दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबिरह का अंग ९
दरिया सुमिरन राम का, देखत भूली खेल ।
धन धन हैं वे साधवा, जिन लीया मन मेल ॥४६॥
दरिया सुमिरन राम का, कीमत लखै न कोय !
टुक इक घट में संचरै, पाव बस्तु मन होय ॥४७॥
दरिया सुमिरै राम कां, साकित नाहिं सुहात ।
बीज चमकै गगन में, गधिया बावै१ लात ॥४८॥
फिरी दुहाई सहर में, चोर गये सब भाज ।
सत्रू फिर मित्रज भया, हुआ राम का राज ॥४९॥
जो कुछ थी सोही बनी, मिट गइ खेंचा तान ।
चोर पलट कर साह भै, फिरी राम की आन ॥५०॥
बिरह का अंग
दरिया हर किरपा करी, बिरहा दिया पठाय ।
यह बिरहा मेरे साध को, सोता लिया जगाय ॥१॥
बिरह बियापी देह में, किया निरंतर बास ।
तालावेली जीव में, सिसके साँस उसाँस ॥२॥
कहा हाल तेरे दास का, निस दिन दुख में जाहि ।
पिव सेती परचो नहीं, बिरह सतावै माँहि ॥२॥
दरिया बिरही साध का, तन पीला मन सूख ।
रैन न आवै नींदड़ी, दिवस न लागै भूख ॥३॥
बिरहन पिउ के कारने, ढूँढ़न बन खंड जाय ।
निस बीती पिउ ना मिला, दरद रहा लिपटाय ॥५॥
बिरहन का घर बिरह में, ता घट लोहु न मास ।
अपने साहब कारने, सिसके साँसो साँस ॥६॥
(१) चलावै ।