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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६८
मेरे कहने से ही शुंभ निशुंभ के पास चली जाओ, अन्यथा
अपमानित होकर जाना पड़ेगा । इसे सुनकर भगवती ने कहा-
मैंने बिना विचारे यह प्रतिज्ञा कर ली है । इसका निर्वाह मुझे
करना ही होगा ।” तुम उस दैत्यराज से आदर पूर्वक कह देना,
जैसा उचित समझेंगे वैसा करेंगे ।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ।
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः ।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत् ॥ ५/१२८-१२६
शुम्भ-निशुम्भ की आसक्ति और जगदम्बा की प्रतिज्ञा पर
आप लोग विचार करें-शुम्भादि का आकृष्ट होना कोई बड़ी
बात नहीं । भगवान् के मोहिनी रूप को देखकर असुर ऐसे मुग्ध
हुए कि बेचारे हाथ में आये हुये अमृत को हाथ से खो बैठे;
और पी न सके, क्योंकि सौन्दर्य सम्पदा ही भगवती लक्ष्मी का
रूप है “श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे, नक्षत्राणि
रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुं
म इषाण सर्वलोकं म इषाण ।
(यजुर्वेद अ. ३१ कण्डिका २२)
महीधर ने इस मंत्र में ‘श्री’ शब्द का अर्थ ‘सम्पदा’ किया
है । इसी से मनुष्य आश्रयणीय होता है । लक्ष्मो शब्द का अर्थ
सौन्दर्यं किया है इसी से लोगों की दृष्टि आकृष्ट होती है ।
जिसको हर कोई चाहे, आकृष्ट होकर सब जिसकी ओर दौड़ें,
उसी को लक्ष्मी कहते हैं; किन्तु यह शक्ति, शोभा, सम्पदा, श्री,
लक्ष्मी, वैभव जिसको मिलता है यह देवी स्वयं अपने मुख से
कह रही है- ‘यो मां जयति संग्रामे’ जो मुझे संग्राम में जीतेगा ।
“संग्राम में कौन विजयी होता है ? एक जनपदीय मल्ल
(पहलवान) प्रान्तीय मल्ल से, प्रान्तीय मल्ल राष्ट्रीय मल्ल से
हार ही जायेगा और श्रृंखला क्षेत्रीयता के विस्तार से जय-