दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६२
हे माँ ! शत्रुनाश करके आपने संसार की रक्षा की,
दुष्टों को स्वर्ग में वास दिया, और हम लोगों को उनसे निर्भय
बना दिया । आपको बारम्बार नमस्कार है । आप शूल से,
तलवार से, घण्टा ध्वनि से, धनुष की टंकार से, चारों दिशाओं
में हमारी रक्षा करें । २६ ।
इस प्रकार देवताओं ने पराम्बा की बड़े प्रेम से स्तुति की-
अब तुम्हारे हो चुके माँ, अब शरण में ले लो हमें ।
सर्वस्व अपना खो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
जप-जोग ईश आराधना, तप नियम की जो साधना ।
सबसे विरक्त अब हो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
निज बात पीड़ाओं से भरी, करुणार्द्र होकर तुमसे कही,
चरणों में गिरे, बहुत रो चुके हैं, माँ शरण में ले लो हमें ॥
माँ शरण में ले लो हमें ॥
पराम्बा ने देवों की स्तुति से प्रसन्न होकर वरदान
माँगने को कहा । तब देवताओं ने कहा-माँ ! हमारा यही
मनोरथ था कि संसार में आसुरी भाव नष्ट हो जायें । जब
व्यष्टि या समष्टि में दैवि गुणों का ह्रास और आसुरी भावों
का विकास हो जाता है । तब अम्युदय और नि श्रेयस दोनों
की हानि होती है । आपने कृपा करके विश्व का कल्याण किया
है । अब जब-जब ऐसी संकटमयी अवस्था आवे तो हमारे
स्मरण-मात्र से आप दर्शन देकर संकट दूर करें । यही
अभीष्ट है ।
इन स्तोत्रों को जो पढ़ेंगे उन्हें सब प्रकार की सुख-
सम्पत्ति की प्राप्ति होगी, प्रसन्न होकर आप हमें यही वरदान
दें । तथास्तु कहकर माँ जगदम्बे अन्तर्धान हो गईं ।
जब कोई न हो तेरा, तब माँ की शरण ले लेना ॥ १
संसार के जीवों पर कभी, आशा न किया करना ।
जब कोई न हो तेरा, तब माँ का नाम लिया करना ॥ २
६३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जीवन के सागर में तूफान भी आते हैं,
जो माँ के सहारे हैं वे ही बच पाते हैं।
वे आप ही आयेंगी, बस तुम याद किया करना ॥ ३
हे भक्त ! तू दुःख में न रो, माँ तुझ से दूर नही है,
भक्तों का दुखी होना, माता को मंजूर नहीं है ।
है भक्तों की रखवाली, तुम उनकी शरण लिया करना ॥ ४॥
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६४
पञ्चमोऽध्याय
ध्यानम्-ॐ घण्टाशूलहलानि शंख मूसले चक्रं धनुः सायकम्
हस्ताब्जैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशु तुल्य प्रभाम् ।
गौरी देह समुद्भवां त्रिजगतामाधार भूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वती मनुभजे शुम्भादि दैत्यार्दिनीम् ॥
जिनके कर कमल घण्टा, शूल, हल, शङ्ख, मूसल, चक्र,
धनुष और बाण से सुशोभित है, शरद कालीन दुग्ध धवल
ज्योत्स्ना से ज्योतित चन्द्रमा के समान जिनकी मनोहर कान्ति
है, जो तीनों लोकों की आधार हैं जो शुम-निशुम्भादि दैत्य
संहारिणी हैं, माँ गौरी-पार्वती के शरीर से जिनका प्राकट्य
हुआ है उन महा सरस्वती देवी को मैं निरन्तर प्रणाम करता हूँ,
आराधना करता हूँ ।
विनियोगः-ॐ अस्य श्री उत्तरचरित्रस्य रुद्र ऋषिः,
महासरस्वती देवता, अनुष्टुप्छन्द-भीमा शक्ति, भ्रामरी
बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेद स्वरूपम् महासरस्वती प्रीत्यर्थे
उत्तर चरित्र पाठे निनियोगः ॥
यह उत्तर-तृतीय चरित्र है । जीव में राग-द्वेष, अस्मिता
अविद्या, क्लेशों के कारण ही दुःख आता है । वह नित्य मुक्त
होने पर भी बन्धन का अनुभव करता है । प्रथम चरित्र में
राग-द्वेष का नाश हुआ है । द्वितीय चरित्र में अनन्त कुप्रवृत्तियों
सहित अस्मिता (अहङ्कार) का विनाश हुआ । अविद्या से ही यह
प्रपञ्च प्रतीत हो रहा है । अविद्या के कारण ही जीव-सृष्टि
है, जिसमें काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसे प्रबल विकार उदय होते
हैं । संसार या जीव-सृष्टि का अर्थ "मेरा-तेरा" है । यही मेरा-
तेरा ही दुःखद है । इसे यों समझिये—धन बाहर है, बैंक में है,
उसके प्रति ममता होने के कारण उसके जाने पर दुःख होता
६५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
है। दुःख का कारण धन नहीं है अपितु जितने धन के साथ मेरा
जुड़ा है; उसके नष्ट होने पर ही तो दुःख हुआ । रेडियो,
दूरदर्शन अथवा समाचार-पत्र में अनेक मनुष्यों की मृत्यु की
घटनायें पढ़ते हैं, सुनते हैं, देखते हैं, किन्तु रोते नहीं, ओर
यदि अपने परिवार के किसी व्यक्ति, पशु के साथ ऐसी घटना
घटित हो जाये तो क्या दशा होती है ? इसके सब भुक्त भोगी
है । अतः कहने की आवश्यकता नहीं, स्पष्ट ही है कि दुःख
वस्तु, पदार्थ, मनुष्य अथवा धन के होने या न होने, या नष्ट होने
पर नहीं होता अपितु ‘मेरा' जिस-जिस के साथ जुड़ा है, उसके
जाने पर दुःख होता है । अतः स्पष्ट हो गया है कि धन, जन,,
पद, अधिकार आदि प्रति मोह या ममता ही दुःखद है ईश्वर
की सृष्टि में दुःख नहीं हैं। इसी मोह, ममता को जन्म देकर
अविद्या ने जीव को जन्म-मरण के चक्र में भ्रमित किया है।
तृतीय चरित्र में इस अविद्या-महाठगिनी माया का संहार
प्रतिपादित हुआ है । इसलिए इसके ऋषि (प्रलयंकारी) रुद्र हैं
और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती इसकी देवता हैं।
अज्ञानान्धकार को विलीन करने अविद्यान्धकार ध्वंसी, प्रकाश
के प्रकाशक सूर्य देव इसके तत्व हैं; अनुष्टुप् छन्द है; कष्ट
संहारिणी, दैत्य विनाशिनी, भयंकर कराल काल स्वरूपिणी
‘भीमा' शक्ति हैं। तीनों लोकों के हित के लिए अरुण नामक
दैत्य का विनाश करने के लिए ‘भ्रामरों' का रूप धारण करके
भ्रामरी के नाम से पूजित हुई थी । आसुरी प्रवृत्तियों-अविद्या को
नष्ट करने के कारण भ्रामरी बीज है , भगवती सरस्वती वीणा
धारिणी वीणा में सात स्वर ‘झंकृत' होते हैं । अतः उनका
सम्बन्ध सामवेद से होने के कारण सामवेद स्वरूप बतलाया
गया है ।
महामना मनस्वी मेधा ऋषि ने पराम्बा को नमस्कार
करके कथा प्रारम्भ की- हे राजन् ! प्राचीनकाल में शुम्भ और
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६६
निशुम्भ नाम के दो विशालकाय महाबलशाली अत्यन्त पराक्रमी
दैत्य हुए । जिन्होंने देवताओं को परास्त करके उनको स्वर्ग से
वहिष्कृत कर दिया, उनको समस्त अधिकारों से वञ्चित कर
स्वयं राजा बन गये । सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि का कार्य छीन
कर स्वयं शासन करने लगे । इस दुःखद परिस्थिति में समस्त
देवता क्षुब्ध होकर गिरिराज हिमालय पर जाकर पराम्बा की
स्तुति करने लगे । इस स्तुति का नाम “देवी-सूक्त” है यह देवी
सूक्त भक्तों के पाठ करने पर समस्त मनोकामनायें पूर्ण करता
है । भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार की सिद्धियाँ सिद्ध
करता है अतः बड़ा महत्वपूर्ण है । संसार के प्रत्येक व्यवहार में,
जड़-चेतन में, कण-कण में यही पराम्बा परमेश्वरी व्याप्त हैं,
ऐसा बताकर प्रत्येक श्लोक में ‘नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै
नमो नमः’ कर तीन-तीन बार नमस्कार किया है जैसे विष्णु
माया, चैतन्य, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति
लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति दया, पुष्टि, तुष्टि
(आजकल ‘तुष्टि को ही संतोषी माता कहा जाता है) भ्रान्ति,
माता आदि के स्वरूप को जगदम्बा बताकर नमस्कार किया
गया है ।
इस प्रकार यदि साधक संसार के प्रत्येक पदार्थ को
महाशक्ति का स्वरूप समझ लें, तो निस्संदेह वह अविद्या को
पार कर सकता है । देवताओं ने इस प्रकार स्तुति करके
जगदम्बा को याद दिलाई कि आपने हमें वचन दिया था—
“आपत्ति आने पर रक्षा करूंगी” अपने वचनानुसार हमारी
आपत्तियों को दूर कीजिये । भगवती पारवती यहाँ गंगा स्नान
के लिये आई हुई थीं, उन्होंने देवों की स्तुति सुनकर अपने
शरीर कोषों से शिवा देवी का प्राकट्य किया, वे बोलीं
“तुम्हारा कल्याण हो । देवताओं के द्वारा दैत्यों का अन्याय
सुनकर पार्वती के शरीर से अम्बिका प्रकट हुईं । इन्हें ‘कौशिकी’
६७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कहते हैं इनका रंग काला पड़ जाने से इनका नाम 'कालिका'
पड़ गया।
इधर अम्बिका के परम, मनोहर, दिव्य रूप से मुग्ध होकर
वहाँ विचरण करने वाले चण्ड-मुण्ड दैत्यों ने अपने स्वामी शुम्भ
के पास जाकर माँ के रूप लावण्य की प्रशंसा की तथा उन्हें
ही एक मात्र भोग्य बताया। दैत्यराट् शुम्भ ने तुरन्त अपने
दूत सुग्रीव को देवी के पास भेजा और कहा- "तुम जाकर मेरी
प्रशंसा करके साम दाम, दण्ड-भेद से किसी भी प्रकार उस
सुन्दरी को यहाँ ले आओ"। दूतने हिमालय पर जाकर बड़े
विस्तार से मधुर शब्दावली में शुम्भ की प्रशंसा करके पराम्बा
को उसके पास चलने के लिए आमंत्रित किया। माँ ने हँसते हुए
अपनी प्रतिज्ञा इस प्रकार सुनाई :-
यो मां जयति संग्रामे, यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके, स मे भर्त्ता भविष्यति ॥ ५/१२०
“जो मुझे संग्राम में जीतकर मेरे अभिमान को चूर्ण कर
सकेगा, तथा संसार में मेरे समान बलशाली होगा, वही मेरा
स्वामी होगा।” कहकर विनम्रता से अपनी विवशता प्रकट
करदी।
वह निशाचर भला इसका क्या अर्थ समझे, वह तो इतना
ही समझता है कि यह एक स्त्री रत्न है, परम सुन्दरी है, अत्यंत
सुकुमारी है, उसके मुख से 'युद्ध करने वाला तथा जीतने वाला
ही मेरा पति होगा' की बातें सुनकर हँसने लगा और पुनः बोला
हे देवी ! वह शुम्भ इतना प्रबल दैत्य है कि तुम्हारे केशों को
पकड़कर घसीटता हुआ ले जायेगा, तुम्हारा अपमान होगा। तुम
इतनी सुकुमारी अबला क्या कर सकोगी ?
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता, पार्श्वं शुम्भ निशुम्भयोः ।
केशाकर्षणनिर्धूत गौरवा मा गमिष्यसि ॥ ५/१२६
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६८
मेरे कहने से ही शुंभ निशुंभ के पास चली जाओ, अन्यथा
अपमानित होकर जाना पड़ेगा । इसे सुनकर भगवती ने कहा-
मैंने बिना विचारे यह प्रतिज्ञा कर ली है । इसका निर्वाह मुझे
करना ही होगा ।” तुम उस दैत्यराज से आदर पूर्वक कह देना,
जैसा उचित समझेंगे वैसा करेंगे ।
किं करोमि प्रतिज्ञा मे यदनालोचिता पुरा ।
स त्वं गच्छ मयोक्तं ते यदेतत्सर्वमादृतः ।
तदाचक्ष्वासुरेन्द्राय स च युक्तं करोतु तत् ॥ ५/१२८-१२६
शुम्भ-निशुम्भ की आसक्ति और जगदम्बा की प्रतिज्ञा पर
आप लोग विचार करें-शुम्भादि का आकृष्ट होना कोई बड़ी
बात नहीं । भगवान् के मोहिनी रूप को देखकर असुर ऐसे मुग्ध
हुए कि बेचारे हाथ में आये हुये अमृत को हाथ से खो बैठे;
और पी न सके, क्योंकि सौन्दर्य सम्पदा ही भगवती लक्ष्मी का
रूप है “श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यावहोरात्रे पार्श्वे, नक्षत्राणि
रूपमश्विनौ व्यात्तम् । इष्णन्निषाणामुं
म इषाण सर्वलोकं म इषाण ।
(यजुर्वेद अ. ३१ कण्डिका २२)
महीधर ने इस मंत्र में ‘श्री’ शब्द का अर्थ ‘सम्पदा’ किया
है । इसी से मनुष्य आश्रयणीय होता है । लक्ष्मो शब्द का अर्थ
सौन्दर्यं किया है इसी से लोगों की दृष्टि आकृष्ट होती है ।
जिसको हर कोई चाहे, आकृष्ट होकर सब जिसकी ओर दौड़ें,
उसी को लक्ष्मी कहते हैं; किन्तु यह शक्ति, शोभा, सम्पदा, श्री,
लक्ष्मी, वैभव जिसको मिलता है यह देवी स्वयं अपने मुख से
कह रही है- ‘यो मां जयति संग्रामे’ जो मुझे संग्राम में जीतेगा ।
“संग्राम में कौन विजयी होता है ? एक जनपदीय मल्ल
(पहलवान) प्रान्तीय मल्ल से, प्रान्तीय मल्ल राष्ट्रीय मल्ल से
हार ही जायेगा और श्रृंखला क्षेत्रीयता के विस्तार से जय-
६६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
पराजय में परिणत होती जायेगी। जो किसी से पराजित हो
जाये वह विजयी कैसा ? अतः महाशक्ति के वरण करने वाला
शूरवीर ऐसा होना चाहिए; जिसे कोई कभी कहीं भी पराजित
न कर सके, न हो सके । और वह है केवल 'जितेन्द्रिय पुरुष' ।
“इन्द्रियाणां जयेच्छूरः”, “न रणे विजयाच्छूरः” यह शास्त्र
दृष्टान्त भी है-(मेघनाद के वध होने पर उसकी सती पत्नी द्वारा
भुजा में पकड़ाई चाक - मिट्टी के द्वारा लिखित वर्णन के माध्यम
से) स्वयं मेघनाद ने अपनी पत्नी को लक्ष्मण की प्रशंसा करते
हुए लिखा है मैं 'इन्द्रजीत' तो हूं, किन्तु लक्ष्मणजी 'इन्द्रियजीत'
हैं। इसी कारण मैं उनसे परास्त हो गया हूँ इन्द्रिय-विजयी
ही अपने ज्ञान-विज्ञान द्वारा रक्षित रह सकता है। अतः भगवान्
श्रीकृष्ण अर्जुन को संग्रामजेता बनने के लिए इन्द्रियों पर विजय
पाने का दिव्य संदेश देते हुये कहते हैं :-
तस्मात्त्वमिन्द्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञान विज्ञान नाशनम् ॥ गीता ३/४१॥
कामनाएँ ही ज्ञान-विज्ञान को नष्ट करती हैं। पहले
इन्द्रियों को संयमित करो, तभी विजय मिलेगी तथा यो मे दर्पं
व्यपोहति जिसने अभिमान नष्ट कर लिया है। यस्य नाहंकृतो
भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते । गीता १८/१७ अभिमान रहित बुद्धि
ही शक्तिशाली होती है। “यो मे प्रतिबलो लोके” (जो मेरे बल
के समान बलशाली हो) नारायण के अतिरिक्त महाशक्ति के
बराबरी वाला और कौन हो सकता है, केवल नारायण ही होंगे,
यह ज्ञान होना चाहिये ।
दिव्य-शक्तियों की उपलब्धियों के अनेक दृष्टान्त भारतीय
आर्ष ग्रन्थों में प्रचुर मात्रा में विद्यमान हैं। आधि दैविक शक्ति
प्राप्ति का उदाहरण कुन्ती हैं। उन्होंने अपने तपोभूत मन से
जिसका आह्वान किया, वही उपस्थित हुआ चाहा तो सूर्य को
आहूत किया, चाहे तो धर्म को। आधि भौतिक शक्तियों का पुंज
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १००
भरद्वाज मुनि के इंगित पर नृत्य करता है। जब भरत जी अपने
पूज्य पिता जी के और्ध्वदैहिक संस्कारोपरान्त गुरुजनों की अनुमति
से श्रीराम जी को वन से अयोध्या लौटा लाने के लिये चित्रकूट
को प्रस्थान करते हुए, मार्ग में भरद्वाज मुनि के आश्रम में ससैन्य
परिकर एवं परिवार सहित रात्रि में विश्राम करने के लिए ठहरे;
तब मुनि के द्वारा क्षणभर में समस्त सुख सुविधा उपस्थित
करदी गईं हैं।
इससे स्पष्ट है कि संयमी, निरभिमानी तथा ज्ञानी के लिए
ये महाशक्तियाँ सहज सुलभ हैं।
१०१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
षष्ठोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ नागाधीश्वर विष्टरां फणिफणोत्तंसोरुरत्नावली
भास्वद्देहलतां दिवाकर निभां नेत्रत्रयोद्भासिताम् ।
मालाकुम्भ कपाल नीरजकरां चन्द्रार्धचूड़ां परां
सर्वैज्ञेश्वर भैरवाङ्कनिलयां पद्मावतीं चिन्तये ॥
जगज्जननी जगदम्बा जगदीश्वरी नागराज शेष के आसन
पर विराजमान है, उनकी देहलता नागों के फणों में देदीप्यमान,
मणियों की सुन्दर भव्य माला से दीप्तिमान हो रही है, उन सूर्य
के समान तेजस्विनी के तीनों नेत्र उनके सौन्दर्य की और भी
अभिवृद्धि कर रहे हैं । उनके हाथों में माला, कुम्भ, कपाल और
कमल सुशोभित हैं, तथा मस्तक पर अर्द्ध चन्द्र-मुकुट जिनके
सौन्दर्य-माधुर्य में चार-चांद लगा रहा है, सर्वैज्ञेश्वर भैरव के
अङ्क में निवास करने वाली ऐसी परमोत्कृष्ट पद्मावती देवी का
मैं चिन्तन करता हूँ ।
इस छठे अध्याय में यह वर्णन है उस सुग्रीव दूत से शुम्भ
ने भगवती की यह प्रतिज्ञा सुनकर दैत्यराज धूम्रलोचन को उस
सुन्दरी को पकड़कर लाने का आदेश दिया; किन्तु आसुरी भाव
वाला दैत्य बेचारा महाशक्ति को कैसे ग्रहण कर सकता है ?
धूम्र लोचन-जिसके नेत्रों में काला धुआं भरा हो अर्थात् दृष्टि ही
धुँधली हो गई । मानसकार के अनुसार "ज्ञान-विराग नयन
उरगारी" नेत्र तो ज्ञान और वैराग्य ही होते हैं । श्रुति-स्मृति भी
नेत्र बताये गये हैं, इसमें ये किसी प्रकार के लक्षण नहीं हैं ।
उसके लिए महाशक्ति का स्पर्श तो दूर सम्मुख उपस्थित होना
भी असम्भव है । ऐसा ही हुआ,
"हुंकारेणैव तं भस्म सा चकाराम्बिका ततः । ६/१३
माँ ने हुङ्कार मात्र से उसे भस्मीभूत कर दिया । धूम्र-
लोचन के मरने की सूचना पाकर शुम्भ ने चण्ड-मुण्ड को भेजा ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०२
नमो नमो अम्बे
नमो नमो दुर्गे सुख करनी, नमो नमो अम्बे दुख हरनी ।
शशि ललाट मुख महा विशाला, नेत्र लाल भृकुटी विकराला ।
तुम संसार शक्ति लय कीना, पालन हेतु अन्न धन दीना ।
अन्नपूर्णा हुई तू जगपाला, तुम ही आदि सुन्दरी बाला ।
शिव योगी तुम्हारे गुण गावे, ब्रह्मा विष्णु तुम्हें नित ध्यावें ।
धर्यो रूप नरसिंह को अम्बा, प्रकट भई फाड़ के खम्बा ।
रक्षा करि प्रहलाद बचायो, हिरणाकुश को स्वर्ग पठायो ।
महिषासुर नृप अति अभिमानी, जेहि अघ भार मही अकुलानो ।
रूप कराल काली को धारा, सेन सहित तुम तिहि संहारा ।
ज्वाला जी में ज्योति तुम्हारी, तुम्हें सदा पूजें नर नारी ।
प्रेम भक्ति से जो यश गावें, दुःख दारिद्रय निकट नहिं आवें ॥
ध्यावें तुम्हें जो भी मन लाई, जन्म-मरण ताको छुटि जाई ॥
१०३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
सप्तमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ ध्यायेयं रत्नपीठे शुककलपठितं शृण्वतीं श्यामलाङ्गीम् ।
न्यस्तैकांघ्रिं सरोजे शशिशकलधरां बल्लकीं वादयन्तीम् ॥
कह्लाराबद्धमालां नियमित बिलसच्चोलिकां रक्त वस्त्राम् ।
मातङ्गी शंख पात्रां मधुर मधुमदां चित्रकोद्भासि भालाम् ॥
मैं रत्न जटित सिंहासन पर विराजमान होकर तोते द्वारा
पठित सुन्दर मधुर शब्द सुनती हुई, अङ्गों की श्यामल कान्ति से
कान्तिवान, अपना एक चरण कमल पर रखकर, ललाट में अर्द्धचन्द्र
तथा कण्ठ में कह्लार पुष्पों की माला धारण किये हुये वीणा
बजा रही हैं; जो रक्त-वर्ण (लाल रंग) की साड़ी पहने हुए है
उसी रंग की कञ्चुकि जिनके अङ्गों में कसी हुई शोभा पा रही
हैं, हाथ में शङ्ख भरा पात्र लिये हैं, जिनके मुख पर मधु का
हल्का सा प्रभाव भाषित हो रहा है, ललाट में मङ्गल-चित्र
बिन्दी शोभित किये हुये हैं उसी मातङ्गी देवी का ध्यान
करता हूँ ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-हे राजन् ! शुम्भ की आज्ञा
पाकर वे चण्ड-मुण्ड आदि दैत्य चतुरङ्गिणी-(पैदल, रथ, हाथी,
घोड़े) सेना साथ ले, अस्त्र शस्त्रों से सुसज्जित होकर देवी पर
आक्रमण करने के लिए चल दिये । गिरिराज हिमालय के
सुवर्णमय उच्चशिखर पहुँचकर उन्होंने मन्द-मन्द मुस्कराते हुए
सिंह-वाहिनी को देखा, तो अस्त्र-शस्त्रों से प्रहार करते हुए
चारों ओर उस देवी पर टूट पड़े ।
तब अम्बिका ने शत्रुओं पर क्रोध किया तो उनका मुख
काला पड़ गया, ललाट में भौंहें टेढी हो गयीं और वहाँ तुरन्त
विकराल काली प्रकट हुईं जो तलवार, पाश और खट्वाङ्ग
धारण किये ये, चीते के चर्म की साड़ी पहने हुये, नर मुण्डों
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०४
की माला से विभूषित थी। मांस रहित अस्थि-पंजर, विशाल
मुख लपलपाती हुई जीभ, डरावनी लाल-लाल भोतर धँसी हुई
आँखें, भयंकर गर्जना करती, अनेक दैत्यों का वध करती,
कुछ को मुँह के द्वारा चबाती हुई, अस्त्र-शस्त्रों को चूर्णित
करती हुई, हाथी घोड़ों को मुँह में डालती सैन्य संहार करने
लगी। तब कुपित होकर दैत्य सेनापति चण्ड-मुण्ड विपरीत दिशाओं
से माँ पर टूट पड़े। दोनों के चक्रों से छुटे हुये बाणों को मुख
में लेकर काली देवी ने भयंकर गर्जना की और खड्ग-से 'हं' का
उच्चारण कर केश पकड़ कर पहले चण्ड का मस्तक काट लिया,
उसे मरा हुआ देख मुण्ड भी देवी की ओर दौड़ा । उसे भी रोष
में भर देवी ने धरती पर सुला दिया। तत्पश्चात् काली ने उन
दोनों के मस्तक हाथ में लेकर चण्डिका के पास जाकर प्रचण्ड
अट्टहास करते हुए कहा—देवि ! मैंने चण्ड और मुण्ड दोनों
महापशुओं को भेंट किया है अब युद्ध-यज्ञ में शुम्भ और
निशुम्भ का वध स्वयं करना।
चडि कोपे, क्रोध अर्थ में प्रयुक्त होने वाली धातु से :चण्ड'
शब्द प्रतिपादित होता है इसी से चाण्डाल भी बनता है। 'मुडि'
खण्डने से मुण्ड बनता है; खण्डन करने में अश्रद्धा और द्वैत
भाव का होना अनिवार्य है। क्रोध भाव से चाण्डाल के आचरण
होते हैं। क्रोध आने का मूल कारण द्वैत भाव ही है और
द्वैत भाव का जनक अज्ञान ही है । इष्ट पर दृढ़ता करने
के कारण काकभुशुण्डी को लोमश ऋषि के शाप का भाजन
होना पड़ा, किन्तु क्षमा और सहिष्णुता गुणों के द्वारा ही पुनः
ऋषि के कृपा भाजन बन गये ।
उपर्युक्त दृष्टान्त चण्ड-मुण्ड के वध के व्यावहारिक प्रयोग
है। इस अध्याय में माँ काली के द्वारा जो चंड मुंड का वध किया
गया है। वे ये क्रोध रूप चंड और द्वैत बुद्धि रूप मुंड हैं
साधक को इनका बड़ा ध्यान रखना चाहिए । जो इन दोनों
का वध कर लेता है उसे जगत् में ख्याति मिलती है। **
१०५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
अष्टमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ अरुणां करुणातरङ्गिताक्षीं
धृतपाशांकुश बाण चापहस्ताम् ।
अणिमादिभिरावृत्तां मयूखै-
रहमित्येव विभावये भवानीम् ॥
मैं गौर वर्णाङ्गाभामयी, करुणा तरङ्गायित नयना, पाश,
अंकुश, बाण और धनुष हाथ में धारण करने वाली अणिमा
आदि सिद्धियों की किरणों से आवृत्ता भवानी का चिन्तन करता
हूँ।
महर्षि कहते हैं कि चण्ड-मुण्ड दैत्यों के मारे जाने तथा
उनकी सेना के संहार के संदेश से दैत्यराज शुम्भ बड़ा क्रोधित
एवं क्षुभित हुआ और उसने सम्पूर्ण दैत्य सेना को युद्ध के लिए
प्रस्थान करने की आज्ञा दी। उसकी सेना का संकेत-अपनी
सेनाओं सहित उदायुध नाम के छियासी सेनापति, कम्बु नाम
वाले दैत्यों के चौरासी सेनानायक सवाहिनी, कोटिवीर्य कुल के
पचास और धौम्र कुल के सौ असुर सेनापति अपनी-अपनी सेना
के साथ तथा कालक, दौर्हद, मौर्य और कालकेय असुर भी युद्ध
के लिए प्रस्थित हुए। इस भयंकर विशाल वाहिनी को देख
चण्डिका ने अपने धनुष की टंकार, शंख की ध्वनि तथा सिंह की
दहाड़ की ध्वनि से आकाश पृथ्वी को गुँजित कर दिया, घण्टे की
ध्वनि दिशाएँ ध्वनित करने लगी। काली ने उस भयानक ध्वनि
से अपना मुख बढ़ा लिया। इसी बीच असुरों के विनाश और
देवताओं के अभ्युदय के लिए ब्रह्मा, शिव, कार्तिकेय, विष्णु तथा
इन्द्र आदि देवों की शक्तियाँ-जो रूप, वेश भूषा, वाहन, बल,
पराक्रम और आयुधों में अपने-अपने देवताओं के समान थी,
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०६
उनके शरीरों से निकलकर चण्डिका की सहायता के लिए दैत्य-
दलन हेतु समरांगण में आ गईं ।
बड़ा भयंकर युद्ध हुआ, दैत्यों की वाहिनी प्रातः कालीन ओस
की बूँदों की तरह विनष्ट हो रही थी, तभी रक्त बीज इन्द्र की
शक्ति ऐन्द्री के वज्र से घायल हो गया । उसकी प्रत्येक रक्त-बूँद
से उसी के समान बल-पराक्रम सम्पन्न आयुधों से युक्त भयंकर
राक्षस वीर पैदा होकर मातृकाओं को मारने लगे ।
यावन्त पतितास्तस्य शरीराद्रक्त विन्दवः ।
तावन्तः पुरुषा जातास्तद् वीर्यबल पराक्रमाः ॥ ८/४४
ज्यों-ज्यों इस रक्तबीज के शरीर पर प्रहार होता, रक्त-
पतन से अनेक असुर वर्षा में पैदा होने वाले जीवों की तरह पैदा
हो कर लड़ने लगते । इस दृश्य से देवता बड़े भयभीत हुए । उन्हें
उदास देखकर चण्डिका ने काली को अपने शस्त्रपात से गिरने
वाले रक्त विन्दुओं और उनसे उत्पन्न होने वाले महादैत्यों को मुख
से भक्षण करने का आदेश दिया । चामुण्डा की इस प्रक्रिया से
महा भयावह रक्तबीज युद्ध में मारा गया । देवताओं को अनुपम
हर्ष प्राप्त हुआ । मातृ-गण नृत्य करने लगा ।
इस अध्याय में रक्तबीज वध का प्रसङ्ग बड़ा शिक्षा प्रद
एवं महत्त्वपूर्ण है । बड़ा सुन्दर संकेत है—यह 'रक्त-बीज'
इच्छाओं का नाम है । मनुष्य की इच्छाएँ कभी समाप्त नहीं
होती हैं । प्रत्येक इच्छा सगर्भा होती है जैसे ही एक इच्छा
समाप्त होती है वैसे ही उससे भी अधिक प्रबल इच्छा पैदा हो
जाती है । इससे विषयों की अभिलाषा नष्ट करना साधक के
लिए कितना कठिन है । यह इस प्रसङ्ग से समझ सकते हैं ।
इन्द्रियाँ अथवा करण तो चौदह हैं; परन्तु प्रत्येक करण के विषय
अनन्त हैं । उनका पार पाना बहुत कठिन है । जैसे रक्त बीज
के रक्त की एक बूँद में जब इतनी प्रबलता है भला बताइए
कितनी बूँदें हुई होगी । यही असंख्य शब्द का प्रयोग विषयों की
१०७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
वासनाओं के लिए है । इनके मारने का उपाय यही है कि रक्त
बीज के रक्त की बूंद पृथ्वी पर न गिर सके, यह कार्य महाकाली
को सौप दिया, जिसने उसे सम्पन्न किया । विषयासक्ति रक्त-
बोज के मरने पर ही शान्ति को प्राप्त होती है ।
श्री अम्बे जी की आरती
अम्बे तू है जगदम्बे काली, जय दुर्गे खप्पर वाली.
तेरे ही गण गायें भारती ।
ओ मइया हम सब उतारें तेरी आरती ॥ १
तेरे (जगत के) भक्तजनों पर भीड़ पड़ी है भारी,
दानव दल पर टूट पड़ो करके सिंह सवारी,
सौ-२ सिंहों सी बलशाली, अष्टादस भुजाओं वाली,
दुष्टों को तो तू ही संहारती ॥ २ ओ मैया हम सब
माँ बेटे का इस जग में, बढ़ा ही निर्मल नाता ।
पूत कुपुत सुने हैं पर ना माता सुनी कुमाता ।
सब पर अमृत बरसाने वाली, सबको हर्षाने वाली-
मैया भँवर उतारती-ओ मैया सम सब उतारें-
नहीं मांगते धन और दौलत, ना मांगे चांदी ना सोना,
हम तो मांगे माँ तेरे मन में एक छोटा सा कोना,
सब पर करुणा दर्शाने वाली, विपदा मिटाने वाली
सतियों के सत को संवारती ॥ ओ मैया सब
चौदस के दिन तेरे भवन में, भीड़ लगी है भारी ।
जो कोई माँगे सोई फल पावे, कोई न जाये खाली ।
सब की झोली भरने वाली, मांगी मुरादों वाली ।
ओ मैया हम सब उतारें तेरो आरती ॥
खनन-खनन घण्टा बाजे, घण्टों की झन्कार ।
तेरे भवन में मैया तेरी हो रहा जय-जय कार ॥
द्वार खड़े माँ तुझे पुकारें, एक बार तो आजा ।
भक्त खड़े, माँ तुझे पुकारें आकर दर्श दिखाजा ॥
अम्बे तू है जगदम्बे कालो, जय दुर्गे खप्पर वाली
तेरे ही गुण गायें भारती, ओ मैय्या हम सब उतारें०
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ १०८
नवमोऽध्यायः
ध्यानम्
ॐ बन्धूक काञ्चननिभं रुचिराक्षमालां
पाशांकुशौ च वरदां निजवाहुदण्डैः ।
विभ्राणमिन्दु शकलाभरणं त्रिनेत्र
मर्धाम्बिकेशमनिशं वपुराश्रयामि ॥
बन्धूक-दुपहरिया पुपहरिया पुष्प की रक्तिमा-लालिमा
तथा स्वर्ण की पीतिमा की कान्ति से सुशोभित अर्द्ध नारीश्वर
के श्री विग्रह की शरण लेता हूँ; जो अपनी भुजाओं में सुन्दर
अक्षमाला, पाश, अंकुश और वरद मुद्रा धारण किये हुए हैं;
जिसके ललाट पर अर्द्ध चन्द्र का आभूषण आभूषित है और तीनों
नेत्रों से सुशोभित है ।
मधु-कैटभ का वध हो या धूम्रलोचन का ध्वंस, अथवा
चण्ड-मुण्ड संहार या फिर रक्तबीज के रक्त-पान से विनाश,
इन सब का उद्धार हुआ करुणामयी माँ के हाथ से। यह दैवी
कृपा का विधान है कि जिसे हम लय, प्रलय, विनाश, ध्वंस
कहते हैं वह कष्टों से, दुःखों से मुक्ति है। इसी में लोक-कल्याण
निहित है, अतः प्रत्येक मङ्गलाकांक्षी को भगवती का ध्यान
करना चाहिए ।
भगवती के चरित्र-लीला के आनन्द में निमग्न जिज्ञासु
राजा ने महामति मेधा से विनत भाव से कहा—भगवन् ! आपके
द्वारा रक्त-बीज के वध से सम्बन्धित देवी-चरित्र की यह अद्भुत
महिमा जानकर बड़ी उत्सुकता हो रही है कि इसके पश्चात्
क्रोध में भरे हुए शुम्भ-निशुम्भ ने क्या किया; सुनना चाहता
हूँ ।
महामुनि मेधा ने बताया—राजन् ! जन-धन-बल का संयोग
जैसे मनुष्य को खुशी देता है उसी प्रकार इनका वियोग महा
१०६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दुःखदायो बन जाता है, वह क्रोध में आग बबूला हो जाता है ।
अतः स्वाभाविक था कि रक्त बीज जैसे सेनापति तथा विशाल
सेना के मारे जाने पर शुम्भ-निशुम्भ का बौखला जाना
स्वाभाविक था । विमर्ष में भरकर निशुम्भ देवी की ओर दौड़ा ।
इसके साथ विशाल दैत्य सेना थी । शुम्भ भी मातृगणों से युद्ध
करके चण्डिका को मारने आ पहुँचा । दिव्य अस्त्रों से भयंकर
युद्ध हुआ । निशुम्भ ने तीखी तलवार से देवी के वाहन पर प्रहार
किया, फिर क्या था ? माँ ने उसके अनेक प्रहारों को अपने रण-
कौशल से छिन्न-भिन्न कर दिया । काली ने दोनों हाथों के आघात
से पृथ्वी को हिला दिया । शिवदूती ने दानवों के लिए अमंगल-
कारी अट्टहास किया, देवों ने जय-जयकार किया, इसी उपयुक्त
अवसर पर देवी ने राक्षस शुम्भ पर अपना शूल चला दिया, वह
मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ।
भाई के पतन को निशुम्भ सहन न कर सका, उसने अपने
बाणों से देवी, काली तथा सिंह को घायल कर दिया । दुर्गम
पीड़ा विनाशिनी दुर्गा ने कुपित होकर उसके बाणों और चक्रों
को काट कर अपने शूल से उसकी छाती विदीर्ण कर दी, जिससे
दूसरा महाबली पुरुष निकल कर देवी को ललकारने लगा, देवी
ने ठठाकर हँसते हुए तीक्ष्ण खड्ग से उसका सिर काट डाला ।
सिंह ने दैत्यों की गर्दन नोची, कालिका ने अनेक दैत्यों का भक्षण
किया । वैष्णवी ने चक्र से दानवों के टुकड़े-टुकड़े कर दिए । शेष
भाग गये । इस प्रकार निशुम्भ का वध हुआ ।
इस युद्ध से विदित हुआ कि ब्रह्मा, विष्णु, शिव तथा
इनकी शक्तियाँ-ब्रह्माणी, रुद्राणी, वैष्णवी, कालिका, दुर्गा सभी
एक हैं; इस एक तत्व की उपासना ही लक्ष्य होना चाहिए चाहे
इष्ट किसी भी स्वरूप को बनायें ।
दूसरी बात यह है कि निशुम्भ की छाती से दूसरे पुरुष का
पैदा होकर पुनः देवी को ललकारने का तात्पर्य यह है कि चित्त
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ११०
से आसुरी वृत्तियाँ संयम, नियम के द्वारा नियंत्रित करने पर
भी पैदा हो जाती है, जो हमारी दैवी वृत्तियों को निगलना
चाहती है । अतः साधक को सजग रहना चाहिए, माँ की शरण
लेनी चाहिए । माँ के निम्न मंत्र से सब मनोरथ पूरे हो सकते
हैं-
यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम् ।
परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥ कवच ४४ ॥
माँ की शरण में पहुँचने पर मनुष्य की निश्चित ही समस्त
कामनायें पूर्ण होती हैं और वह परम ऐश्वर्य का भागी होता है ।
अतः माता की शरण लेना जीवन की सार्थकता है ।
१११ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
दशमोऽध्याय
ध्यानम्
ॐ उतप्त हेम रुचिरां रवि चन्द्र वह्नि-
नेत्रां धनुश्शर युताङ्कुश पाश शूलम् ।
रम्यैर्भुजैश्चदधतीं शिव शक्ति रूपां
कामेश्वरीं हृदि भजामि धृतेन्दुलेखाम् ॥
मैं तपाये हुए स्वर्ण के समान सुन्दर, सूर्य, चन्द्र और
अग्नि तीनों नेत्र वाली; अपनी सुन्दर भुजाओं में धनुष, वाण
अंकुश, पाश और शूल धारण किए तथा मस्तक पर अर्द्धचन्द्र
धारण किए हुए शिव शक्ति-शक्ति स्वरूपा कामेश्वरी का हृदय
में चिन्तन करता हूँ ।
खोट निकालने के लिए सोने को अग्नि में तपाया जाता
है, अतः देहाभिमान को गलाने के लिए साधना की अग्नि में
रहना चाहिए । रवि - चन्द्र वह्नि, क्रमशः प्रकाश,
आह्लादक एवं दाहक एवं पाचक है, प्रकाश के तीन ही आधार
है, घिना प्रकाश के अन्धकार विलीन हो नहीं सकता, सबकी
प्रकाशिका एक मात्र सच्चिदानन्दमयी माँ ही हैं, वे ही भक्त
पर रीझकर समस्त कामनायें-पूर्ण करती हैं अतः कामेश्वरी हैं
उन्हीं का ध्यान करना अपेक्षणीय है ।
ध्यानोपरान्त ऋषि कहते हैं-राजन् ! अपने प्राणों के
समान प्यारे भाई निशुम्भ को मारा गया देख तथा सेना का
संहार जान संहार जान शुम्भ कुपित होकर बोला-“दुष्ट दुर्गे !
तू बल के अभिमान में बड़ी मानिनी बनी हुई है ।” किन्तु दूसरी
स्त्रियों का बल लेकर लड़ती है । माँ ने कहा-‘अरे धूर्त' मैं अकेली
ही हूँ, मेरे सिवा संसार में दूसरा कौन है, ये सब मेरी विभूतियाँ
हैं, मुझमें प्रवेश कर रहीं हैं ऐसा कहते ही केवल अम्बिका देवी
ही अवशेष रहीं ।