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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 156 में से

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पृष्ठ 121

६७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
कहते हैं इनका रंग काला पड़ जाने से इनका नाम 'कालिका'
पड़ गया।
इधर अम्बिका के परम, मनोहर, दिव्य रूप से मुग्ध होकर
वहाँ विचरण करने वाले चण्ड-मुण्ड दैत्यों ने अपने स्वामी शुम्भ
के पास जाकर माँ के रूप लावण्य की प्रशंसा की तथा उन्हें
ही एक मात्र भोग्य बताया। दैत्यराट् शुम्भ ने तुरन्त अपने
दूत सुग्रीव को देवी के पास भेजा और कहा- "तुम जाकर मेरी
प्रशंसा करके साम दाम, दण्ड-भेद से किसी भी प्रकार उस
सुन्दरी को यहाँ ले आओ"। दूतने हिमालय पर जाकर बड़े
विस्तार से मधुर शब्दावली में शुम्भ की प्रशंसा करके पराम्बा
को उसके पास चलने के लिए आमंत्रित किया। माँ ने हँसते हुए
अपनी प्रतिज्ञा इस प्रकार सुनाई :-
यो मां जयति संग्रामे, यो मे दर्पं व्यपोहति।
यो मे प्रतिबलो लोके, स मे भर्त्ता भविष्यति ॥ ५/१२०
“जो मुझे संग्राम में जीतकर मेरे अभिमान को चूर्ण कर
सकेगा, तथा संसार में मेरे समान बलशाली होगा, वही मेरा
स्वामी होगा।” कहकर विनम्रता से अपनी विवशता प्रकट
करदी।
वह निशाचर भला इसका क्या अर्थ समझे, वह तो इतना
ही समझता है कि यह एक स्त्री रत्न है, परम सुन्दरी है, अत्यंत
सुकुमारी है, उसके मुख से 'युद्ध करने वाला तथा जीतने वाला
ही मेरा पति होगा' की बातें सुनकर हँसने लगा और पुनः बोला
हे देवी ! वह शुम्भ इतना प्रबल दैत्य है कि तुम्हारे केशों को
पकड़कर घसीटता हुआ ले जायेगा, तुम्हारा अपमान होगा। तुम
इतनी सुकुमारी अबला क्या कर सकोगी ?
सा त्वं गच्छ मयैवोक्ता, पार्श्वं शुम्भ निशुम्भयोः ।
केशाकर्षणनिर्धूत गौरवा मा गमिष्यसि ॥ ५/१२६