दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०२
नमो नमो अम्बे
नमो नमो दुर्गे सुख करनी, नमो नमो अम्बे दुख हरनी ।
शशि ललाट मुख महा विशाला, नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।
तुम संसार शक्ति लय कीना, पालन हेतु अन्न धन दीना ।
अन्नपूर्णा हुई तू जगपाला, तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।
शिव योगी तुम्हारे गुण गावे, ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।
धर्यो रूप नरसिंह को अम्बा, प्रकट भई फाड़ के खम्बा ।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो, हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ।
महिषासुर नृप अति अभिमानी, जेहि अघ भार मही अकुलानो ।
रूप कराल काली को धारा, सेन सहित तुम तिहि संहारा ।
ज्वाला जी में ज्योति तुम्हारी, तुम्हें सदा पूजें नर नारी ।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें, दुःख दारिद्रय निकट नहिं आवें ॥
ध्यावें तुम्हें जो भी मन लाई, जन्म-मरण ताको छुटि जाई ॥