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सर्वकोश
दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)

दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)

Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press

सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

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पृष्ठ 26

चिंतामनि और अपारख के अंग २३
राजा बाँटै परगना, जो गढ़ का पति होय।
सतगुरु बाँटै राम रस, पीवै बिरला कोय ॥६॥
मतबादी जानै नहीं, ततबादी की बात।
सूरज ऊगा उल्लुवा, गिनै अँधारी रात ॥७॥
भीतर अँधारी भीत सी, बाहर ऊगा भान।
जन दरिया कारज कहा, भीतर बहुली हान ॥८॥
सीखत ज्ञानी ज्ञान गम, करै ब्रह्म की बात।
दरिया बाहर चाँदना, भीतर काली रात ॥६॥
बाहर कुछ समझै नहीं, जस रात अँधेरी होत।
जन दरिया भय कुछ नहीं, जो भीतर जागै जोत ॥१०॥
चिंतामनि का अंग
चिंतामन चौकस चढ़ी, सही रंक के हाथ।
ना काहू के सँग मिलै, ना काहू से बात ॥१॥
दरिया चिंतामनि रतन, धस्यो स्वान पै जाय।
स्वान सूंघ कानैं१ भया, वह टूका ही चाय ॥२॥
दरिया हीरा सहस दस, लख मन कंचन होय।
चिंतामनि एकै भला, ता सम तुलै न कोय ॥३॥
अपारख का अंग
हीरा हलाहल२ क्रोड़ का, जा का कौड़ी मोल।
जन दरिया कीमत बिना, बरतै डाँवाँडोल ॥१॥
हीरा लेकर जौहरी, गया गँवारै देस।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेस ॥२॥
दरिया हीरा क्रोड़ का, [जाकी] कीमत लखै न कोय।
जबर मिलै कोइ जौहरी, तबही परख होय ॥३॥
(१) किनारा। (२) बिलकुल।