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सर्वकोश
दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)

Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary

महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा

DevanagariHindipublished156 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 156 में से

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पृष्ठ 120

श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६६
निशुम्भ नाम के दो विशालकाय महाबलशाली अत्यन्त पराक्रमी
दैत्य हुए । जिन्होंने देवताओं को परास्त करके उनको स्वर्ग से
वहिष्कृत कर दिया, उनको समस्त अधिकारों से वञ्चित कर
स्वयं राजा बन गये । सूर्य, चन्द्र, अग्नि आदि का कार्य छीन
कर स्वयं शासन करने लगे । इस दुःखद परिस्थिति में समस्त
देवता क्षुब्ध होकर गिरिराज हिमालय पर जाकर पराम्बा की
स्तुति करने लगे । इस स्तुति का नाम “देवी-सूक्त” है यह देवी
सूक्त भक्तों के पाठ करने पर समस्त मनोकामनायें पूर्ण करता
है । भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों प्रकार की सिद्धियाँ सिद्ध
करता है अतः बड़ा महत्वपूर्ण है । संसार के प्रत्येक व्यवहार में,
जड़-चेतन में, कण-कण में यही पराम्बा परमेश्वरी व्याप्त हैं,
ऐसा बताकर प्रत्येक श्लोक में ‘नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै
नमो नमः’ कर तीन-तीन बार नमस्कार किया है जैसे विष्णु
माया, चैतन्य, बुद्धि, निद्रा, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, क्षान्ति
लज्जा, शान्ति, श्रद्धा, लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति दया, पुष्टि, तुष्टि
(आजकल ‘तुष्टि को ही संतोषी माता कहा जाता है) भ्रान्ति,
माता आदि के स्वरूप को जगदम्बा बताकर नमस्कार किया
गया है ।
इस प्रकार यदि साधक संसार के प्रत्येक पदार्थ को
महाशक्ति का स्वरूप समझ लें, तो निस्संदेह वह अविद्या को
पार कर सकता है । देवताओं ने इस प्रकार स्तुति करके
जगदम्बा को याद दिलाई कि आपने हमें वचन दिया था—
“आपत्ति आने पर रक्षा करूंगी” अपने वचनानुसार हमारी
आपत्तियों को दूर कीजिये । भगवती पारवती यहाँ गंगा स्नान
के लिये आई हुई थीं, उन्होंने देवों की स्तुति सुनकर अपने
शरीर कोषों से शिवा देवी का प्राकट्य किया, वे बोलीं
“तुम्हारा कल्याण हो । देवताओं के द्वारा दैत्यों का अन्याय
सुनकर पार्वती के शरीर से अम्बिका प्रकट हुईं । इन्हें ‘कौशिकी’