसकान मुख छटा प्रसारिणी तथा हाथों में
अंकुश, पाश, अभय और वरद मुद्रा धारिणी माँ भुवनेश्वरी को
मैं नमन करता हूँ ।
महामुनि मेधा ऋषि कहते हैं कि असुरों के समापन होने
पर प्रसन्नचित्त होकर देवताओं ने स्तुति की-हे विश्वेश्वरी !
शरणागत संकट निवारिणी, भक्त जन कल्याणिनी माँ जगदम्बे
प्रसन्न होकर विश्व की रक्षा करो, तुम ही इस संसार की आधार
हो, क्योंकि तुम ही पृथ्वी रूपा हो, तुम ही जल रूप होकर जगत
को तृप्त करती हो । तुम ही अनन्त बलशालिनी, वैष्णवी शक्ति
तथा जगत की कारण रूपा माया हो, तुमसे ही यह जगत मोहित
है । तुम्हीं मुक्ति दायिनी हो ।
हे माँ ! सम्पूर्ण विद्यायें तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं ।
जगत की सम्पूर्ण स्त्रियाँ तुम्हारी मूर्तियाँ हैं । तुमने ही विश्व को
व्याप्त किया है । तुम्हीं परा वाणी होने के कारण अवर्णनीया
हो ।
सर्व स्वरूपा देवि, बुद्धिरूप से सब लोगों के हृदय में
विराजमान रहने वाली, स्वर्ग एवं मोक्ष प्रदायिनी, कला-काष्ठादि
के रूप में उत्पत्ति, स्थिति एवं संहारकारिणी, मंगलमयी, मंगल
दायिनी, सर्व सिद्धि प्रदात्री, शरणागत वत्सला नारायणी आपको
नमस्कार है । यहाँ ‘वत्सला’ शब्द बड़ा महत्वपूर्ण है । जैसे सद्यप्रसूता
धेनु (गाय) अपने बछड़े को अपनी जीभ से चाटकर शुद्ध और
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११६
स्वच्छ कर देती है । उसे अपने वत्स के शरीर पर लगे हुए मल-
मूत्र के छुड़ाने में घृणा न होकर प्यार उमड़ता है, इसीलिए
'वत्सला' कहते हैं ।
एक बालक मल-मूत्रावेष्टित पड़ा है, उसकी आँखों और
नाक से भी मैल निकल रहा है, रोता हुआ दीन-हीन अवस्था में
पड़ा हुआ है । ऊपर की ओर हाथ उठाये हुये माँ-माँ पुकारता
है । उसके आर्त स्वर को सुनकर ऐसी कौन माँ है जो दौड़कर
उसे छाती से न लगा ले और अपनी करुणामयी दृष्टि तथा
कोमल स्पर्श से निहाल न कर दे । संसार का नियम है कि साफ,
स्वच्छ, हँसते-खेलते बालक को तो सभी लोग गले लगा लेते हैं,
किन्तु वैसे बालक की शरणागत माँ ही है । इसी प्रकार सर्व -
विध साधन सम्पन्न साधक को सभी अपना बना सकते हैं किन्तु
जो दीन-हीन साधन विहीन अनाथ है, उसे तो करुणामयी माँ ही
गले लगाती है । अपना असीम प्यार बरसाती है और स्वयं उसे
शुद्ध कर लेती है ।
दीनों-हीनों, पीड़ितों की रक्षिके माँ, तुम ही ब्रह्माणी हो,
रुद्राणी हो, माहेश्वरी, वैष्णवी, कौमारी, नारसिंही, वाराही भी
तुम ही हो, अपने अनेक आभूषण और आयुध धारण करके तुम्हीं
प्रकट होती हो । तुम्हें बारम्बार नमस्कार है । वृत्रासुर पर इन्द्र
की शक्ति होकर उसकी संहारिणी रूपा तुम्हीं हो । हे चण्ड-मुण्ड
विनाशिनी देवी ! तुम्हीं लक्ष्मी लज्जा, श्रद्धा, पुष्टि, स्वाहा,
स्वधा, ध्रुवा, महारात्रि, महा विद्या, महा अविद्या रूपा नारायणी
हो, तुम्हें नमस्कार है । मेधा, सरस्वतो ऐश्वर्यरूपा, वाग्मी,
पार्वती, तामसी, महाकाली, नियता, संयता, ईशा सबको
अधीश्वरी तुम ही हो । हे सर्वस्वरूपे ! शक्ति सम्पन्ने ! दिव्य
रूपे माँ दुर्गे तुम्हें नमस्कार है । हे कल्याणी ! हे भद्र कालो !
हे जगदम्बे, सर्व प्रकार अपने आयुधों से रक्षा करने वालो
तुम्हें नमस्कार है ।
११७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सर्व रोग विनाशिनी, सर्वमनोरथ सिद्धिदायिनी, विपद्
विदारिणी, सर्व शरण प्रदायिनी, माँ तुम्हें नमस्कार है । हे
देवि ! दैत्यों के विनाश हेतु आपने विविध रूप धारण किये थे,
आपको नमस्कार है ! विद्याओं में, ज्ञान को प्रकाशित करने
वाले शास्त्रों में; तथा वेदों में तुम्हारा ही वर्णन है । तुम्हीं
संसार को अविद्या द्वारा बांधने वाली और विद्या द्वारा मुक्त
करने वाली हो, अतः तुम्हें नमस्कार है ।
जहाँ राक्षस, शत्रु, सर्प आदि विषैले जीव, डाकू और
भयंकरतम परिस्थितियों में रहकर तुम ही विश्व की रक्षा करती
हो । हे विश्वनाथ वन्दनीये ! जो तुम्हें प्रेम से प्रणाम करते हैं;
उन्हें आपके आश्रय का अनुभव होता है । अभी आसुरी
सम्पत्ति का विनाश कर दैवि-सम्पति का विकास किया है । हम
सब आपकी शरण में हैं; कोटि-कोटि नमन करते हैं प्रसन्न होकर
वरदान दीजिए ।
हे मातु भवानी, जगजननी, संकट हरणी, जन मन भरने दो ।
माँ हम सब तेरे बालक हैं, चरण तले निज तुम रहने दो ॥ हे०
देव पड़े जब विपदा में थे, तब मिलकर शरण तेरी आये ।
चढ़ सिंह पीठ रण में गरजो, फिर रूप वही दरसाने दो ॥ हे०
शुम्भ निशुम्भ को तुमने मारा, महिषासुर को तूने पछाड़ा ।
तूने रक्त बीज संहार किया, वह परम छटा बरसाने दो ॥ हे०
तूने जीवन दान दिया है, तूने उबारा, तुम्ही उबारो ।
भव पार लगे जीवन नैया, सब जन-मन को हरषाने दो ॥ हे०
इस प्रकार देवताओं की स्तुति को सुनकर माँ जगदम्बे
बड़ी प्रसन्न हुई और उन्हें वरदान मांगने के लिये कहा । तब
देवों ने कहा—
सर्व बाधा प्रशमनं त्रैलोक्यस्याखिलेश्वरी ।
एवमेव त्वया कार्यमस्मद् वैरिविनाशनम् ॥ ११/३६