दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पराजय में परिणत होती जायेगी। जो किसी से पराजित हो
जाये वह विजयी कैसा ? अतः महाशक्ति के वरण करने वाला
शूरवीर ऐसा होना चाहिए; जिसे कोई कभी कहीं भी पराजित
न कर सके, न हो सके । और वह है केवल 'जितेन्द्रिय पुरुष' ।
“इन्द्रियाणां जयेच्छूरः”, “न रणे विजयाच्छूरः” यह शास्त्र
दृष्टान्त भी है-(मेघनाद के वध होने पर उसकी सती पत्नी द्वारा
भुजा में पकड़ाई चाक - मिट्टी के द्वारा लिखित वर्णन के माध्यम
से) स्वयं मेघनाद ने अपनी पत्नी को लक्ष्मण की प्रशंसा करते
हुए लिखा है मैं 'इन्द्रजीत' तो हूं, किन्तु लक्ष्मणजी 'इन्द्रियजीत'
हैं। इसी कारण मैं उनसे परास्त हो गया हूँ इन्द्रिय-विजयी
ही अपने ज्ञान-विज्ञान द्वारा रक्षित रह सकता है। अतः भगवान्
श्रीकृष्ण अर्जुन को संग्रामजेता बनने के लिए इन्द्रियों पर विजय
पाने का दिव्य संदेश देते हुये कहते हैं :-
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञान विज्ञान नाशनम् ॥ गीता ३/४१॥
कामनाएँ ही ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करती हैं। पहले
इन्द्रियों को संयमित करो, तभी विजय मिलेगी तथा यो मे दर्पं
व्यपोहति जिसने अभिमान नष्ट कर लिया है। यस्य नाहंकृतो
भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । गीता १८/१७ अभिमान रहित बुद्धि
ही शक्तिशाली होती है। “यो मे प्रतिबलो लोके” (जो मेरे बल
के समान बलशाली हो) नारायण के अतिरिक्त महाशक्ति के
बराबरी वाला और कौन हो सकता है, केवल नारायण ही होंगे,
यह ज्ञान होना चाहिये ।
दिव्य-शक्तियों की उपलब्धियों के अनेक दृष्टान्त भारतीय
आर्ष ग्रन्थों में प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। आधि दैविक शक्ति
प्राप्ति का उदाहरण कुन्ती हैं। उन्होंने अपने तपोभूत मन से
जिसका आह्वान किया, वही उपस्थित हुआ चाहा तो सूर्य को
आहूत किया, चाहे तो धर्म को। आधि भौतिक शक्तियों का पुंज