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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 127

१०३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सप्तमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीम् ।
न्यस्तैकांघ्रिं सरोजे शशिशकलधरां बल्लकीं वादयन्तीम् ॥
कह्लाराबद्धमालां नियमित बिलसच्चोलिकां रक्त वस्त्राम् ।
मातङ्गी शंख पात्रां मधुर मधुमदां चित्रकोद्भासि भालाम् ॥
मैं रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान होकर तोते द्वारा
पठित सुन्दर मधुर शब्द सुनती हुई, अङ्गों की श्यामल कान्ति से
कान्तिवान, अपना एक चरण कमल पर रखकर, ललाट में अर्द्धचन्द्र
तथा कण्ठ में कह्लार पुष्पों की माला धारण किये हुये वीणा
बजा रही हैं; जो रक्त-वर्ण (लाल रंग) की साड़ी पहने हुए है
उसी रंग की कञ्चुकि जिनके अङ्गों में कसी हुई शोभा पा रही
हैं, हाथ में शङ्ख भरा पात्र लिये हैं, जिनके मुख पर मधु का
हल्का सा प्रभाव भाषित हो रहा है, ललाट में मङ्गल-चित्र
बिन्दी शोभित किये हुये हैं उसी मातङ्गी देवी का ध्यान
करता हूँ ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-हे राजन् ! शुम्भ की आज्ञा
पाकर वे चण्ड-मुण्ड आदि दैत्य चतुरङ्गिणी-(पैदल, रथ, हाथी,
घोड़े) सेना साथ ले, अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी पर
आक्रमण करने के लिए चल दिये । गिरिराज हिमालय के
सुवर्णमय उच्चशिखर पहुँचकर उन्होंने मन्द-मन्द मुस्कराते हुए
सिंह-वाहिनी को देखा, तो अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करते हुए
चारों ओर उस देवी पर टूट पड़े ।
तब अम्बिका ने शत्रुओं पर क्रोध किया तो उनका मुख
काला पड़ गया, ललाट में भौंहें टेढी हो गयीं और वहाँ तुरन्त
विकराल काली प्रकट हुईं जो तलवार, पाश और खट्वाङ्ग
धारण किये ये, चीते के चर्म की साड़ी पहने हुये, नर मुण्डों