दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१६ दरिया साहब मारवाड़
ब्रह्म परचे का अंग
दरिया त्रिकुटी संधि में, महा जुद्ध रन पूर।
कायर जन पूठा फिरै, सुन पहुँचै कोइ सूर ॥१॥
दरिया मेरु उलंघिया, त्रिकुटी बैठा जाय।
जो वहँ से पूठा फिरै, तो विषयों का रस खाय ॥२॥
दरिया मन निज मन अया, त्रिकुटी मंझ समाय।
जो वहँ से पाछे फिरै, तो मन कामन हो जाय ॥३॥
दरिया देखे दोय पख, त्रिकुटी संधि मँझार।
निराकार एकै दिसा, एकै दिसा आकार ॥४॥
निराकार आकार बिच, दरिया त्रिकुटी संधि।
परे अस्थान जो सुरत का, उरे सो मन का बंध ॥५॥
मन बुध चित हंकार कीं, है त्रिकुटी लग दौड़।
जन दरिया इनके परे, ब्रह्म सुरत की ठौर ॥६॥
मन बुध चित हंकार यह, रहें अपनी हद माहिं।
आगे पूरन ब्रह्म है, सो इनकी गम नाहिं ॥७॥
मन बुध चित हंकार के, सुरत सिरोमन जान।
ब्रह्म सरोवर सुरत के, दरिया संत प्रमान ॥८॥
मन बुध चित हंकार यह, रहें सुरत के माहिं।
सुरत मिली जाय ब्रह्म में, जहँ कोइ दूजा नाहिं ॥९॥
मन मेरू१ से वावडै़२, त्रिकुटी लग ओंकार।
जन दरिया इनके परे, ररंकार निरधार ॥१०॥
दरिया त्रिकुटी हद लग, कोइ पहुँचै संत सयान।
आगे अनहद ब्रह्म है, निराधार निरवान ॥११॥
दरिया त्रिकुटी के परे, अनहद ब्रह्म अलेख।
जहाँ सुरत गैली३ भई, अनुभव पद को देख ॥१२॥
(१) पहाड़। (२) लौट आवे। (३) हैरान।