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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

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पृष्ठ 119

६५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
है। दुःख का कारण धन नहीं है अपितु जितने धन के साथ मेरा
जुड़ा है; उसके नष्ट होने पर ही तो दुःख हुआ । रेडियो,
दूरदर्शन अथवा समाचार-पत्र में अनेक मनुष्यों की मृत्यु की
घटनायें पढ़ते हैं, सुनते हैं, देखते हैं, किन्तु रोते नहीं, ओर
यदि अपने परिवार के किसी व्यक्ति, पशु के साथ ऐसी घटना
घटित हो जाये तो क्या दशा होती है ? इसके सब भुक्त भोगी
है । अतः कहने की आवश्यकता नहीं, स्पष्ट ही है कि दुःख
वस्तु, पदार्थ, मनुष्य अथवा धन के होने या न होने, या नष्ट होने
पर नहीं होता अपितु ‘मेरा' जिस-जिस के साथ जुड़ा है, उसके
जाने पर दुःख होता है । अतः स्पष्ट हो गया है कि धन, जन,,
पद, अधिकार आदि प्रति मोह या ममता ही दुःखद है ईश्वर
की सृष्टि में दुःख नहीं हैं। इसी मोह, ममता को जन्म देकर
अविद्या ने जीव को जन्म-मरण के चक्र में भ्रमित किया है।
तृतीय चरित्र में इस अविद्या-महाठगिनी माया का संहार
प्रतिपादित हुआ है । इसलिए इसके ऋषि (प्रलयंकारी) रुद्र हैं
और ज्ञान की अधिष्ठात्री देवी महासरस्वती इसकी देवता हैं।
अज्ञानान्धकार को विलीन करने अविद्यान्धकार ध्वंसी, प्रकाश
के प्रकाशक सूर्य देव इसके तत्व हैं; अनुष्टुप् छन्द है; कष्ट
संहारिणी, दैत्य विनाशिनी, भयंकर कराल काल स्वरूपिणी
‘भीमा' शक्ति हैं। तीनों लोकों के हित के लिए अरुण नामक
दैत्य का विनाश करने के लिए ‘भ्रामरों' का रूप धारण करके
भ्रामरी के नाम से पूजित हुई थी । आसुरी प्रवृत्तियों-अविद्या को
नष्ट करने के कारण भ्रामरी बीज है , भगवती सरस्वती वीणा
धारिणी वीणा में सात स्वर ‘झंकृत' होते हैं । अतः उनका
सम्बन्ध सामवेद से होने के कारण सामवेद स्वरूप बतलाया
गया है ।
महामना मनस्वी मेधा ऋषि ने पराम्बा को नमस्कार
करके कथा प्रारम्भ की- हे राजन् ! प्राचीनकाल में शुम्भ और