दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
सुमरिन का अङ्ग
सतगुर पारस की कनी, दीरग दीखै नाहिं ।
जन दरिया षट दरब धन, सब आया उन माहिं ॥४७॥
मीन तड़पती जल बिना, (तेहि) सागर माहिं समाय ।
जन दरिया ऐसी करी, गुरु किरपा मोहिं आय ॥४८॥
भवजल बहता जात था, संसय मोह की बाढ़ ।
दुरिया मोहिं गुरु कृपा कर, पकड़ बाँह लिया काढ़ ॥४६॥
सुमिरन का अंग
राम भजै गुर सब्द ले, तौ पलटै मन देह ।
दरिया छाना¹ क्यों रहै, भू पर बूठा² मेंह ॥१॥
दरिया नाम है निरमला, पूरन ब्रह्म अगाध ।
कहे सुने सुख ना लहै, सुमिरे पावै स्वाद ॥२॥
दरिया सुमिरै राम को, करम भरम सब खोय ।
पूरा गुरु सिर पर तपै, बिघन न लागै कोय ॥३॥
दरिया सुमिरै राम को, कर्म भर्म सब चूर ।
निस तारा सहजै मिटै, जो ऊगै निर्मल सूर ॥४॥
राम बिना फीका लगै, सब किरिया सास्तर ज्ञान ।
दरिया दीपक कह करै, उदय भया निज भान ॥५॥
दरिया सूरज ऊगिया, नैन खुला भरपूर ।
जिन अंधे देखा नहीं, उनसे साहब दूर ॥६॥
दरिया सूरज ऊगिया, चहुं दिस भया उजास ।
नाम प्रकासै देह में, तौ सकल भरम का नास ॥७॥
आन धरम दीपक जिसा, भरमत होय बिनास ।
दरिया दीपक क्या करै, आगे रवि परकास ॥८॥
दरिया सुमिरै राम को, दूजी आस निवार ।
एक आस लागा रहै, तो कधी न आवै हार ॥६॥
६ दरिया साहब मारवाड़ि
दरिया नर तन पाय कर, कीया चाहै काज ।
राव रंक दोनों तरैं, जो बैठे नाम जहाज ॥१०॥
नाम जहाज बैठे नहीं, आन करै सिर भार ।
दरिया निश्चय बहेंगे, चौरासी की धार ॥११॥
जन्म अकारथ नाम बिन, आवै जान अजान ।
जन्म मरन जम काल की, मिटै न खैंचा तान ॥१२॥
मुसलमान हिंदू कहा, षट दरसन रंक राव ।
जन दरिया निज नाम बिन, सब पर जम का दाव ॥१३॥
सुर्ग मिर्त पाताल कह, कह तीन लोक बिस्तार ।
जन दरिया निज नाम बिन, सभी काल को चार१ ॥१४॥
दरिया नर तन पाय कर, किया न राम उचार ।
बोझ उतारन आइया, सो लिये चले सिर भार ॥१५॥
जो कोइ साधू गृही में, माहिं राम भरपूर ।
दरिया कह उस दास की, मैं चरनन की धूर ॥१६॥
बाहर बाना भेष का, माहिं राम का राज ।
कह दरिया वे साधवा, हैं मेरे सिर का ताज ॥१७॥
राम सुमिर रामहिं मिला, सो मेरे सिर का मौर ।
दरिया भेष विचारिये, खैर मौर को ठौर ॥१८॥
दरिया सुमिरै राम को, कोटि कर्म की हान ।
जम और काल का भय मिटै, ना काहू की कान ॥१६॥
दरिया सुमिरै राम को, आतम को आधार ।
काया काँची काँच सी, कंचन होत न वार ॥२०॥
दरिया राम सँभालते, काया कंचन सार ।
ज्ञान धर्म और भर्म सब, डाला सिर से भार ॥२१॥
(१) चारा ।
सुमिरन का अङ्ग
दरिया सुमिरै राम को, सहज तिमिर का नास।
घट भीतर होय चाँदना, परम जोति परकास ॥२२॥
सतगुर संग न संचरा, राम नाम उर नाहिं।
ते घट मरघट सारिखा, भूत बसै ता माहिं ॥२३॥
राम नाम ध्याया नहीं, हुआ बहुत अकाज।
दरिया काया नगर में, पंच भूत का राज ॥२४॥
पंच भूत के राज में, सब जग लागा धुंध।
जन दरिया सतगुर बिना, मिल रहा अंधा अंध ॥२५॥
सब जग अंधा राम बिन, सूझि न काज अकाज।
राव रंक अंधा सबै, अंधों ही का राज ॥२६॥
दरिया सब जग आँधरा, सूझै सो बेकाम।
सूझा तबही जानिये, ता को दरसै राम ॥२७॥
मन बच काया समेट कर, सुमिरै आतम राम।
दरिया नेड़ा नीपजै१, जाय बसै निज धाम ॥२८॥
सकल ग्रंथ का अर्थ है, सकल बात की बात।
दरिया सुमिरन राम का, कर लीजै दिन रात ॥२६॥
ध्रू लोक ध्रू राम कह, कहै पताला सेस।
दरिया परघट नाम बिन, कहु कौन आयो देख ॥३०॥
लोह पलट कंचन भया, कर पारस को संग।
दरिया परसै नाम को, सहजहिं पलटै अंग ॥३१॥
अपने अपने इष्ट में, राच रहा सब कोय।
दरिया रत्ता राम सूं, साधसिरोमन सोय ॥३२॥
दरिया धन वे साधवा, रहें राम लौ लाय।
राम नाम बिन जीव सो, काल निरंतर खाय ॥३३॥
(१) पैदा हो।
८ दरिया साहब मारवाड़
दरिया काया कारवी १, मौसर है दिन चार ।
जब लग साँस सरीर में, तब लग राम सँभार ॥३४॥
राम नाम रसना रटै, भीतर सुमिरै मन ।
दरिया ये गत साध की, पाया नाम रतन ॥३५॥
दरिया दूजे धर्म से, संसय मिटै न सूल ।
राम नाम रटता रहै, सर्व धर्म का मूल ॥३६॥
लख चौरासी भुगत कर, मानुष देह पाई ।
राम नाम ध्याया नहीं, तो चौरासी आई ॥३७॥
दरिया नाके नाम के, बिरला आवै कोय ।
जो आवै तो परम पद, आवागवन न होय ॥३८॥
दरिया राम अगाध है, आतम का आधार ।
सुमिरत ही सुख उपजै, सहजहि मिटै बिकार ॥३६॥
दरिया राम संभालता, देख किता गुन होय ।
आवागवन का दुख मिटै, ब्रह्म परायन सोय ॥४०॥
मरना है रहना नहीं, जा में फेर न सार ।
जन दरिया भय मान कर, आपन राम सँभार ॥४१॥
कहा कोई बन बन फिरै, कहा लियाँ कोइ फौज ।
जन दरिया निज नाम बिन, दिन दस मन की मौज ॥४२॥
दरिया आतम मल भरा, कैसे निर्मल होय ।
सावन लावै प्रेम का, राम नाम जल धोय ॥४३॥
दरिया इस संसार में, सुखी एक है संत ।
पिये सुधारस प्रेम से, राम नाम निज तंत ॥४४॥
राम नाम निस दिन रटै, दूजा नाहीं दाँय ।
दरिया ऐसे साध की, मैं बलिहारी जाँय ॥४५॥
(१) कूँडी ।
बिरह का अंग ९
दरिया सुमिरन राम का, देखत भूली खेल ।
धन धन हैं वे साधवा, जिन लीया मन मेल ॥४६॥
दरिया सुमिरन राम का, कीमत लखै न कोय !
टुक इक घट में संचरै, पाव बस्तु मन होय ॥४७॥
दरिया सुमिरै राम कां, साकित नाहिं सुहात ।
बीज चमकै गगन में, गधिया बावै१ लात ॥४८॥
फिरी दुहाई सहर में, चोर गये सब भाज ।
सत्रू फिर मित्रज भया, हुआ राम का राज ॥४९॥
जो कुछ थी सोही बनी, मिट गइ खेंचा तान ।
चोर पलट कर साह भै, फिरी राम की आन ॥५०॥
बिरह का अंग
दरिया हर किरपा करी, बिरहा दिया पठाय ।
यह बिरहा मेरे साध को, सोता लिया जगाय ॥१॥
बिरह बियापी देह में, किया निरंतर बास ।
तालावेली जीव में, सिसके साँस उसाँस ॥२॥
कहा हाल तेरे दास का, निस दिन दुख में जाहि ।
पिव सेती परचो नहीं, बिरह सतावै माँहि ॥२॥
दरिया बिरही साध का, तन पीला मन सूख ।
रैन न आवै नींदड़ी, दिवस न लागै भूख ॥३॥
बिरहन पिउ के कारने, ढूँढ़न बन खंड जाय ।
निस बीती पिउ ना मिला, दरद रहा लिपटाय ॥५॥
बिरहन का घर बिरह में, ता घट लोहु न मास ।
अपने साहब कारने, सिसके साँसो साँस ॥६॥
(१) चलावै ।
प्रथम भाग: साखी संग्रह (नाम, गुरु व चेतावनी अंग)
१० दरिया साहब मारवाड़
सूर का अंग
इष्टी स्वाँगी बहु मिले, हिरसी मिले अनंत।
दरिया ऐसा ना मिला, राम रता कोइ संत ॥१॥
पंडित ज्ञानी बहु मिले, बेद ज्ञान परबीन।
दरिया ऐसा ना मिला, राम नाम लवलीन ॥२॥
बक्ता स्रोता बहु मिले, करते खैंचा तान !
दरिया ऐसा ना मिला, जो सन्मुख झेले बान ॥३॥
दरिया बान गुरदेव का, बेधै भरम बिकार।
बाहर घाव दीखै नहीं, भीतर भया सिमार¹ ॥४॥
दरिया बान गुरदेव का, कोइ झेलै सूर सधीर।
लागत ही ब्यापै सही, रोम रोम में पीर ॥५॥
सोई घाव तन पर लगै, उठ्ठ सँभालै साज।
चोट सहारे सब्द की, सो सूरा सिरताज ॥६॥
चोट सहै उर सेल की, मुख ज्यों का त्यों नूर।
चोट सहारै सब्द की, दरिया साँचा सूर ॥७॥
दरिया सूरा गुरमुखी, सहै सब्द का घाव।
लागत ही सुध बीसरे, भूलै आन सुभाव ॥८॥
दरिया साँचा सूरमा, सहै सब्द की चोट।
लागत ही भाजै भरम, निकस जाय सब खोट ॥६॥
दरिया सस्तर बाँध कर, बहुत कहावैं सूर।
सूरा तब ही जानिये, अनी² मिले मुख नूर ॥१०॥
सबहि कटक³ सूरा नहीं, कटक माहिं कोइ सूर।
दरिया पड़े पतंग ज्यों, जब बाजै रन तूर ॥११॥
पड़ै पतंगा अगिन में, देह की नाहिं सँभाल।
दरिया सिप सतगुर मिलै, तो हो जाय निहाल ॥१२॥
(१) मिस्मार, चकनाचूर। (२) नोक, घाव। (३) फ़ौज।
९१
सूर का अंग
भया उजाला गैब का, दैड़े देख पतंग ।
दरिया आपा मेटकर, मिले अगिन के रंग ॥१३॥
दरिया प्रेमी आत्मा, आवै सतगुर संग ।
सतगुर सेती सब्द ले, मिलै सब्द के रंग ॥१४॥
दरिया प्रेमी आत्मा, राम नाम धन पाया ।
निरधन था धनवँत हुवा, भूला घर आया ॥१५॥
सूरा खेत बुहारिया, सतगुर के बिस्वास ।
सिर ले सौंपा राम को, नहिं जीवन की आस ॥१६॥
दरिया खेत बुहारिया, चढ़ा दई की गोद ।
कायर काँपै खड़बड़ै, सूरा के मन मोद ॥१७॥
सूर बीर साँची दसा, भीतर साँचा सूत ।
पूठ¹ फिरै नहिं मुख मुड़ै, राम तना रजपूत ॥१८॥
साध सूर का एक अँग, मना न भावै झूठ ।
साध न छाँड़ै राम को, रन में फिरै न पूठ ॥१९॥
सूर बीर की सभा में, कायर बैठे आय ।
सूरातन आवै नहीं, कोटि भाँति समुझाय ॥२०॥
सूर बीर की सभा में, जो कोइ बैठे सूर ।
सुनत बात सुख ऊपजै, चढ़ै सवाया नूर ॥२१॥
आगे बढ़ै फिरै नहीं, यह सूरा की रीत ।
तन मन अरपै राम को, सदा रहै अघ जीत ॥२२॥
सूर न जानै कायरी, सूरातन से हेत ।
पुरजा पुरजा हो पड़ै, तहू न छाँड़ै खेत ॥२३॥
सूर सदा है सनमुखी, मन में नाहीं संक ।
आपा अरपै राम को, तो बाल न होवै बंक ॥२४॥
(१) पीठ ।
१५ दरिया साहब मारवाड़
सूर बीर साँची दसा, कबहु न मानै हार ।
अनी मिलै आगे धसै, सनमुख झेलै सार१ ॥२५॥
सूरा के सिर साम२ है, साधों के सिर राम ।
दूजी दिस ताकैं नहीं, पड़ै जो कड़ड़ा काम ॥२६॥
सूर चढ़ै संग्राम को, मन में संक न कोय ।
आपा अरपै राम को, मन में संक न कोय ॥२७॥
सूरा खेत बुहारिया, भरम मनी कर चूर ।
आय बिराजा राम जी, दुर्जन भाजा दूर ॥२८॥
पीछे पाँव धरै नहीं, सूरा बड़ा सुभाव ।
हूँ करिया आगे धसै, कायर खेलै दाँव ॥२६॥
साध सुरग चाहै नहीं, नरकाँ दिस नहिं जाय ।
पारब्रह्म के पार लग, पटा गैब का खाय ॥३०॥
पटा पत्रड़िया३ ना लहै, पटा लहै कोइ सूर ।
साखियाँ साहब ना मिलै, भजन किये भरपूर ॥३१॥
दरिया सुमिरन राम का, सूराँ हंदा साज ।
आगे पीछे होय नहीं, वाहि धनी की लाज ॥३२॥
दरिया सो सूरा नहीं, जिन देह करी चकचूर ।
मन को जीत खड़ा रहै, मैं बलिहारी सूर ॥३३॥
सिंधु४ बजा सूरा भिड़ा, बिरद५ वखानै भाट ।
हला मेरु६ धूजी धरा, खुली सुरग की बाट ॥३४॥
बाट खुली जब जानिये, अंतर भया उजास ।
जो कुछ थी सो ही बनी, पूरी मन की आस ॥३५॥
दरिया साँचा सूरमा, अरि दल७ घालै चूर ।
राज घरपिया८ राम का, नगर बसा भरपूर ॥३६॥
(१) लोहा । (२) हथियार का नाम । (३) दरबान । (४) फौजी बाजा । (५) तारीफ ।
(६) पहाड़ । (७) दुश्मन की फौज । (८) थापा ।
किया ब्रह्म में बास ॥३७॥-> wait:जीवन मरन थित मेटकर, किया ब्रह्म में बास ॥३७॥`
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कायागढ़ ऊपर चढ़ा, परसा पद निर्बान । -
ब्रह्म राज निरभय भया, अनहद घुरा निसान ॥३८॥ -
Separator / Section Heading:
- There is a small decorative line under L5: between L5 and L6. Usually we don't transcribe the decorative rule, or just omit it.
नाद परचे का अंग(orनाद परचे का अंग) - wait, there is a dot to the right: no, that's just a speck. Text isनाद परचे का अंग.
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Verses 1 to 10:
- Verse 1:
दरिया सुमिरै राम को, आठ पहर आराध ।रसना में रस उपजे, मिसरी के से स्वाद ॥१॥
- Verse 2:
रसना सेती ऊतरा, हिरदे कीया बास ।दरिया बरषा प्रेम की, षट ऋतु बारह मास ॥२॥
- Verse 3:
*
- Verse 1:
१४ दरिया साहब मारवाड़
दरिया मेरु उलंघ कर, पहुँचा त्रिकुटी सन्ध ।
दुख भाजा सुख ऊपजा, मिटा भर्म का धुन्ध ॥११॥
अनंतहि चंश ऊगिया, सूर्य कोटि परकास ।
बिन बादल बरषा घनी, छह ऋतु बारह मास ॥१२॥
बंक नाल की सुध गहै, कोइ पहुँचै बिरला सन्त ।
अमी फिरै जोत झिलमिलै, नौबत घुरै अनन्त ॥१३॥
दरिया मन परमन भया, बैठा त्रिकुटी छाजै ।
अमी फिरै बिगसै कँवल, अनहद धुन गाजै ॥१४॥
दरिया त्रिकुटी सन्ध में, मन ध्यान धरै कर धीर ।
अवस चलत है सुषमना, चलत प्रेम की सीर ॥१५॥
चलै सुरसरी१ अगम की, हिरदे मंझ समाय ।
जन दरिया वा सुषमना, रोम रोम हो जाय ॥१६॥
दरिया नाद प्रकासिया, सो छबि कही न जाय ।
धन्य धन्य वे साधवा, वहाँ रहे लौ लाय ॥१७॥
दरिया नाद प्रकासिया, पूरी मन की आस ।
घन बरसै गाजै गगन, तेज पुंज परकास ॥१८॥
दरिया नाद प्रकासिया, [तहँ] किया निरंतर बास ।
पारब्रह्म परसा सही, जहँ दरसन पावै दास ॥१९॥
जन दरिया जाय गगन में, परसा देव अनाद ।
असुध बीसरी सुध भई, मिटिया वाद विवाद ॥२०॥
घुरै नगारा गगन में, बाजै अनहद तूर ।
जन दरिया जहँ थिति रची, निस दिन बरसै नूर ॥२१॥
जन दरिया जाय गगन में, किया सुधा रस पान ।
गंग बहै जहँ अगम की, जाय किया असनान ॥२२॥
(१) गंगा ।
नाद परचे का अङ्ग १५
अमी भरत बिगसत कँवल, उपजत अनुभव ज्ञान।
जन दरिया उस देस का, भिन भिन करत बखान ॥२३॥
सुरत गगन में बैठ कर, पति का ध्यान सँजोय।
नाड़ि नाड़ि रूँ रूँ बिषे१, ररंकार धुन होय ॥२४॥
बिन पावक पावक जलै, बिन सूरज परकास।
चाँद बिना जहँ चाँदना, जन दरिया का बास ॥२५॥
नौबत बाजै गगन में, बिन बादल घन गाज।
महल बिराजैं परम गुरु, दरिया के महराज ॥२६॥
कंचन का गिर देख कर, लोभी भया उदास।
जन दरिया थाके बनिज, पूरी मन की आस ॥२७॥
ब्रह्म अगिन ऊपर जलै, चलत प्रेम की बाय।
दरिया सीतल आतमा, [जाका] कर्म कंद२ जल जाय ॥२८॥
कहा कहै किरपा करी, कहै रहै कोइ रूठ।
जन दरिया बानक३ बना, राम ठपोरी पीठ४ ॥२६॥
दरिया त्रिकुटी महल में, भई उदासी मोय।
जहँ सुख है तहँ दुख सही, रबि जहँ रजनी होय ॥३०॥
दरिया मन रंजन कहे, सुखी होत सब कोय।
मीठे औगुन ऊपजै, कडुवा से गुन होय ॥३१॥
मीठे राचै लोग सब, मींठे उपजै रोग।
निरगुन कडुवा नीम सा, दरिया दुर्लभ जोग ॥३२॥
त्रिकुटी के मँझ बहत है, सुख की सलिता जोर।
जन दरिया सुख दुख परे, वह कोइदेस जो और ॥३३॥
त्रिकुटी माहीं सुख घना, नाहीं दुख का लेस।
जन दरिया सुख दुख नहीं, वह कोइ अनुभव देस ॥३४॥
(१) में। (२) पुत्ती, जड़। (३) संजोग। (४) पीठ ठोका।
१६ दरिया साहब मारवाड़
ब्रह्म परचे का अंग
दरिया त्रिकुटी संधि में, महा जुद्ध रन पूर।
कायर जन पूठा फिरै, सुन पहुँचै कोइ सूर ॥१॥
दरिया मेरु उलंघिया, त्रिकुटी बैठा जाय।
जो वहँ से पूठा फिरै, तो विषयों का रस खाय ॥२॥
दरिया मन निज मन अया, त्रिकुटी मंझ समाय।
जो वहँ से पाछे फिरै, तो मन कामन हो जाय ॥३॥
दरिया देखे दोय पख, त्रिकुटी संधि मँझार।
निराकार एकै दिसा, एकै दिसा आकार ॥४॥
निराकार आकार बिच, दरिया त्रिकुटी संधि।
परे अस्थान जो सुरत का, उरे सो मन का बंध ॥५॥
मन बुध चित हंकार कीं, है त्रिकुटी लग दौड़।
जन दरिया इनके परे, ब्रह्म सुरत की ठौर ॥६॥
मन बुध चित हंकार यह, रहें अपनी हद माहिं।
आगे पूरन ब्रह्म है, सो इनकी गम नाहिं ॥७॥
मन बुध चित हंकार के, सुरत सिरोमन जान।
ब्रह्म सरोवर सुरत के, दरिया संत प्रमान ॥८॥
मन बुध चित हंकार यह, रहें सुरत के माहिं।
सुरत मिली जाय ब्रह्म में, जहँ कोइ दूजा नाहिं ॥९॥
मन मेरू१ से वावडै़२, त्रिकुटी लग ओंकार।
जन दरिया इनके परे, ररंकार निरधार ॥१०॥
दरिया त्रिकुटी हद लग, कोइ पहुँचै संत सयान।
आगे अनहद ब्रह्म है, निराधार निरवान ॥११॥
दरिया त्रिकुटी के परे, अनहद ब्रह्म अलेख।
जहाँ सुरत गैली३ भई, अनुभव पद को देख ॥१२॥
(१) पहाड़। (२) लौट आवे। (३) हैरान।
ब्रह्म परचे का अंग १७
रतन अमोलक परख कर, रहा जौहरी थाक।
दरिया तहँ कीमत नहीं, उनमुन भया अबाक१ ॥१३॥
इड़ा पिंगला सुषमना, त्रिकुटी सन्धि मँझार।
दरिया पूरन ब्रह्म के, यह भी उल्ली वार ॥१४॥
सुरत उलट आठों पहर, करत ब्रह्म आराध।
दरिया तबही देखिये, लागी सुन्न समाध ॥१५॥
सुरत ब्रह्म का ध्यान धर, जाय ब्रह्म में पर्स।
जन दरिया जहँ एकमा, दिवस एक सौ बर्स ॥१६॥
ररंकार धुन हौद में, गर्क२ भया कोइ दास।
जन दरिया व्यापै नहीं, नींद भूख और प्यास ॥१७॥
जन दरिया आकास लग, ओंकार का राज।
महासुन्न तिस के परे, ररंकार महराज ॥१८॥
दरिया सुरति सिरोमनी, मिलि ब्रह्म सरोवर जाय।
जहाँ तीनों पहुँचै नहीं, मनसा बाचा काय ॥१६॥
काया अगोचर मन्न अगोचर, सब्द अगोचर सोय।
जन दरिया लवलीन होय, पहुँवैगा जन कोय ॥२०॥
धरती गगन पवन नहिं पानी, पावक चंद न सूर।
रात दिवस की गम नहीं, जहाँ ब्रह्म रहा भरपूर ॥२१॥
ररंकार सतगुर बरम्ह, दरिया चेला सुर्त।
जैसे मिल तैसा भया, ज्यों संचे३ माहीं भर्त्त४ ॥२२॥
दरिया सूरति सर्पनी, चढ़ी ब्रह्म के माँथ।
जाय मिली परब्रह्म से, निरभय रही समाय ॥२३॥
दरिया देखत ब्रह्म को, सुरत भई भयभीत।
तेज पुंज रवि अगिन बिन, जहाँ कोइ उष्ण न सीत ॥२४॥
(१) चुप। (२) डूब जाना। (३) साँचा। (४) ताँवा और सीसा से मिल कर बनी हुई धात।
३
१८ दरिया साहब मारवाड़
पाप पुन्न सुख दुख नहीं, जहँ कोइ कर्म न काल ।
जन दरिया जहँ पड़त है, हीरों की टकसाल ॥२५॥
सुरत निरत परचा भया, अरस परस मिलि एक ।
जन दरिया बानक¹ बना, मिट गया जन्म अनेक ॥२६॥
तज बिकार आकार तज, निराकार को ध्याय ।
निराकार में पैठकर, निराधार लौ लाय ॥२७॥
सुरत मिली जाय ब्रह्म से, अपनो इष्ट सँभाल ।
जन दरिया अनुभौ सबद, जहँ दीखै काल बिसाल ॥२८॥
सुरत मिली जाय ब्रह्म से, मन बुध को दे पूठ ।
जन दरिया जहँ देखिये, कथनी बदनी झूठ ॥२६॥
दरिया जहँ लग गगन है, तहँ लग सुरत निवास ।
इनके आगे सुन्न है, जहँ प्रेम भाव परकास ॥३०॥
दरिया अनहद अगिन का, अनुभौ धूवाँ जान ।
दूरा सेती देखिये, परसे होय पिछान ॥३१॥
मान बड़ा अनुभौ सबद, दूर देसाँतर जाय ।
अनहद मेरा साइयाँ, घट में रहा समाय ॥३२॥
प्रथम ध्यान अनुभौ करै, जा से उपजै ज्ञान ।
दरिया बहुते करत हैं, कथनी में गुजरान ॥३३॥
अनुभौ झूठी थोथरी, निर्गुन सच्चा नाम ।
परम जोत परचै भई, तो धूवाँ से क्या काम ॥३४॥
आँखों से दीखै नहीं, सब्द न पावै जान ।
मन बुध तहँ पहुँचे नहीं, कौन कहै सेलान² ॥३५॥
भाव मिलै परभाव से, धर कर ध्यान अखंड ।
दरिया देखै ब्रह्म को, न्यारा दीखै पिंड ॥३६॥
(१) औमर । (२) निशान ।
भाव करम सुख दुख नहीं, नहिं कोइ पुन्न न पाप ।
दरिया देखै सुन्न चढ़, जहँ आपहि उर रहा आप ॥३७॥
अगम दरीचा अगम घर, जहँ कोइ रूप न रेख ।
जहँ दरिया दुबिधा नहीं, स्वामी सेवक एक ॥३८॥
सुन्न मँडल में परघटा, प्रेम कथा परकास ।
बकता देव निरंजना, स्रोता दरियादास ॥३६॥
पंछी ऊड़ै गगन में, खोज¹ मँडै² नहिं माहिं ।
दरिया जल में मीन गति, मारग दरसै नाहिं ॥४०॥
मन बुध चित पहुँचै नहीं, सब्द सकै नहिं जाय ।
दरिया धन वे साधवा, जहाँ रहे लौ लाय ॥४१॥
दरिया सुन्न समाध की, महिमा घनी अनंत ।
पहुँचा सोई जानसी, कोइ कोइ बिरला संत ॥४२॥
एक एक को ध्याय कर, एक एक आराध ।
एक एक से मिल रहे, जाका नाम समाध ॥४३॥
भाव मिले परभाव से, परभाये पर भाय ।
दरिया मिलकर मिल रहे, तो आवा गवन नसाय ॥४४॥
पाँच तत्त गुन तीन से, आतम भया उदास ।
सरगुन निरगुन से मिला, चौथे पद में बास ॥४५॥
माया तहाँ न संचरै, जहाँ ब्रह्म का खेत ।
जन दरिया कैसे बनै, रवि रजनी का मेल ॥४६॥
जीव जात से बीछुड़ा, धर पंच तत्त का भेख ।
दरिया निज घर आइया, पाया ब्रह्म अलेख ॥४७॥
जात हमारी ब्रह्म है, मात पिता है राम ।
गिरह हमारा सुन्न में, अनहद में बिसराम ॥४८॥
(१) निशान । (२) पड़ता ।
२० दरिया साहब मारवाड़
हंस उदास का अंग
कबहुक भरिया समुंद सा, कबहुक नाहीं छाँट१।
जन दरिया इत उत रता, ते कहिये किरकाँट२॥१॥
किरकाँटा किस काम का, पलट करै बहु रंग।
जन दरिया हंसा भला, जद तद एकै रंग॥२॥
एक रंग उलटी दसा, भीतर भरम न भाज।
जन दरिया निज दास का, तन मन मता मराल३॥३॥
दरिया हंसा ऊजला, बगुलहु उज्जल होय।
दोनों एकहि सारिखा, पर चेजै४ पारष५ जोय॥४॥
दरिया बगुला ऊजला, उज्जल ही होय हंस।
वे सरवर मोती चुगैं, वा के मुख में मंस॥५॥
वा का चेजा४ ऊजला, वा का खाज निषेद।
जन दरिया कैसे बनै, हंस बगुल के भेद॥६॥
जन दरिया हंसा तना६, देख बड़ा ब्यौहार।
तन उज्जल मन ऊजला, उज्जल लेत अहार॥७॥
बाहर से उज्जल दसा, भीतर मैला अंग।
ता सेती कौवा भला, तन मन एकहि रंग॥८॥
बाहर से उज्जल दसा, अंतर उज्जल होय।
दरिया सोना सोल्हवाँ७, काँट८ न लागै कोय॥९॥
मानसरवर मोती चुगै, दूजा नाहीं खान।
दरिया सुमिरै राम को, सो निज हंसा जान॥१०॥
मानसरोवर वासिया, छीलर९ रहै उदास।
जन दरिया भज राम को, जब लग पिंजर साँस॥११॥
(१) छींटा। (२) गिरगिट। (३) हंस। (४) चुगा यानी खुराक। (५) परीक्षा। (६) का।
(७) खरा। (८) जंग। (९) तलैया।
२१
सुपने का अंग
सुपने का अंग
दरिया सोता सकल जग, जागत नाहीं कोय ।
जागे में फिर जागना, जागा कहिये सोय ॥१॥
साध जगावे जीव को, मत१ कोइ उठै जाग ।
जागे फिर सोवै नहीं, जन दरिया बड़ भाग ॥२॥
माया मुख जागै सबै, सो सूता कर जान ।
दरिया जागै ब्रह्म दिस, सो जागा परमान ॥३॥
दरिया तो साँची कहै, झूठ न मानै कोय ।
सब जग सुपना नींद में, जान्या जागन होय ॥४॥
साँख जोग नवधा भगति, यह सुपने की रीत ।
दरिया जागै गुरुमुखी, [जाकी] तत्तनाम से प्रीत ॥५॥
दरिया सतगुर कृपा कर, सब्द लगाया एक !
जागत ही चेतन भया, नेतर खुला अनेक ॥६॥
॥ राग भैरव ॥
सब जग सोता सुध नहिं पावै, बोलै सो सोता बरड़ावै ॥टेक॥
संसय मोह भरम की रैन, अंध धुंध होय सोते ऐन ॥१॥
जप तप सँजम औ आचार, यह सब सुपने के व्यौहार ॥२॥
तीर्थ दान जग प्रतिमा सेवा, यह सब सपना लेवा देवा ॥३॥
कहना सुनना हार औ जीत, पक्षा पछी सपनो बिपरीत ॥४॥
चार बरन और आसम चार, सपना अंतर सब व्योहार ॥५॥
खट दरसन आदि भेद भाव, सपना अंतर सब दरसाव ॥६॥
राजा राना तप बलवंता, सपना माहीं सब बरतंता ॥७॥
पीर औलिया सबै सयाना, ख्वाब माहिं बरतै बिध नाना ॥८॥
काजी सैयद औ सुलताना, ख्वाब माहिं सब करत पयाना ॥६॥
साँख जोग औ नौधा भक्ती, सपना में इनकी इक बिरती ॥१०॥
(१) कदाचित ।
२२ दरिया साहब मारवाड़
काया कसनी दया औ धर्म, सपने सुर्ग औ बंधन कर्म ॥११॥
काम क्रोध हत्या पर नास, सपना माहीं नर्क निवास ॥१२॥
आदि भवानी संकर देवा, यह सब सपना लेवा देवा ॥१३॥
ब्रह्मा बिस्नू दस औतार, सपना अंतर सब ब्यौहार ॥१४॥
उद्भिज सेतज जेरज अंडा, सुपन रूप बरतै ब्रह्मांडा ॥१५॥
उपजै बरतै अरु बिनसावै, सपने अंतर सब दरसावै ॥१६॥
त्याग ग्रहन सपना ब्यौहारा, जो जागा सो सब से न्यारा ॥१७॥
जो कोई साध जागिया चावै, सो सतगुर के सरनै आवै ॥१८॥
कुन कृत बिरला जाग नभागो, गुरमुख चेत सब्द मुख जागो॥१६॥
संसय मोह भरम निस नास, आतम राम सहज परकास ॥२०॥
राम सँभाल सहज घर ध्यान, पाछे सहज प्रकासै ज्ञान ॥२१॥
जन दरियाव सोई बड़ भागो, जाका सुरत ब्रह्म संग जागो ॥२२॥
साध का अंग
दरिया लच्छन साध का, क्या गिरही क्या भेख ।
निःकपटी निरसंक रहि, बाहर भीतर एक ॥१॥
सतगुर को परसा नहीं, सीखा सब्द सुहेत ।
दरिया कैसे नीप
चिंतामनि और अपारख के अंग २३
राजा बाँटै परगना, जो गढ़ का पति होय।
सतगुरु बाँटै राम रस, पीवै बिरला कोय ॥६॥
मतबादी जानै नहीं, ततबादी की बात।
सूरज ऊगा उल्लुवा, गिनै अँधारी रात ॥७॥
भीतर अँधारी भीत सी, बाहर ऊगा भान।
जन दरिया कारज कहा, भीतर बहुली हान ॥८॥
सीखत ज्ञानी ज्ञान गम, करै ब्रह्म की बात।
दरिया बाहर चाँदना, भीतर काली रात ॥६॥
बाहर कुछ समझै नहीं, जस रात अँधेरी होत।
जन दरिया भय कुछ नहीं, जो भीतर जागै जोत ॥१०॥
चिंतामनि का अंग
चिंतामन चौकस चढ़ी, सही रंक के हाथ।
ना काहू के सँग मिलै, ना काहू से बात ॥१॥
दरिया चिंतामनि रतन, धस्यो स्वान पै जाय।
स्वान सूंघ कानैं१ भया, वह टूका ही चाय ॥२॥
दरिया हीरा सहस दस, लख मन कंचन होय।
चिंतामनि एकै भला, ता सम तुलै न कोय ॥३॥
अपारख का अंग
हीरा हलाहल२ क्रोड़ का, जा का कौड़ी मोल।
जन दरिया कीमत बिना, बरतै डाँवाँडोल ॥१॥
हीरा लेकर जौहरी, गया गँवारै देस।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेस ॥२॥
दरिया हीरा क्रोड़ का, [जाकी] कीमत लखै न कोय।
जबर मिलै कोइ जौहरी, तबही परख होय ॥३॥
(१) किनारा। (२) बिलकुल।
आइ पारख छेदन भया, मन दे लीना मोल।
गाँठ बाँध भीतर धरा, मिट गइ डाँवाँडोल ॥४॥
कंकर बाँधा गाँठड़ी, कर हीरा का भाव।
खोला कंकर नीसरा, झूठा यही सुभाव ॥५॥
उपदेश का अंग
जन दरिया उपदेस दे, जा के भीतर चाय।
नातर गैला१ जगत से, बक बक मरै बलाय ॥१॥
दरिया बहु बकवाद तज, कर अनहद से नेह।
औंधा कलसा ऊपरे, कहा बरसावै मेह ॥२॥
बिरही प्रेमी मोम-दिल, जन दरिया निःकाम।
आसिक दिल दीदार का, जासे कहिये राम ॥३॥
जन दरिया उपदेस दे, [जाके] भीतर प्रेम सधीर।
गाहक होय कोइ हींग का, [जाको] कहा दिखावै हीर ॥४॥
दरिया गैला१ जगत से, समझऔ मुख से बोल।
नाम रतन की गाँठड़ी, गाहक बिन मत खोल ॥५॥
दरिया गैला जगत को, क्या कीजै समझाय।
चलना है दिस उतर को, दखिन दिस को जाय ॥६॥
दरिया गैला जगत को, कैसे दीजै सीख।
सौ कोसाँ चालन करै, चाल न जानै बीख२ ॥७॥
दरिया गैला जगत को, कैसे दीजै हेत।
जो सौ बेरा छानिये, तौहू रेत की रेत ॥८॥
दरिया गैला जगत को, क्या कीजै सुलझाय।
सुलझाया सुलझै नहीं, फिर सुलझ सुलझ उलझाय ॥९॥
दरिया गैला जगत को, क्या कीजै समझाय।
रोग नीसरै देह में, पत्थर पूजन जाय ॥१०॥
(१) बावला। (२) कदम।