दुर्गा सप्तशती / देवी माहात्म्यम् (पारिजात सौरभ सविस्तार हिन्दी व्याख्या सहित)
Durga Saptashati / Devi Mahatmyam with Commentary
महर्षि वेदव्यास / मार्कण्डेय पुराण द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंश्री दुर्गा सप्तशती पारिजात सौरभ [ ५०
और मालाओं से विभूषित हो राज-दरबार में पहुँच गये । उन्हें
देखकर काशी के चार विद्वान् समझकर कथा की व्यवस्था की
गई। मंच तैयार हुआ। चारों व्यास आसन पर आसीन होकर कथा
कहने लगे-प्रथम बोला-राजा पूछेंगे तो कहेंगे क्या ? द्वितीय ने कहा
'जैसे तुम भी वैसे ही हम भी। तीसरे ने तुरंत जोड़ा । “कब तक
चलेगी धांधा गर्दी”। चौथे ने कहा “जब तक चलेगी, तब तक
चलेगी”। इस प्रकार क्रमशः चारों जल्दी-२ बोलने लगे । आज इस
नवीन कथा-विधा को सुनकर श्रोताओं ने आश्चर्य तो किया, किन्तु
राज दरबार के भय से कुछ बोले नहीं, अपितु बेचारे मन मारे
सुनते रहे। आरती के समय राजा-रानी ने आकर उनको धांधागर्दी
सुनी, तो बड़े रूष्ट हुए, डाट फटकार करके उन्हें नीचे उतार
दिया, किन्तु वे तब भी अखण्ड रूप से अपनी कथा कहते ही
रहे। तब सभा में विद्यमान उदार-हृदय एक विद्वान् ने उन
चारों की रक्षा करने के लिए कहा-राजन् ! काशी में सूत्रात्मक
कथा शैली की प्रथा है। पहला पण्डित सुमन्त की विवशता
सहित कह रहा है कि महाराज दशरथ ने-रथ चढ़ाइ
दिखराय बन का आदेश दिया था; किन्तु अब सीता लक्ष्मण
राम लौटते नहीं हैं, ऐसी स्थिति में राजा पूछेंगे तों हम क्या कहेंगे ?
दूसरा पण्डित सुग्रीव-राम के मिलन-समय की कथा कह रहा
है। राम सीता के विरहानल से दग्ध, देश-निर्वासित राजकुमार
तो सुग्रीव (रुमा) पत्नी अपहरण अपमान से अपमानित, बड़े
भाई बाली से प्रताड़ित युवराज, दोनों की समान स्थिति है
अतः वे परस्पर कह रहे हैं जैसे तुम भी वैसे हम भी ।
महाराज ! तृतीय और चतुर्थ पण्डित मन्दोदरी और
रावण के परस्पर संवाद की कथा कह रहे हैं । श्री हनुमान् जी
के द्वारा लङ्का के दग्ध होने पर भावी आशंकाओं से भयभीत
होकर रावण को समझाने का प्रयास करती है, किन्तु वह नहीं
मानता, तब खिन्नमना वह कहती है-कबतक चलेगी यह धांधागर्दी
वह उत्तर देता है “जब तक चलेगी तब तक चलेगी। इस प्रकार