दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंब्रह्म परचे का अंग १७
रतन अमोलक परख कर, रहा जौहरी थाक।
दरिया तहँ कीमत नहीं, उनमुन भया अबाक१ ॥१३॥
इड़ा पिंगला सुषमना, त्रिकुटी सन्धि मँझार।
दरिया पूरन ब्रह्म के, यह भी उल्ली वार ॥१४॥
सुरत उलट आठों पहर, करत ब्रह्म आराध।
दरिया तबही देखिये, लागी सुन्न समाध ॥१५॥
सुरत ब्रह्म का ध्यान धर, जाय ब्रह्म में पर्स।
जन दरिया जहँ एकमा, दिवस एक सौ बर्स ॥१६॥
ररंकार धुन हौद में, गर्क२ भया कोइ दास।
जन दरिया व्यापै नहीं, नींद भूख और प्यास ॥१७॥
जन दरिया आकास लग, ओंकार का राज।
महासुन्न तिस के परे, ररंकार महराज ॥१८॥
दरिया सुरति सिरोमनी, मिलि ब्रह्म सरोवर जाय।
जहाँ तीनों पहुँचै नहीं, मनसा बाचा काय ॥१६॥
काया अगोचर मन्न अगोचर, सब्द अगोचर सोय।
जन दरिया लवलीन होय, पहुँवैगा जन कोय ॥२०॥
धरती गगन पवन नहिं पानी, पावक चंद न सूर।
रात दिवस की गम नहीं, जहाँ ब्रह्म रहा भरपूर ॥२१॥
ररंकार सतगुर बरम्ह, दरिया चेला सुर्त।
जैसे मिल तैसा भया, ज्यों संचे३ माहीं भर्त्त४ ॥२२॥
दरिया सूरति सर्पनी, चढ़ी ब्रह्म के माँथ।
जाय मिली परब्रह्म से, निरभय रही समाय ॥२३॥
दरिया देखत ब्रह्म को, सुरत भई भयभीत।
तेज पुंज रवि अगिन बिन, जहाँ कोइ उष्ण न सीत ॥२४॥
(१) चुप। (२) डूब जाना। (३) साँचा। (४) ताँवा और सीसा से मिल कर बनी हुई धात।
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