दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१०१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
षष्ठोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ नागाधीश्वर विष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली
भास्वद्देहलतां दिवाकर निभां नेत्रत्रयोद्भासिताम् ।
मालाकुम्भ कपाल नीरजकरां चन्द्रार्धचूड़ां परां
सर्वैज्ञेश्वर भैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये ॥
जगज्जननी जगदम्बा जगदीश्वरी नागराज शेष के आसन
पर विराजमान है, उनकी देहलता नागों के फणों में देदीप्यमान,
मणियों की सुन्दर भव्य माला से दीप्तिमान हो रही है, उन सूर्य
के समान तेजस्विनी के तीनों नेत्र उनके सौन्दर्य की और भी
अभिवृद्धि कर रहे हैं । उनके हाथों में माला, कुम्भ, कपाल और
कमल सुशोभित हैं, तथा मस्तक पर अर्द्ध चन्द्र-मुकुट जिनके
सौन्दर्य-माधुर्य में चार-चांद लगा रहा है, सर्वैज्ञेश्वर भैरव के
अङ्क में निवास करने वाली ऐसी परमोत्कृष्ट पद्मावती देवी का
मैं चिन्तन करता हूँ ।
इस छठे अध्याय में यह वर्णन है उस सुग्रीव दूत से शुम्भ
ने भगवती की यह प्रतिज्ञा सुनकर दैत्यराज धूम्रलोचन को उस
सुन्दरी को पकड़कर लाने का आदेश दिया; किन्तु आसुरी भाव
वाला दैत्य बेचारा महाशक्ति को कैसे ग्रहण कर सकता है ?
धूम्र लोचन-जिसके नेत्रों में काला धुआं भरा हो अर्थात् दृष्टि ही
धुँधली हो गई । मानसकार के अनुसार "ज्ञान-विराग नयन
उरगारी" नेत्र तो ज्ञान और वैराग्य ही होते हैं । श्रुति-स्मृति भी
नेत्र बताये गये हैं, इसमें ये किसी प्रकार के लक्षण नहीं हैं ।
उसके लिए महाशक्ति का स्पर्श तो दूर सम्मुख उपस्थित होना
भी असम्भव है । ऐसा ही हुआ,
"हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः । ६/१३
माँ ने हुङ्कार मात्र से उसे भस्मीभूत कर दिया । धूम्र-
लोचन के मरने की सूचना पाकर शुम्भ ने चण्ड-मुण्ड को भेजा ।