दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
मध्यम चरित्र: महिषासुर-मर्दिनी महालक्ष्मी प्रादुर्भाव व वध (अध्याय २-४)
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४२
इन दृष्टान्तों से यहाँ यह सीखना है कि इन विकारों
को कमजोर न समझो और असावधान न रहो। अपने मन का
भरोसा न करो, पूजा अनुष्ठान का अभिमान न करो । सदा
भगवान् की शरण में रहो; विनीत भाव से प्रार्थना करते
रहो—'हे दयामयी माँ ! करुणापूरित नयना, सदार्द्रचित्ता
पराम्बा ! मैं अवोध शिशु की तरह आपकी गोदी में हूँ" कृपा
करके सद्बुद्धि दो । इसी से शाक्त साधक देवी सूक्त के पाठ
का बहुत महत्व मानते हैं ।
सारा ब्रह्माण्ड प्रकृति माँ की गोद ही तो है । इसका
अनुभव करने वाला साधक आये हुए अहंकार, काम क्रोधादि
शत्रुओं से परास्त नहीं होता, किन्तु यह बेचारा सुरथ परास्त
हो गया । रामायण में मेघनाद ने अमोघ शक्ति के द्वारा श्रो
लक्ष्मण जी को बेहोश कर दिया था क्योंकि उस समय श्री
लक्ष्मण जी के साथ न श्री रामजी थे और न संत प्रवर श्री
हनुमान जी । श्री रामजी ज्ञान स्वरूप हैं और हनुमानजी
सद्गुरु स्वरूप । दोनों के अभाव से विवेक रूप लक्ष्मण प्रबल
होने पर भी काम रूप मेघनाद से पराजित हो गये थे जब वे
ही लक्ष्मण जी श्रीरामजी तथा श्री हनुमानजी के साथ होते हैं;
अथवा उनका आश्रय पा लेते हैं तो सदा के लिये कामरूप
मेघनाद को मार डालते हैं । ठीक इसी प्रकार प्रत्येक साधक
को सावधान रहना चाहिये और उन शत्रुओं को कमजोर नहीं
समझना चाहिये ।
कोला विध्वंशी राजाओं से परास्त होकर भी सुरथ चैन
से न रह सका; क्योंकि उसके अन्तरंग साथी मन्त्रियों ने ही
उसका सम्पूर्ण कोष हर लिया । इसका अर्थ यह कि बाह्य की
अपेक्षा अन्तरंग शत्रु अधिक भयंकर एवं घातक होते हैं क्योंकि
उनके प्रति हम उतने सजग नहीं होते । रावण और पृथ्वीराज
की पराजय का कारण अपने ही विभीषण तथा जयचंद रहे ।
अतः अत्यन्त सावधानी एवं सजगता की आवश्यकता है ।
४३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“अमात्यैर्बलिभिर्दु ष्टै दुर्बलस्य दुरात्मभिः ।
कोशोवलं चापहृतं तत्रापि स्वपुरे ततः ॥”
इस मन्त्र से यही शिक्षा ग्रहण करनी है कि व्यवहार में
अन्तरंग दुष्टात्माओं से किसी भी प्रकार शत्रुता का भाव प्रकट
न होने दें । सुरथ के कोष लुटने का यही भाव है कि शारीरिक
और मानसिक सामर्थ्य समाप्त हो गई । मानव-शरीर में पांच
कोष होते हैं :-(१) अन्नमय कोष-(स्थूल शरीर) (२)
प्राणमय कोष-जिस शक्ति या एनर्जी से क्रियायें सम्पादित होती
हैं (३) मनोमय कोष-(इच्छा-शक्ति) (४) विज्ञानमय कोष
(बुद्धि शक्ति) जिससे सत्-असत्, उचित, अनुचित का निर्णय
किया जाता है । (५) आनन्दमय कोष-जिसके द्वारा सुख की
प्रतीति होती है ।
ये पाँचों कोष आत्मा के प्रकाश से ही प्रकाशित होते हैं ।
इन सबका शासक, राजा जीवात्मा है । वही सुरथ है; किन्तु जब
वह अपने को सामर्थ्यहीन, दीन दुर्बल, कंगाल समझने लगता है
तो उसे अपना ही जीवन भार प्रतीत होता है, और सोचता है
कि समाज के सभी लोग हमसे चाहते हैं न कि हमको, सुरथ
की यह अवस्था सभी की है । अब बेचारा स्त्री, पुत्रादि से
अपमानित होने पर घोड़े पर बैठकर बन की ओर चल दिया ।
‘वन-षण सम्भक्तौ’ वन का अर्थ भजनीय स्थान होता है । प्रायः
व्यक्ति ऐसी अवस्था में वैराग्य प्राप्त करता है । जबतक समाज
तथा संसार से निराशा नहीं होती, तब तक भगवान् की ओर कोई
नहीं चलता । इसी से जिन परिवारों में स्त्री-पुत्रादि से बहुत
सुख मिलता है; उन परिवारों में पूर्वज लोग “चौथेपन जाइये नृप
कानन” की बात भूल जाते हैं । सुरथ घर से निकला हुआ
अकेला ही समझ रहा है; किन्तु वासना रूपी घोड़े पर बैठ
कर गया है; तब भला एकाकी कैसे ? ‘एकाकी हयमारुह्य
जगाम गहनं बनम्, विचार करने से विदित होता है कि
साधना स्थल की ओर बढ़ते समय यह वासना साथ नहीं छोड़ती ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४४
यही वासना उसके वैराग्य को शिथिल कर देती हैं यदि इस
वासना का उपासना में परिवर्तन हो जाये, तो काम से हटकर
राम में लगा देती है ।
राजा एक आश्रम में पहुँचा । घोड़े से उतरकर आश्रम के
पवित्र वातावरण को देखने लगा, बहुत से महात्मा साधना में
संलग्न हैं ब्रह्मचारी वेद-ध्वनि कर रहे हैं, होम-धूम अपनी दिव्य
गन्ध समस्त दिशाओं में विकीर्ण कर रहा है, पशु-पक्षी निर्भय
निर्द्वन्द्व निर्वैर विचरण कर रहे हैं । यही आश्रम शब्द का अर्थ
भी है । 'श्रमु तपसि खेदेच' जहाँ धर्म और मोक्ष के लिए पुरुषार्थ
होता हो वह आश्रम है; और जहाँ अर्थ, काम के लिए पुरुषार्थ
होता है उसे परिश्रम कहते है । आश्रम में अहिंसा की प्रतिष्ठा
होने के कारण निर्वैर भाव नैसर्गिक है । 'अहिंसा प्रतिष्ठाभ्यां
बैर त्यागः' यह निर्वैर भाव मैंने स्वयं देखा है ।
हमारे गुरुदेव पीताम्बरा पीठ दतिया (मध्य प्रदेश) में
प्रातः अपने कक्ष से निकलकर जैसे ही बाहर आते थे; और
प्रसाद वितरण करने लगते थे, वैसे ही कौआ, गिलहरी, बिल्ली
और कुत्ता चारों दौड़कर पृथ्वी पर पड़े प्रसाद को पाने लगते
थे । उनमें परस्पर किसी प्रकार का विरोध नहीं था । अपने -
अपने हिस्से का प्रसाद पा लौट जाते थे । एक बात यह और
निश्चित है कि भजन के परमाणु इतने प्रबल होते हैं कि भजनीय
स्थल आश्रम में विकारों का प्रभाव नहीं पड़ता है; जैसे अकेले
प्रह्लाद पर असंख्य दैत्य बालकों का प्रभाव नहीं पड़ा, अपितु
प्रह्लाद ने ही उपदेश देकर सबको प्रभावित कर लिया था । यही
आश्रम की विशेषता है ।
जिस पवित्र, शान्त, सुरम्य, सिद्ध स्थल पर 'सुरथ' जो
पहुँचे वह 'मेधा' ऋषि का आश्रम था । वे महर्षि बड़े तपस्वी
और धर्मनिष्ठ योगी थे । उन्होंने शान्त, क्लान्त एवं तृषार्त पथिक
को विश्राम दिया और मन को शान्त किया । जैसे शरीर के लिए
४५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
भोजन आवश्यक है वैसे ही बुद्धि के लिए सत्संग का भोजन
परमावश्यक है। ‘मुनिना तेन सत्कृतः’ मननशील महातपा मेधा
ने उन्हें उनके स्वरूप का बोध कराया । यही सत्कृतः' शब्द का
अर्थ है । उन्होंने कहा—‘‘तुम तो राजा हो, अजर, अमर, अवि-
नाशी असंग आत्मा हो। सभी इन्द्रियाँ तुम्हारे शासन में हैं।
जिस परिवार से तुम अपमानित हुए हो, जिस राज्य और कोष
से तुम अपने को वञ्चित (रहित) समझ रहे हो, वह तो तुम्हारा
था ही नहीं।
सपने होइ भिखारी नृप, राजा रंक ते होइ ।
जागे हानि न लाभ कछु, तिमि प्रपञ्च जिय जोइ ॥
स्वप्न में एक राजा भिखारी हो जाता है और भिखारी राजा
बन जाता है; किन्तु जगने पर वह पूर्ववत् अपना स्वरूप ज्यों का
त्यों ही देखता है। ठीक इसी तरह 'तुमने राज्य और परिवार
मेरा है' भूल से यह कल्पना कर ली थी। इसी कल्पना के कारण
तुम दुःखी हो रहे हो। माँ के पेट से आने पर भला कौन मेरा,
कौन तेरा होता है । ‘बीच ही मिले बीच ही छूट जावें। ऐसे
साथी, सामान के प्रति मोह करके दुःखी होना ना समझी है ।
बचपन में बताया अर्थ काम सत्य है ।
जवानी में बताया धरा धाम सत्य है ।
पक्षी जब पिंजड़े से उड़कर चला गया,
तब लोगों ने बताया राम नाम सत्य है ।
इन बातों का ही परिणाम है कि आज समाज में वयोवृद्ध
लोगों की अवहेलना हो रही है । यदि बचपन में बच्चों को यह
शिक्षा दी गई होती कि केवल अर्थ और काम ही सत्य नहीं है,
वरन् राम नाम भी सत्य है; तो बड़े होने पर बालक अपने बड़ों
का अपमान कदापि न करते ।
मेधा ऋषि ने राजा सुरथ को समझाया कि तुम जो यह
चिन्तन कर रहे हो—'मेरी रानी कैसी होगी, बच्चे कैसे होंगे,
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४६
घोड़े कैसे होंगे सो यह सब तुम्हारे राग के कारण हो रहा है।
इस राग को छोड़ो और भगवान् का चिन्तन करो।
आत्म-दर्शन से राग-द्वेष को मारने का सिद्धान्त भगवान्
ने गीता में भी दिया है। गीता के लगभग पन्द्रह-सोलह श्लोकों
में आत्मा को अजर, अमर, अविनाशी, नित्य शुद्ध-प्रबुद्ध होने
का वर्णन है और देह नाशवान है अतः किसी प्रकार के शोक
का कारण केवल तुम्हारा राग ही है।
जितनी भी आकृतियाँ हैं वे सत् तत्व से भाषित हो रही
हैं, जितनी भी प्रतीतियाँ हैं वे चित् तत्व से और सुख की प्रती-
तियाँ आनन्द तत्व से भाषित हो रही हैं। बुद्धि में यह दृढ़
निश्चय होना चाहिए कि सभी देश में, सभी वेश, सभी काल में
एक परमात्मा ही दीख रहा है—
हर देश में तू, हर वेश में तू,
तेरे नाम अनेक तू एक ही है॥
तेरीं रंग भूमि यह विश्व - धरा,
हर खेल में, मेल में तू ही तू है॥
इस निश्चय के बनाये रखने पर अच्छी या बुरी परिस्थितियों
के आने पर मन सुखी दुःखी नहीं होगा। दिन में न जाने
कितनी बार सत्व, रज, तमोगुण सम्बन्धी नाना वृत्तियाँ आती
और जाती रहती हैं। इनके बदलने पर स्वयं को बदला हुआ
नहीं समझना चाहिए। शास्त्रों में बताई गई परम्परा को नष्ट
करने वाले इन राग-द्वेषादि से सदा ही सावधान रहना
चाहिए।
सावधान जाना ही होगा,
ओ आने वाले इतना समझ ले,
इस जग से तुमको जाना ही होगा।
यदि रह गई हैं कुछ वासनायें,
उनके लिए फिर आना ही होगा॥
४७ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
जब जाना निश्चय ही है फिर इन गीत पंक्तियों को अपना
कण्ठहार बना लेना ही जीवन को सफल बना लेना है—
हरि के भजन में, हो जा रे दीवाना । (टेक)
सपनों की दुनियाँ का, क्या रे ठिकाना ।
कब तक यह दुनियाँ तुझे अपनायेगी, अन्त में तेरे काम न आयेगी ।
झूठी है दुनियाँ, झूठे हैं सारे मीत, झूठी है रीति यहाँ झूठी है रे प्रीत ।
देख मेरे मनुवा, जाल में न आना, सपनों की दुनियाँ का, क्या रे ठिकाना ।
हरि के भजन में, हो जा रे दीवाना ।
इतना समझाने पर राजा सुरथ को आत्म-स्वरूप का कुछ
बोध हुआ, शान्ति मिली, किन्तु कुछ क्षणों तक ही होश रहा ।
“तस्थौ कंचित् स कालम्” और वहाँ से उठकर चल दिया ।
एक तो वासना के साथ गया था । दूसरी बाधा यह थी कि अभी
समाधि साथ नहीं है । समाहित चित्त होना और श्रद्धा दोनों सद्
सम्पत्ति हैं; इनके बिना उपदेश टिकता नहीं है । 'श्रद्धान्वितो
भूत्वा' का यही अर्थ है कि श्रवण के साथ मनन अत्यन्त अपेक्षित
है । तभी सुना हुआ सफल होता है, जब सुनने वाला समझना
चाहे । दृष्टान्त आपके समक्ष है । घनघोर युद्ध काल में श्रीकृष्ण
ने समझाया और अर्जुन ने समझ लिया, किन्तु सञ्जय ने धृतराष्ट्र
को एकान्त में, शान्त वातावरण में सुनाया तब भी कोई
फल नहीं हुआ ।
प्रायः साधकों के जीवन में भी ऐसा देखा गया है कि कुछ
क्षणों के लिए वैराग्य आ जाता है । कहा भी गया है—
चार ठौर सब नरन के कछु वैराग्य चढ़न्त ।
गर्भ माँहि, शव के निकट,
कथा सुनत, रति अन्त ॥
किन्तु यह श्मशानिया वैराग्य दृढ़ अपरोक्ष ज्ञान के अभाव
में क्षणिक होता है । सांसारिक जीवों को इसो कथित उपर्युक्त
स्थिति का 'सुरथ' नाम के माध्यम दिग्दर्शन कराया है—
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ४८
इतश्चेतश्च विचरंस्तस्मिन्मुनि वराश्रमे,
सोऽचिन्तयत्तदा तत्र ममत्वाकृष्ट मानसः ।
मत्पूर्वै पालितं पूर्वं मयाहीनं पुरं हि तत् । १२ ।
न जाने मे सः प्रधानो मे शूरहस्ती सदामदः ।
ये ममानुगता नित्यं प्रसाद धन भोजनैः । १४ ।
सञ्चितसोऽतिदुःखेन क्षयं कोशो गमिष्यति ।
एतच्चान्यच्च सततं चिन्तयामास पार्थिवः । १६ ।
आश्रम से बाहर घूमता हुआ राजा सुरथ चिन्तातुर एवं
शोक ग्रस्त हो सोचने लगा, अहो ! न जाने मेरी प्रजा कैसे होगी,
मेरा मतवाला हाथी कहाँ होगा ? जो लोग रात - दिन सदा मेरे
पीछे लगे रहते थे; भोजन-शयन विश्राम में साथ रहते थे, वे कैसे
होंगे ? इस प्रकार बहुत सी चिन्तायें करने लगा, मोहित हो
गया । किंकर्तव्य विमूढ़ हुआ कुछ क्षणों पूर्व का बैरागी वह
मेधाऋषि से सुना हुआ सभी कुछ भूल गया । अत्यन्त दुखद
एवं विपत्त अवस्था में उसने “वैश्यमेकं ददर्श सः” एक वैश्य
को आते हुए देखा । परस्पर परिचय हुआ, आने का कारण
पूछा, बात-चीत होने लगीं । उसने भी वही परिस्थिति बताई
जो राजा सुरथ का थी । वैश्य के मुख से ही निसृत शब्दावली
द्वारा उसकी दशा का अवलोकन कीजिए :
समाधिर्नाम वैश्योऽहमुत्पन्नो धनिनां कुले । २१
पुत्रैर्दारैर्निरस्तश्च धन लोभाद साधुभिः
विहीनश्च धनैर्दारैः पुत्रै रादाय मे धनम् ।। २२
(१) समाधि (क) समाधीयते सर्वमस्मिन्-जिसमें सब
कुछ लीन हो जाता है । इसका अनुभव करने वाला ही शेष
रहता है ।
(ख) समाधीयते अस्मिन् पुरुषोपयोगाय - मनुष्य की
आवश्यक वस्तुए संकलित की जाय जहाँ ।
४६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(ग) यहाँ समाधि एक का अर्थ समाहित चित्त अधिक
अच्छा है।
(२) वैश्य - जैसे वर्ण-व्यवस्था में समाज के लिए
अत्यन्त उपयोगी है वैसे ही साधक जीवन में लाभप्रद हैं; जो
साधक अभी तक घर-द्वार-परिवार में आसक्त रहा, अब वहाँ से
ऊबकर साध्य को ओर जाना चाहता है वह वैश्य साधक है ।
'विशति साधना विशेषेषु' इस व्युत्पत्ति से यह अर्थ निष्पन्न होता
है । जो अपने भीतर सत्य, क्षमा आदि गुणों की रक्षा के लिए
सावधान है वह क्षत्रिय है और जो ब्रह्म-विज्ञान रस में निमग्न
होना चाहता है अथवा निमग्न है वह ब्राह्मण है । जो इन तीनों
साधकों की प्रेम और श्रद्धा से सेवा करता है वह शूद्र प्रकृति का
है । यद्यपि ब्रह्म-सूत्र भाष्य में 'शुचा द्रवति इति शूद्रः' शोक
ग्रस्त को शूद्र कहते हैं । इसी दृष्टि से सुरथ और समाधि दोनों
शोक-ग्रस्त होने से शुद्र ही हैं; तथापि यहाँ क्षत्रिय और वैश्य
बतलाये गये हैं । इसका अर्थ है राजा सुरथ अपने विकारों
को सावधानी से देख रहा है और उनसे बचने के लिए भी
आतुर है ।
समाधि ने भी राजा को अपनी चिन्ता का कारण अपने
पुत्र स्त्री आदि से अपमानित होना ही बताया उसने
कहा-मित्र ! घर-परिवार वालों से तिरस्कृत होकर निकाला
गया समाधि नाम का वैश्य मैं पुनः उन्हीं की कुशलता की चिन्ता
से व्यथित हूँ 'वे मेरे बेटे कहीं दुराचारी न हो जाएँ । यही गहरी
वेदना है ।" राजा ने कहा-प्यारे जैसे तुम वैसे ही हम, घबराओ
नहीं । स्वभाव से एक सी परिस्थिति वालों में शीघ्र मित्रता
हो जाती है ।
एक बार चार मूर्खों ने एक व्यास का सम्मान देखकर
सोचा-हम भी व्यास हो जायें, तो ऐसा ही सम्मान मिलेगा ।
बस, फिर क्या था, तुरन्त पीताम्बर धारण किये, चन्दन चर्चित
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५०
और मालाओं से विभूषित हो राज-दरबार में पहुँच गये । उन्हें
देखकर काशी के चार विद्वान् समझकर कथा की व्यवस्था की
गई। मंच तैयार हुआ। चारों व्यास आसन पर आसीन होकर कथा
कहने लगे-प्रथम बोला-राजा पूछेंगे तो कहेंगे क्या ? द्वितीय ने कहा
'जैसे तुम भी वैसे ही हम भी। तीसरे ने तुरंत जोड़ा । “कब तक
चलेगी धांधा गर्दी”। चौथे ने कहा “जब तक चलेगी, तब तक
चलेगी”। इस प्रकार क्रमशः चारों जल्दी-२ बोलने लगे । आज इस
नवीन कथा-विधा को सुनकर श्रोताओं ने आश्चर्य तो किया, किन्तु
राज दरबार के भय से कुछ बोले नहीं, अपितु बेचारे मन मारे
सुनते रहे। आरती के समय राजा-रानी ने आकर उनको धांधागर्दी
सुनी, तो बड़े रूष्ट हुए, डाट फटकार करके उन्हें नीचे उतार
दिया, किन्तु वे तब भी अखण्ड रूप से अपनी कथा कहते ही
रहे। तब सभा में विद्यमान उदार-हृदय एक विद्वान् ने उन
चारों की रक्षा करने के लिए कहा-राजन् ! काशी में सूत्रात्मक
कथा शैली की प्रथा है। पहला पण्डित सुमन्त की विवशता
सहित कह रहा है कि महाराज दशरथ ने-रथ चढ़ाइ
दिखराय बन का आदेश दिया था; किन्तु अब सीता लक्ष्मण
राम लौटते नहीं हैं, ऐसी स्थिति में राजा पूछेंगे तों हम क्या कहेंगे ?
दूसरा पण्डित सुग्रीव-राम के मिलन-समय की कथा कह रहा
है। राम सीता के विरहानल से दग्ध, देश-निर्वासित राजकुमार
तो सुग्रीव (रुमा) पत्नी अपहरण अपमान से अपमानित, बड़े
भाई बाली से प्रताड़ित युवराज, दोनों की समान स्थिति है
अतः वे परस्पर कह रहे हैं जैसे तुम भी वैसे हम भी ।
महाराज ! तृतीय और चतुर्थ पण्डित मन्दोदरी और
रावण के परस्पर संवाद की कथा कह रहे हैं । श्री हनुमान् जी
के द्वारा लङ्का के दग्ध होने पर भावी आशंकाओं से भयभीत
होकर रावण को समझाने का प्रयास करती है, किन्तु वह नहीं
मानता, तब खिन्नमना वह कहती है-कबतक चलेगी यह धांधागर्दी
वह उत्तर देता है “जब तक चलेगी तब तक चलेगी। इस प्रकार
५१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
ये चारों पण्डित सम्पूर्ण रामायण की कथा सूत्रात्मक शैली में
कह रहे हैं। आश्वस्त होकर राजा ने तब उनका सम्मान किया ।
यह कथा 'जैसे तुम भी वैसे हम भी' सुरथ-समाधि के
लिए ही कही गई है । जीव में समाधि (समाहित चित्त की
स्थिति) एक ही होती है । संकल्प-काल में चंचल-वृत्ति का
चित्त है; किन्तु स्थिर होने पर वही आत्मा है। यह योगवाशिष्ठ
में स्पष्ट है । इस प्रकरण में चित्त की अवस्थाओं पर
विच्चार कर लेना अति प्रासङ्गिक होगा ।
चित्त की अवस्थायें :
(१) मूढ़-विकार ग्रस्त तमः प्रधान (२) क्षिप्त-
रजोगुणी, धर्माधर्म दोनों में प्रवृत्ति; यही विक्षिप्त भी है,
जिसमें विशेष मनोराज्य होता है,, जैसे इस समय घर की याद
करके 'सुरथ और समाधि का चित्त हो रहा है (३) सत्वगुणी-
धर्म में प्रवृत्ति (४) एकाग्रावस्था-एक ही विषय में सहज
वृत्तियों का प्रवाह रहता है । (५) निरुद्ध-देशान्तर,
कालान्तर, वस्त्वन्तर की दौड़ छोड़ कर अपनी ओर लौटना ही
दृष्टा ज्ञान है, भान है, अनुभव है। जब तक दृश्य में महत्व
बुद्धि रहेगी, तभी तक दृश्य प्रपञ्च सत्य प्रतीत होता है; अपना
ही स्वरूप जगत् है, यही अवस्था समाधि है ।
संत भोले बाबा ने कहा : इस देह को मैं मानने से एक
दो भासता । दो से बहुत हो जाँय है-एक दूसरे को त्रासता ।
दर्पण भवन कुत्ता घुसा, तो कुत्ता ही सब दिखलात है ।
बैरी समझ कर भौंकता ही भौंकता मर जात है ॥
यही दशा होने पर जीव दुखित होता है ।
अब सुरथ समाधि के साथ हो गयो, तो श्रद्धा का उदय
हुआ । दोनों मिलकर पूज्य भाव से मेधा ऋषि के चरणों में
उपस्थित हुए, श्रद्धावनत होकर प्रणाम किया और विनीत भाव
से पूछा । यहाँ इससे पूर्व यह जानना आवश्यक है कि सुरथ
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५२
इन्हीं ऋषिचरणों में उपस्थित होकर उनका उपदेश सुन चुका
था, किन्तु उस समय विक्षिप्त था और अब निरुद्ध अवस्था में
होने से समाधि भी साथ है अतः श्रद्धावान् है। श्रद्धावान् लभते
ज्ञानं तत्परः संयतेन्द्रियः (गीता) । श्रद्धा बिना धर्म नहि होई
(मानस) ।
‘शिष्यस्तेऽहं शाधि मां त्वां प्रपन्नम्’ कहकर ही अर्जुन ने
शिक्षा प्राप्त की थी। श्रद्धावान् के लिए गुरु शरण में पहुँच कर ही
ज्ञान प्राप्ति कही गई है। इसी प्रकार आज गुरु चरणों में अपनी
मोह-व्यथा निवेदन करते हुए सुरथ बोले—
दृष्टदोषेऽपि विषये ममत्वाकृष्ट मानसौ ।
तत्किमेतन्महाभाग यन्मोहो ज्ञानिनोरपि ॥ ४४
ममास्य च भवत्येषा विवेकान्धस्य मूढ़ता ॥ ४५
ऐसी मूढ़ता या मन की । (विनय पत्रिका)
उपदेश श्रवण की यही परम्परा है, सुनने की बेचैनी हो,
अथाह श्रद्धा हो, योग्य गुरु हो । सब का मधुर मिलन हुआ ।
महर्षि मेधा बोले—हे भाग्यवान् ! जीव मात्र तीन प्रकार के हैं—
दिवान्धाः प्राणिनः केचिद्रात्रावन्धास्तथा परे ।
केचिद् दिवा तथा रात्रौ प्राणिनस्तुल्य दृष्टयः ।
ज्ञानिनो मनुजाः सत्यं किं तु ते न हि केवलम् ॥ ४८-४६
(१) दिनान्ध-कुछ प्राणी दिन में अन्धे होते हैं । दिन
शब्द काव्य प्रकाश-सप्तम उल्लास में प्रकाश अर्थ में प्रयुक्त हुआ
है । भारत में जन्म, सत्सङ्ग का सुयोग और समय भी अनुकूल,
त्तथापि सत्संग में न जाना, ज्ञान प्राप्त न करने की प्रवृत्ति वाले
दिन में अन्धे हैं ।
(२) रात्र्यन्ध-जिन्हें सत्संग से प्रयोजन ही नहीं है ।
अविवेकी, गुरुतर मूढ़ हैं, किसी हितैषी की भी बात सुनना पसंद
नहीं करते; ऐसे व्यक्ति रात्रि में अन्धे हैं ।
५३ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
(३) निपट अन्ध-उनके लिए दिन भी रात है। जो लोग
ज्ञान-भक्ति दोनों से अलग रहते हैं। चार्वाक् के सिद्धान्तानुसार
'खाओ, पीओ, मौज उड़ाओ' वाले उदरम्भरी पशु-प्रवृत्ति के हैं
वे इसी श्रेणी के हैं।
आहार-निद्रा-भय-मैथुनञ्च, सामान्यमेतत्पशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषः धर्मेण हीना पशुभिः समानाः ॥
यद्यपि आहार - निद्रा - भय - मैथुन की प्रवृत्तियां पशु -
पक्षियों तथा प्राणीमात्र में समान हैं; किन्तु बुद्धि या ज्ञान ही
मनुष्य को इनसे विलग करता है; जिससे वह अपने को आत्म-
स्वरूप को समझ सकता है। भगवान् कहते हैं-
सब मम प्रिय, सब मम उपजाये ।
सबते अधिक मनुज मोहि भाये॥ (मानस)
मनुष्य ही विवेक का सम्मान करने में समर्थ है। अतः
मनुष्य को ही समस्त शास्त्र-पुराण समझाये जा सकते हैं। वैसे
काकभुशुण्डि जी भी कथा व्यास हैं, किन्तु वे अपवाद हैं। जिस
मनुष्य ने ज्ञान और विवेक का इतना अधिकार प्राप्त किया है;
वही प्राप्त विवेक का अनादर कर दुःखी हो रहा है यही माया
की लीला है, यही भ्रम, भूल एवं अज्ञान है। सूर्य-पुत्र होकर भी
अज्ञानान्धकार में भटकते हुए दुःखी होना जीव की घोर विडम्बना
है। 'तथापि ममतावर्ते मोह गर्ते निपातिताः' समझदार होने पर
भी मनुष्य अपने द्वारा कल्पित तथा निर्मित, मन से माने हुए
स्त्री, पुत्र, मित्रों के जाल में फँस कर मोहित हो जाता है, यही
मोह के गहरे गड्ढे में गिरना है। इससे निकलना बड़ा दुर्लभ
है।
को छूट्यो इहि जाल परि, कत कुरंग अकुलात ।
ज्यों ज्यों सुरझि भज्यो चहत, त्यों त्यों हि उरझि जात ॥
संसार के जाल से निकलना सचमुच ही दुर्लभ है। इसमें
आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि यह सम्पूर्ण जगत् भगवान्
की माया से मोहित हो रहा है। यह महामाया देवी बड़े-बड़े
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५४
ज्ञानियों, योगियों तथा तपस्वियों को अपने इंगित पर नृत्य
कराती रही है। नारद, पराशर, विश्वामित्र की तो बात ही
क्या, स्वयं ब्रह्मा और शंकर भी इस माया-पाश में आबद्ध हुए
हैं, फिर सामान्य जनों की तो बात ही क्या ? इसलिए साधक को
बहुत सजग एवं सावधान रहना चाहिये ।
वर्तमान में ही एक बहुत बड़े तपस्वी महात्मा भाऊपुर में
रहते थे; वे नित्य प्रातः एवं सायं भ्रमण के लिए ही कुटिया से
निकलते थे। रास्ते में एक परिचित श्रद्धालु देवी पूछती थी
“आप कहाँ जा रहे हैं ? प्रतिदिन वे इस प्रश्न को सुनते थे,
उत्तर नहीं देते थे, नीचे को सिर किये हुए चले जाते थे।
जब उनका अन्तिम समय आया; प्राण जाने वाले थे, तभी
उन महापुरुष ने उस देवी को बुलाया और कहा- देवी !
तुम्हारे प्रश्न का उत्तर मैं आज दे सकता हूँ क्योंकि आज मैं
अपने घर जा रहा हूँ। मन की गति बड़ी चञ्चल होती है”
चञ्चलं हि मनः कृष्ण प्रमाथी बलवद् दृढम् । (गीता)
शरीर में प्राण रहते हुए कहीं मैं अनुचित घर की ओर कदम न
रख देता, इसी से अब तक उत्तर न दे सका था। इस दृष्टान्त
से हमें भी सीख लेनी चाहिए ।
ज्ञानिनामपि चेतांसि देवी भगवती हि सा । ५५
बलादाकृष्य मोहाय महामाया प्रयच्छति ।
तया विसृज्यते विश्वं जगदेतच्चराचरम् ॥ ५६
सैषा प्रसन्ना वरदा नृणां भवति मुक्तये ।
सा विद्या परमा मुक्त र्हेतुभूता सनातनी ॥ ५७
संसार बन्धहेतुश्च सैव सर्वेश्वरेश्वरी ॥ ५८
यह महामाया ही मेरी माँ है । माँ की करुणा और
वात्सल्य भरा हृदय पुत्र के लिए कल्याणकारी होता है । उनकी
प्रसन्नता ही मुक्ति का वरदान है। वे पराविद्या ही संसार रचती
हैं । संसार-व्यवहार में अज्ञानी-जन अपने को बंधन में बंधा हुआ
५५ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
मानते हैं जबकि बन्धन-काल में भी वह मुक्त ही है । अज्ञता
के कारण ही अपने को बंधा समझता है और बन्धन के कारणों
को कल्पित करके दुःखी होता रहता है ।
कालहिं कर्महि ईश्वरहिं मिथ्या दोष लगाइ (मानस)
इस दुःख में उसकी भूल, उसका अज्ञान ही कारण है ।
विद्वद्जन महामाया शब्द के व्युत्पत्यर्थक भिन्न-भिन्न
अर्थ करते हैं-मीयते जगदनयेति माया अथवा ब्रह्मानन्द साक्षात्कारे
प्रतिषेधं याति माया यद् दृश्यते तन्न सत्यमिति माया अर्थात्
जिससे संसार बनता है । ब्रह्मानंदानुभूति होने पर जिसका
सर्वथा निषेध हो जाता है अथवा जिसके कारण प्रतीयमान
प्रपञ्च सत्य न होने पर भी सत्य सा दिखाई दे रहा है, वही
माया है । यह वेदान्त दर्शन है ।
शाक्त-साधकों के लिए यह महामाया माँ है; माँ के लिये
भक्त की भावना इस रूप में उद्वेलित हुई है-कुपुत्रो जायेत
क्वचिदपि कुमाता न भवति, पुत्र कितना भी कुपुत्र हो जाये,
किन्तु माँ का स्नेहिल हृदय पुत्र के लिये करुणा परिपूर्ण ही
रहता है । माया कृपायां दम्भे च, माया का अर्थ कृपा भी है,
कुम्हार के घड़े का भीतरी हाथ है । भेद केवल दृष्ट का है,
विचार का है; भगवान् के मोहिनी रूप को देख कर देवता
प्रणाम् करते हैं और दानव उद्धत्तता से परिपूर्ण विलासमयी
चितवन् से निहारते हैं ।
इस दैवी भाव की दिव्यता से द्रवित हृदय राजा ने
गुरुदेव के श्रुत उपदेश के पश्चात् पूछा-हे भगवन् ! आप जिसे
महामाया कहते हैं वे कौन हैं ? कृपया उनके प्राकट्य, स्वभाव
एवं चारित्रिक महत्व का वर्णन कीजिए । श्रद्धा एवं प्रेम से
पूछे गये प्रश्न को सुनकर प्रसन्नमना मुनि ने कहा :
नित्यैव सा जगन्मूर्त्तिस्तया सर्वमिदं ततम् । ६४
तथापि तत्समुत्पत्तिर्बहुधा श्रूयतां मम ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५६
हे राजन् ! वे भगवती पराम्बा नित्य स्वरूप हैं, यह
जगत् उन्हीं का रूप है, सब में वे ही व्याप्त हैं। उनमें सब और
सब में वे ही हैं, तथापि समय समय पर वे देवों की कार्य-सिद्धि
के लिये प्रकट होती हैं; यही उनकी करुणा है, वे साकार होने
पर भी निराकार और निर्विकार ही रहती हैं।
आप लोग इस पर थोड़ा ध्यान दीजिए—चेतन आत्मा के
स्वरूप को ही यहाँ पराम्बा के रूप में बताया गया है । आप
जानते हैं कि जीवित प्राणियों की देह से तभी तक प्रेम रहता है,
या करते हैं; जबतक उसके भीतर चेतना का अनुभव हो रहा
है। इस से सम्बन्ध हटते ही उसी देह को गंगा में प्रवाहित :कर
दिया जाता है। अतः स्पष्ट हो गया कि प्रेम दीखने वाली;
दिखाई देने वाली देह से नहीं होता अपितु देह में न दिखने
वाले चेतन से होता है; किन्तु अज्ञान के कारण मानव-देह
वियोग का अनुभव करती है।
आप भक्तजन पाषाण-प्रतिमा के सामने भी "मनोजवं
मारुततुल्य वेगं, जितेन्द्रियं बुद्धिमतां वरिष्ठम्" बोलते समय उस
साकार मूर्ति में व्याप्त चेतन हनुमान जी का ही अनुभव करते
हैं। वही चेतन परमात्मा निरुपाधि होने पर भी उपाधि वाला,
निराकार होने पर भी साकार होने वाला अकारण ही अपनी
कृपा-वश होकर साकार हो जाता है। जैसे भ्रम या भूल वश
कोई व्यक्ति कुएँ में गिर पड़ता है तो उसे निकालने के लिए
'गोताखोर' को भी कुएँ में जाना पड़ता है। ऐसे ही भव कूप में
पड़े हुए जीवों का उद्धार करने के लिए वही कभी राम, कभी
घनश्याम, कभी मोहिनी, कभी स्वयं पराम्बा भगवती के रूप में
अवतरित हो जाता है। भक्तजन उसकी लीलाओं में निमग्न रहते
हैं। ऐसा कहकर महर्षि कथा सुनाने लगे।
कल्प के अन्त में सम्पूर्ण जगत् के एकार्णव (क्षीरसागर)
में निमग्न होने पर विष्णु भगवान् योग निद्रा का आश्रय ले शयन
कर रहे थे; उस समय उनके कानों के मैल से मधु और कैटभ
नाम से विख्यात दो भयंकर असुरों ने जन्म लिया। पैदा होते
ही भगवान् विष्णु के नाभिकमल में विराजमान प्रजापति ब्रह्मा
जी को खाने के लिए दौड़े। उन दोनों भयानक असुरों को अपने
पास आये और भगवान् को सोये हुए देखकर ब्रह्मा जो घबरा
गये। उन्होंने भगवान् को जगाने के लिए एकाग्रचित्त-होकर
उनके नेत्रों में निवास करने वाली योग-निद्रा का स्तवन किया।
इसी स्तुति को 'रात्रि-सूक्त' कहते हैं।
इस कथा का भाव यह है : सर्वत्र व्याप्त सत्ता को विष्णु
कहते हैं। 'विष्लृ व्याप्तौ' वेवेष्टेति विष्णुः वह परमात्मा सर्वत्र,
सर्वथा, सर्वदा होने पर भी सत्वगुण में बुद्धि स्थिर होने पर ही
अनुभव में आता है। रजो गुण और तमो गुण की अवस्था में
उसका अनुभव नहीं होता है। क्षीर सागर सत्वगुण का रूप है।
जल शीतल, सुखद, मधुर होता है—जल जीवन का भी पयोय है,
रस है, 'रसो वै सः' परमात्मा के लिए प्रयुक्त हुआ है, इसी से
शान्त प्रकृति के साधु महात्मा अपने अन्तःकरण के प्रकाशक
आत्मा को अपने में ही अनुभव करके सदा प्रसन्न रहते हैं। उन
भगवान् की नाभि ही आकाश है। भागवत् में यह प्रयोग आया
है—"नभः एव नाभिः"। इसी व्याप्त आकाश (नाभि) से अना-
सक्ति का प्रतीक कमल पैदा होता है। जिससे ब्रह्मा जी प्रकट
होकर सृष्टि रचना करते हैं।
इस पुराण भाषा को आप समझ गये होंगे कि न आकाश
में कमल पुष्प होता है और न ब्रह्मा जी प्रकट होकर सृष्टि रचना
करते हैं 'यह भाषा प्रतीयमान जगत् परमात्मा है।' के रहस्य को
समझाने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। 'सर्वं खल्विदं
ब्रह्म'।
रात्रि-सूक्त में की गई स्तुति बड़ी ही मार्मिक है। यह
स्तोत्र प्रथम अध्याय के श्लोक संख्या सत्तर से सतासी श्लोक
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५८
तक मूल में देख सकते हैं। ब्रह्मा जी स्तुति करते हैं, तुम्हीं स्वाहा
(देवताओं का भोजन), तुम्हीं स्वधा (पितरों का भोजन),
तुम्हीं वषट्कार हो। तुम्हीं नित्य अक्षर प्रणव में अकार,
उकार, मकार इन तीन मात्राओं के रूप में हो। इनके
अतिरिक्त जिसका उच्चारण नहीं किया जा सकता वह बिन्दु
रूपा, अर्द्ध मात्रा रूपा भी तुम्हीं हो। यहाँ दार्शनिकों के लिए
स्पष्ट किया गया है कि जिस परमात्मा का वाचक प्रणव है—
तस्य वाचकः प्रणवः, वही ओंकार पराम्बा का स्वरूप है अथवा
पराम्बा ही ओंकार स्वरूपा है।
पुनश्च:—हे देवी ! तुम्हीं सन्ध्या सावित्री हो, सृष्टि स्थिति,
संहारकारिणी हो; तुम्हीं महा-विद्या, महा-मेधा, महास्मृति,
तुम्हीं प्रकृति और तुम्हीं बोध स्वरूपा बुद्धि हो। तुम्हारे सभी
आयुध कल्याणकारी हैं। तुम्हीं सुन्दरता का स्रोत हो, परा और
अपरा दोनों से परे तुम्हीं हो। जो कुछ भी दिखाई, सुनाई या
प्रतीति हो रही है, वह सब कुछ तू ही तू है।
जब भगवान् को भी तुमने निद्रा-निमग्न कर दिया है, तब
भला तुम्हारी स्तुति किस शक्ति से की जाये, क्योंकि शक्ति तो
तुम स्वयं ही हो। अब कृपा कर इन दोनों दैत्यों को मोहित कर
भगवान् को जगा दो, जिससे जगकर आपकी शक्ति पाकर वे
इन दोनों को मार डाले।
इस प्रकार स्तुति करते ही महा माया योग-निद्रा भगवान्
विष्णु के नेत्र, मुख, नासिका, बाहु और हृदय से निकल कर
ब्रह्मा जी के सामने प्रकट हो गई। भगवान् जग गये, उन्होंने
देखा, दो विशाल दैत्य ब्रह्मा जी को खाने का प्रयत्न कर रहे हैं।
तत्काल भगवान् ने उन्हें ललकारा—युद्ध प्रारम्भ होकर पाँच
हजार वर्षों तक चलता रहा; किन्तु विजयश्री ने किसी का वरण
नहीं किया। उसी समय महामाया ने उन दैत्यों को मुग्ध कर
दिया; जिससे वे भगवान् से बोले—
५६ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
“उक्तवन्तौ वरोऽस्मत्तो व्रियतामिति केशवम्”
हम तुम्हारी वीरता से प्रसन्न हैं, जो चाहो, वरदान माँग लो ।
तब भगवान् ने कहा—‘भवेतामद्य मे तुष्ठौ मम वध्यावुभा-
वपि । किमन्येन वरेणात्र एतावद्धि वृतं मम । ६८ । यदि तुम
लोग मुझसे प्रसन्न हो, तो मेरे हाथ से मारे जावो, यही वरदान
दीजिए । यह सुनकर वे बोले—जहाँ पृथिवी पर जल की बूँदें न
हों न सूखा स्थान हो, वहीं हमारा वध करो । भगवान् कमल नयन
ने ‘तथास्तु’ कहकर विराट स्वरूप धारण कर दोनों के सिर
अपनी जङ्घाओं पर रख कर चक्र से काट डाले । इस प्रकार वह
महामाया ब्रह्माजी की स्तुति से प्रकट हुई थी ।
कथा पर विचार करने से स्पष्ट भाव प्रकट होता है कि
सर्वत्र व्याप्त परमात्मा विष्णु भगवान् हैं समस्त दिशायें उनके कान
हैं । भागवत् में कहा है—इन्द्रादयो बाहव आहुरुस्रः कर्णौ दिशः
श्रोत्रममुष्य शब्दः । २/१/२६ इसी से भक्त उन्हें कहीं से भी
पुकारें; वे तुरन्त सुन लेते हैं । “चींटी के पर नूपुर बाजे वह भो
साहब सुनता है ।” यह प्रसिद्ध उक्ति है । आत्मशंसा एवं परनिन्दा
सुनना इन दिशाओं रूपी कानों का मैल है । यही दोनों मधु
और कैटभ हैं, दोनों का अर्थ एक ही है । जिन लोगों को दूसरे
की निन्दा करने सुनने में रस आता है, मिठास आता है—यही
मधु-मीठा राग है—सुन-सुन कर पैदा होने वाले दोनों दैत्य हैं—
‘रज्यतेऽनेनेति रागः । पाणिनिजी का सूत्र है तेन रक्तं रागात्’
जिससे चित्त-हृदय रङ्गीन हो जाता हैं वही राग है । आजकल
स्कूल कालेजों में बालक बालिकायें परस्पर एक दूसरे की
क्षणिक विशेषतायें सुनकर परस्पर मुग्ध हो जाते हैं । माता-
पिता शास्त्र का विधान अलग कर देते हैं । यह प्रेम नहीं राग
है, मीठी जंजीर है-बाँधने वाली है । जो लोग कान के कच्चे
होते हैं उनको तो यह राग पैदा करते देर नही लगती । इसी
प्रकार द्वेष है—‘द्विगुणितं विषमितिद्वेषः’ दूना जहर है ।
श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ६०
कीटवद् भाति कीटभ एव कैटभः एक कीड़ा ऐसा होता है जो
लकड़ी में छेद कर देता है । छोटा कीड़ा इतनी कठोर लकड़ी
को छेद डालता है—यही द्वेष है, शत्रु है शातनात् शत्रुः जिसके
चिन्तन मात्र से दिल दिमाग में छेद होता रहे, ऐसा विचित्र
शत्रु है यह द्वेष । जिस वस्तु, व्यक्ति से द्वेष हो जाता है वह
व्यक्ति नगर से, देश से क्या पृथ्वी से भी चला जाय, किन्तु
हृदय पटल से विलीन नहीं होता, उसका नेगेटिव फोटो चित्त
में अंकित हो जाता है, जो चिन्तन करने से दुःख दग्ध करता
है । शत्रु बाहर के नहीं, बाहर नहीं अपितु अपने ही हैं और
अन्दर से ही हैं जो राग-द्वेष के रूप में रहते हैं इन्हीं से जीव-
बंधा हुआ है ।
इन्हीं से सजग करने के लिए गीताकार कहते हैं—
इन्द्रियस्येन्द्रियस्यार्थे, राग द्वेषौ व्यवस्थितौ ।
तयोर्न वशमागच्छेत्तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ ॥ ३-३४ ॥
अर्थात् इन्द्रियों का विषयों पर सहज राग-द्वेष निश्चित
है । अतः बड़ी सावधानी से इन दोनों राग-द्वेष शत्रुओं से बचना
चाहिए; लक्ष्य में ये ही बाधक हैं । जिन्होंने इन दोनों को जीत
लिया, वे ही परम प्रसाद के अधिकारी हैं ।
राग द्वेष वियुक्तैस्तु विषयानिन्द्रियैश्चरन् ।
आत्मवश्यैर्विधेयात्मा प्रसादमधिगच्छति ॥ २-६४ ॥
राग-द्वेष रूपो लुटेरों से सुरक्षित रहते हुए जिसकी इन्द्रियाँ
विषयों के प्रति सहज भाव से व्यवहार करती हैं-न किसी वस्तु
के पाने की आकांक्षा है न किसी पदार्थ से विरोध या घृणा; न
किसी से अटके न सटके, ऐसे साधक साध्य को शीघ्र प्राप्त कर
लेते हैं । इन्द्रिय दास को मानसकार ने अभागी शब्द से
सम्बोधित किया है—
उमा कहूं ते लोग अभागी - हरि तजि होयँ विषय अनुरागीं ।
इन्द्रिय लोलुप जे जग माँही, विषय भोग पर प्रीति सदाई ॥
६१ ] श्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ
इतने बांध बांधने पर भी ये राग-द्वेष रूपी प्रबल शत्रु किसी
को छोड़ते कहाँ हैं ? सामान्य जन की तो बात क्या, पैदा होते
ही इन दोनों ने ब्रह्मा जी पर धावा बोल दिया-विधाता पर
आक्रमण करने का यहाँ विशेष भाव है-“विधानं विधिः” ब्रह्मा
जी कानून के रूप हैं। संसार के जीने के लिए तथा जीवन को
सफल बनाने के लिए शास्त्रों ने विधान बनाया है। “रामवद्
वर्तितव्यम् न रावणादिवत्” राम की तरह आचरण करना चाहिये
रावण की तरह नहीं-यह विधान है, किन्तु राग-द्वेष हृदय में आते
ही विधान का भक्षण करने लगते हैं; कितना सुन्दर संकेत है ?
जज अपने सम्बन्धी को दण्डित नहीं कर पाता, चाहे वह सम्बन्धी
रिश्वत से ही बना हो, बड़ा व्यावहारिक है। यहाँ तक देखा
जाता है कि जिसके प्रति राग होता है वही ईमानदार और सद्गुणी
दिखाई देता है। जैसे अभी एक पुत्र ने किसी लड़की में आसक्ति
के कारण पिता की हत्या कर दी; एक पत्नी ने अपने पति की
हत्या कर दी और दोनों बच गये कानून से; तब कहाँ रहा
शास्त्र और माता-पिता तथा गुरु जनों का उपदेश ? अब समझ
लीजिए यही ब्रह्मा जी, विधान और वेद का संकेत वेद-निर्माता
ब्रह्मा जी हैं। जब शास्त्र के विधान का लोप होने लगता है,
संकट की घड़ी आती है, तभी भगवान् की याद आती है। यदि
जीवन में संकट न आवे तो कथञ्चित् भगवान् की भी याद
न आवे-
दुखों से अगर चोट खाई न होती, तेरी प्रभो ! याद आई न होती।
यही कारण है भगवान् के प्यारे भक्त यही कामना करते हैं-
सुख के माथे सिल परे, नाम हृदय ते जाय।
बलिहारी वा दुःख की, पल-पल नाम रटाय ॥
भगवान् विष्णु के शयन का भाव यह है कि शेष शब्द
अनन्तवाची है। सब कुछ प्रलय होने पर भी जो शेष रहे, वही
अधिष्ठान-तत्व शेषशायी सर्वत्र व्याप्त परमात्मा है, जिनका
अनुभव योगी जन गुणों से परे होने पर सात्विक वातावरण में