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दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)

Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press

सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished52 पृष्ठ

चिंतामनि और अपारख के अंग २३
राजा बाँटै परगना, जो गढ़ का पति होय।
सतगुरु बाँटै राम रस, पीवै बिरला कोय ॥६॥
मतबादी जानै नहीं, ततबादी की बात।
सूरज ऊगा उल्लुवा, गिनै अँधारी रात ॥७॥
भीतर अँधारी भीत सी, बाहर ऊगा भान।
जन दरिया कारज कहा, भीतर बहुली हान ॥८॥
सीखत ज्ञानी ज्ञान गम, करै ब्रह्म की बात।
दरिया बाहर चाँदना, भीतर काली रात ॥६॥
बाहर कुछ समझै नहीं, जस रात अँधेरी होत।
जन दरिया भय कुछ नहीं, जो भीतर जागै जोत ॥१०॥
चिंतामनि का अंग
चिंतामन चौकस चढ़ी, सही रंक के हाथ।
ना काहू के सँग मिलै, ना काहू से बात ॥१॥
दरिया चिंतामनि रतन, धस्यो स्वान पै जाय।
स्वान सूंघ कानैं१ भया, वह टूका ही चाय ॥२॥
दरिया हीरा सहस दस, लख मन कंचन होय।
चिंतामनि एकै भला, ता सम तुलै न कोय ॥३॥
अपारख का अंग
हीरा हलाहल२ क्रोड़ का, जा का कौड़ी मोल।
जन दरिया कीमत बिना, बरतै डाँवाँडोल ॥१॥
हीरा लेकर जौहरी, गया गँवारै देस।
देखा जिन कंकर कहा, भीतर परख न लेस ॥२॥
दरिया हीरा क्रोड़ का, [जाकी] कीमत लखै न कोय।
जबर मिलै कोइ जौहरी, तबही परख होय ॥३॥
(१) किनारा। (२) बिलकुल।

आइ पारख छेदन भया, मन दे लीना मोल।
गाँठ बाँध भीतर धरा, मिट गइ डाँवाँडोल ॥४॥
कंकर बाँधा गाँठड़ी, कर हीरा का भाव।
खोला कंकर नीसरा, झूठा यही सुभाव ॥५॥

उपदेश का अंग

जन दरिया उपदेस दे, जा के भीतर चाय।
नातर गैला१ जगत से, बक बक मरै बलाय ॥१॥
दरिया बहु बकवाद तज, कर अनहद से नेह।
औंधा कलसा ऊपरे, कहा बरसावै मेह ॥२॥
बिरही प्रेमी मोम-दिल, जन दरिया निःकाम।
आसिक दिल दीदार का, जासे कहिये राम ॥३॥
जन दरिया उपदेस दे, [जाके] भीतर प्रेम सधीर।
गाहक होय कोइ हींग का, [जाको] कहा दिखावै हीर ॥४॥
दरिया गैला१ जगत से, समझऔ मुख से बोल।
नाम रतन की गाँठड़ी, गाहक बिन मत खोल ॥५॥
दरिया गैला जगत को, क्या कीजै समझाय।
चलना है दिस उतर को, दखिन दिस को जाय ॥६॥
दरिया गैला जगत को, कैसे दीजै सीख।
सौ कोसाँ चालन करै, चाल न जानै बीख२ ॥७॥
दरिया गैला जगत को, कैसे दीजै हेत।
जो सौ बेरा छानिये, तौहू रेत की रेत ॥८॥
दरिया गैला जगत को, क्या कीजै सुलझाय।
सुलझाया सुलझै नहीं, फिर सुलझ सुलझ उलझाय ॥९॥
दरिया गैला जगत को, क्या कीजै समझाय।
रोग नीसरै देह में, पत्थर पूजन जाय ॥१०॥

(१) बावला। (२) कदम।

उपदेश का अङ्ग २५
भेड़ गती संसार की, हारे गिनै न हार ।
देखा देखि परबत चढ़ै, देखा देखी खाड़१ ॥११॥
दरिया सौ अंधा बिचै, एक सुभाको जाय ।
वह तो बात देखी कहै, वा के नाहीं दाय२ ॥१२॥
दरिया सारा३ अंध को, कहै देख देख कुछ देख ।
अंध कहै सूझै नहीं, कोइ पूरबला लेख ॥१३॥
कंचन कंचन ही सदा, काँच काँच सो काँच ।
दरिया झूठ सो झूठ है, साँच साँच सो साँच ॥१४॥
जन दरिया निज साँच का, साँचा ही ब्यौहार ।
झूठ झूठ ही नीवड़ै, जा में फेर न सार ॥१५॥
दरिया साँच न संचरै, जब घर घालै झूठ ।
साँच आन परगट हुआ, जब झूठ दिखावै पीठ ॥१६॥
जन दरिया इस झूठ की, डागल४ ऊपर दौड़ ।
साँचि दौड़ चौगान में, सो संताँ सिर मौर ॥१७॥
कानों सुनी सो झूठ सब, आँखों देखी साँच ।
दरिया देखे जानिये, यह कंचन यह काँच ॥१८॥
साध पुरुष देखी कहैं, सुनी कहैं नहिं कोय ।
कानों सुनी सो झूठ सब, देखी साँची होय ॥१६॥
दरिया आगे साँच के, झूठ किती इक बात ।
जैसे ऊगे भान के, रात अँधारी जात ॥२०॥
दरिया साँचा राम है, और सकल ही झूठ ।
उनमुख रहिये राम से, दे सबही को पीठ ॥२१॥
दरिया साँचा राम है, फिर साँचा है संत ।
यह तो दाता मुक्ति का, वह मुख नाम कहंत ॥२२॥
(१) गढ़ा । (२) पसंद । (३) सिगरा । (४) छत ।
४

दरिया साहब मारवाड़
दरिया गुरु दरियाव की, साध चहूँ दिस नहर ।
संग रहै सोई पियै, नहिं फिरै तृषाया बहर ॥२३॥
साध सरोवर राम जल, राग द्वेस कछु नाहिं ।
दरिया पीवै प्रीत कर, सो तिरपत हो जाहि ॥२४॥
जन दरिया गुन गाय ले, बहता अंग सरीर ।
बलिहारी उस अंग की, खैंचा निकसै छीर ॥२५॥
साधू जल का एक अँग, बरतै सहज सुभाव ।
ऊंची दिसा न संचरै, निवन१ जहाँ ढलकाव ॥२६॥
दरिया नाके पोल के, इक पंछी आवै जाय ।
ऐसे साधू जक्त में, बरतैं सहज सुभाय ॥२७॥
मच्छी पंछी साध का, दरिया मारग नाहिं ।
अपनी इच्छा से चलैं, हुकम धनी के माहिं ॥२८॥
साधू चंदन बावना२, [जाके] एक राम की आस ।
जन दरिया इक राम बिन, सब जग आक पलास ॥२६॥
पारस का अंग
जन दरिया षट धात का, पारस कीया नाँव ।
परसा सो कंचन भया, एक रंग इक भाव ॥१॥
दरिया छुरी कसाब की, पारस परसै आय ।
लोह पलट कंचन भया, आमिष३ अखान जाय ॥२॥
लोह काला भीतर कठिन, पारस परसै सोय ।
उर नरमी अति निरमला, बाहर पीला होय ॥३॥
पारस परसा जानिये, जो उलटै अँग अंग ।
अँग अंग पलटै नहीं, तौ है झूठा संग ॥४॥
(१) नीचा । (२) बावना चंदन उस अमल चंदन को कहते हैं जिस के पास के दरख्त
मलियागिर पर मय सुगंधित हो जाते हैं । (३) माँस ।

पारस जाकर लाइये, जाके अंग में गात१।
क्या लावै पाषान को, घस घस होय संताप ॥५॥
दरिया काँटी२ लोह की, पारस परसै सोय ।
धात बस्तु भीतर नहीं, कैसे कंचन होय ॥६॥
भेष का अंग
दरिया काँटी२ भेष सब, भीतर धात न प्रेम ।
कली३ लगावै कपट की, नाम धरावै हेम४ ॥१॥
दरिया काँचे दूध का, बानो सो बन जाय ।
दूध फाट काँजी भई, तहँ गुन कंहाँ समाय ॥२॥
दरिया काँजी भेष है, फाड़ै काँचा दूध ।
अहँग बड़ँग कर आतमा, मेटै साँची सूध ॥३॥
बारह बाटै बहत है, दरिया जगत औ भेष ।
तू बहता सँग मत बहै, रहता साहब देख ॥४॥
दरिया बिल्ली गुरु किया, उज्जल बगु को देख ।
जैसे को तैसा मिला, ऐसा जक्त और भेष ॥५॥
चौकी बैठी काल की, दरिया कलु के भेष ।
इन सबही को पीठ दे, सनमुख साहिब देख ॥६॥
दरिया संगत भेष की, हुई मिटावै साँट५।
परदा घालै राम बिच, करदे बारह बाट ॥७॥
दरिया स्वाँगी भेष का, बागा पाछा६ अंग ।
जैसे कपड़ा पास७ बिन, लागत नहीं रंग ॥८॥
दरिया संगी साध का, अंतर प्रेम प्रकास ।
राम भजै साँचे मते, दूजे धुंध निकास ॥९॥
पिरथम हम यों जानते, स्वाँग धरै सो साध ।
सतगुर से परचा भया, दीसी मोटि विराध ॥१०॥
(१) जौहर । (२) मैल । (३) कलई । (४) सोना । (५) संधि (६) उलटा पलटा । (७) जामन ।

२८ दरिया साहब मारवाड़
दरिया संगी स्वाँग का, जा का बिकल सरीर ।
मतलब देखै आप का, नहिं जानै पर पीर ॥११॥
दरिया साध और स्वाँग का, क्रोड़ कोस का बीच ।
राम रता साँचा मता, स्वाँग काल की कीच ॥१२॥
दरिया परसै साध को, तो उपजै साँची सीख ।
जो कोई परसै भेष को, ताहि मँगावै भीष ॥१३॥
साध स्वाँग में आँतरा, जैसा दिवस औ रात ।
इनके आसा जगत की, उन को राम सुहात ॥१४॥
साध स्वाँग अस आँतरा, जेता झूठ और साँच ।
मोती मोती फेर बहु, इक कंचन इक काँच ॥१५॥
साध स्वाँग अस आँतरा, जस कामी निःकाम ।
भेष रता ते भीख में, नाम रता ते राम ॥१६॥
भेष बिजूका१ नाम का, कायर को डरपाय ।
दरिया सिंघा ना डरै, जहाँ नाम तहँ जाय ॥१७॥
भेष बिजूका१ नाम का, देखत डरै कुरंग२ ।
दरिया सिंघा ना डरै, भीतर निर्भय अंग ॥१८॥
तम पर भेष बनाय के, मकर पकड़ भया सूर ।
संग लगाया लग रहै, दूर किया होय दूर ॥१६॥
दरिया ऐसा भेष है, जैसा अड़वा३ खेत ।
बाहर चेतन की रहन, भीतर जड़ अचेत ॥२०॥
स्वाँग कहै मैं पेट भराऊँ, डहकाऊँ४ संसार ।
राम नाम जाने बिना, बोरूँ काली धार ॥२१॥
दरिया सब जग आँधरा, सूझ न काज अकाज ।
भेष रता अंधा सबै, अंधाई का राज ॥२२॥
(१) एक जानवर का नाम जो चौपायो के पेट के अंदर घुस कर माँस खा जाता है।
(२) हिरन । (३) काली हाँडी वगैरह जो जानवरों के डराने को खेत में खड़ी कर देतें हैं । (४)
भटकाऊँ ।

मिश्रित अंग २६
माला फेरे क्या भया, मन फाटै कर भार ।
दरिया मन को फेरिये, जामें बसे बिकार ॥२३॥
जो मन फेरै राम दिस, कल बिख नासै धोय ।
दरिया माला फेरते, लोग दिखावा होय ॥२४॥
कंठी माला काठ की, तिलक गार का होय ।
जन दरिया निज नाम बिन, पार न पहुँचे कोय ॥२५॥
पाँच सात साखी कही, पद गाया दस दोय ।
दरिया कारज ना सरै, पेट भराई होय ॥२६॥
साँख जोग पपील१ गति, बिघन पड़ै बहु आय ।
बावल२ लागै गिर पड़े, मंजिल न पहुँचे जाय ॥२७॥
भक्ती सार बिहंग गति, जहँ इच्छा तहँ जाय ।
श्री सतगुर रच्छा करें, बिघन न व्यापै ताय ॥२८॥
मिश्रित साखी
दरिया सब जग आँधरा, सूझै सो बेकाम ।
भीतर का नेतर खुला, तबही दरसै राम ॥१॥
दरिया सब जग आँधरा, सूझै नहीं लगार३ ।
औषध है सतसंग का, सतगुरु बोवनहार ॥२॥
दरिया गुरु किरपा करी, सब्द लगाया एक ।
जागत ही चेतन भया, नेतर खुला अनेक ॥३॥
दरिया भागे भरम सब, पाया राम महबूब ।
जाके भान उगै नहीं, दीपक करना खूब ॥४॥
आन धरम दीपक दसा, भरम तिमर होय तास ।
दरिया दीपक क्या करै, [जाके] राम रवी परकास ॥५॥
दरिया सूरज ऊगिया, सब भ्रम गया विलाय ।
उर में गंगा परगटी, सरवर काहे जाय ॥६॥
(१) चींटी । (२) बगुला । (३) पास ।

द्वितीय भाग: पद एवं शब्द संग्रह (सजीवन नाम उपसंहार)

दरिया सूरज ऊगिया, नैन खुला भरपूर।
जिन अंधे देखा नहीँ, तिन से साहब दूर ॥७॥
दरिया सूरज ऊगिया, चहुँ दिस भया उजास।
राम प्रकासै देह में, तो सकल भरम का नास ॥८॥
पाय बिसारै राम को, भ्रष्ट होत है सोय।
रबि दीपक दोनों बिना, अंधकार ही होय ॥९॥
पाय बिसारै राम को, बैठा सब ही खोय।
दरिया पड़ै अकास चढ़, राखनहार न कोय ॥१०॥
पाय बिसारै राम को, महा अपराधी सोय।
दरिया तीनों लोक में, इसा न दुजा कोय ॥११॥
पाय बिसारै राम को, तीन लोक तल सोय।
जन दरिया अघ जीव का, दिन दिन दूना होय ॥१२॥
बड़ के बड़ लागै नहीं, बड़ के लागै बीज।
दरिया नान्हा होय कर, राम नाम गह चीज ॥१३॥
रसना अंतर वाहिये¹, लोक लाज सब खोय।
दरिया पानी प्रेम का, सींच सहज बड़ होय ॥१४॥
दरिया तीनों लोक में, देखा दोय बिनान।
गुजरानी गुजरान में, गलतानी गलतान ॥१५॥
गुजरानी गलतान की, दरिया ये पहिचान।
ग्यान रता गुजरान सब, कोइ नाम रता गलतान ॥१६॥
सोइ कंथ कबीर का, दादू का महराज।
सब संतन का बालमा, दरिया का सिरताज ॥१७॥
दरिया तीनों लोक में, ढूंढ़ा सबही धाम।
तीर्थ वर्त विधि करत बहु, बिना राम किन काम ॥१८॥
(१) जोतिये।

मिश्रित अंग ३१-
तीन लोक चौदह भवन, दरिया देखा जोय ।
राम सरीखा राम है, इसा न दूजा कोय ॥१९॥
तीन लोक चौदह भवन, ढूँढ़ा सबही धाम ।
दरिया देखा निरत कर, राम सरीखा राम ॥२०॥
दरिया परछे१ नाम के, दूजा दिया न जाय ।
तन मन आतम वार कर, राखीजै उर माँय ॥२१॥
दरिया सुमरै राम को, [जाकी] पारख कीजै जाय ।
सरवन ढल नेतर ढलै, देह रसना ढल जाय ॥२२॥
दरिया सतगुरु सब्द ले, करै राम संयोग ।
ज्ञान खुलै अरबल२ बढ़े, देही - रहै निरोग ॥२३॥
दरिया प्रेमी आतमा, करै राम का गाढ़ ।
आवै उबासी चौगुनी, भाजन लागै हाड़ ॥२४॥
कंचन भाजन३ बिष भरा, सो मेरे किस काम ।
दरिया बासन सो भला, जा में अमृत राम ॥२५॥
जो काया कंचन मई, रतनों जड़िया चाम ।
दरिया कहै किस काम का, जो मुख नाहीं राम ॥२६॥
राम सहित मध्यम भला, गलत कोढ़ होय अंग ।
उत्तम कुल को त्याग कर, रहिये उन के संग ॥२७॥
कस्तूरी कूंडे४ भरी, मेली ऊँड़े५ ठाँय ।
दरिया छानी६ क्यों रहै, साख भरै सब गाँव ॥२८॥
कूंड़ा आला७ चाम का, भीतर भरा कपूर ।
दरिया बासन क्या करै, बस्तु दिखावै नूर ॥२९॥
जन दरिया पुन पाप के, थोथे तीराँ जूझ ।
[

वाहर!
Wait, look at 'वादसाह' (L21): no diagonal line, 'व'!
Look at 'बाहर' in L24: it's 'वाहर'!! 'व' with 'ा' = 'वा'!
Look at 'वाहर भीतर एक': yes, "वाहर भीतर एक" (Dingal/Braj often writes 'वाहर').

Everything is thoroughly verified.३२ दरिया साहब मारवाड़
पाप पुन्न सुख दुःख की, अरट¹ भरत है साख ।
जन दरिया रह राम लग, वहै सबही को राख² ॥३१॥
जीव बिलंब्या³ जीव से, कारज सरै न कोय ।
जन दरिया सतगुर मिलै, तो ब्रह्म बिलंबन⁴ होय ॥३२॥
जीव बिलंबन झूठ है, मिल मिल बिछुड़ै जाय ।
ब्रह्म बिलंबन साँच है, रह उर माँहि समाय ॥३३॥
सकल आदि सब के परे, है अबिनासी राम ।
उपजै बरतै बिनसजै⁵, माया रूपी काम ॥३४॥
दरिया दस दरवाज में, ता बिच पढ़त निमाज ।
ररो ममो इक रटत है, और सकल बेकाज ॥

मिश्रित अंग ३३
रहनी करनी साध की, एक राम का ध्यान।
बाहर मिलता सो मिलै, भीतर आतम ज्ञान ॥४३॥
तरवर छाना¹ फल नहीं, पिरथी से बनराय।
सतगुरु छाना सिष नहीं, दूर देसंतर जाय ॥४४॥
दरिया संगत साध की, सहजै पलटै बंस।
कीट छाँड़ मुक्ता चुगै, होय काग से हंस ॥४५॥
साँची संगत साध की, जो कर जानै कोय।
दरिया ऐसी सो करै, [जेहि] कारज करना होय ॥४६॥
दरिया संगत साध की, सहजै पलटै अंग।
जैसे संग मजीठ के, कपड़ा होय सुरंग ॥४७॥
दरिया संगत साध की, कटत बिष नासै धोय।
कपटी की संगत किये, आपहु कपटी होय ॥४८॥
सतगुरु को परसा नहीं, सुमिरा नाहीं राम।
ते नर पसू समान हैं, साँस लेत बेकाम ॥४६॥
माया माया सब कहै, चीन्है नाहीं कोय।
जन दरिया

३४ दरिया साहब मारवाड़
जन दरिया अँग साध का, सीतल बचन सरीर ।
निर्मल दसा कमोदिनी, मिले मिटावै पीर ॥५५॥
संकट पड़ै जब साध को, सब संतन के सोग ।
दरिया सहाय करैं हरी, परचे मानैं लोग ॥५६॥
बातों में ही बह गया, निकस गया दिन रात ।
मुहलत अब पूरी भई, आन पड़ी जम घात ॥५७॥
दरिया औषध राम रस, पीये होत समाध ।
महा रोग जीवन मरन, तेहि की लगै न ब्याध ॥५८॥
दरिया निरगुन राम है, सरगुन सतगुर देव ।
यह सुमिरावैं राम को, वो है अलष अभेव ॥५९॥
जारी गावै कृसन की, हड्डी जरावै सीत ।
दरिया कैसे जानिहै, राम नाम की रीत ॥६०॥
दरिया अमल¹ है आसुरी, पिये होय सैतान ।
राम रसायन जो पिये, सदा छाक² गलतान ॥६१॥
नारी आवै प्रीत कर, सतगुर परसै आन ।
दरिया हित उपदेस दे, माय बहिन धी जान ॥६२॥
नारी जननी जगत की, पाल पोस दे पोष ।
मूरख राम बिसार कर, ताहि लगावै दोष ॥६३॥
ररो तौ रब आप है, ममा मोहम्मद जान ।
दोय हरफ में माइना³, सबही वेद पुरान ॥६४॥
ररंकार अनहद की, दरिया परख अवाज ।
और इष्ट पहुँचै नहीं, जहाँ राम का राज ॥६५॥
सिव ब्रह्मा और बिस्नु का, येही उरे मँडान ।
जन दरिया इनके परे, निरंजन का नीसान ॥६६॥
(१) नशा । (२) मस्त । (३) अर्थ ।

मिश्रित अङ्ग ३५
दरिया देही गुरमुखी, अबिनासी की हाट ।
सनमुख होय सौदा करै, सहजहि खुलै कपाट ॥६७॥
अरँड आक अरु बाँस तरु, होता चंदन संग ।
गाँठ गँठीला थोथरा, पलटा नाहीं अंग ॥६८॥
उभय करम बंधन करै, नाम करै भय हान ।
दरिया ऐसे दास के, बरतै खैंचा तान ॥६६॥
दरिया दुखिया जब लगी, पछा पछी बेकाम ।
सुखिया जबही होयगा, राज निकंटा राम ॥७०॥
दृष्ट न मुष्ट न अगम है, अति ही करड़ा काम ।
दरिया पूरन ब्रह्म में, कोइ संत करै बिसराम ॥७१॥
॥ राग भैरौ ॥
आदि अनादी मेरा साँईं ॥ टेक ॥
दृष्ट न मुष्ट है अगम अगोचर, यह सब माया उनहीं माईं ॥१॥
जो बन माली सींचै मूल, सहजै पिवै डाल फल फूल ॥२॥
जो नरपति को गिरह बुलावै, सेना सकल महज ही आवै ॥३॥
जो कोई कर भान प्रकासै, तौ निस तारा सहजहि नासै ॥४॥
गरुड़ पंख जो घर में लावै, सर्प जाति रहने नहिं पावै ॥५॥
दरिया सुमिरै एकहि राम, एक राम सारै सब काम ॥६॥
जो सुमिरूँ तो पूरन राम ॥ टेक ॥
अगम अपार दार नहिं जा को, है सब संतन का बिसराम ॥१॥
कोट बिस्नु जा के अगवानी, संख चक्र सत सारँग पानी ॥२॥
कोट कारकुन बिध कर्मधार, परजापति मुनि बहु बिस्तार ॥३॥
कोट काल संकर कोतवाल, भैरव दुर्गा धरम बिचार ॥४॥
अनंत संत ठाढ़े दरबार, आठ सिधि नौ निधि द्वारपाल ॥५॥

, wait, or two slants?
Wait, compare with 'तपैं' in line 3: two slants.
Compare with 'गावै' in line 1: two slants.
In line 2, over 'च', it is curved like a crescent: a candrabindu चँवर! Wait, look at 'काँपै' in line 7: 'काँ' has a candrabindu!
Yes, Belvedere Press has the candrabindu type. So in line 2 it's चँवर or चैंवर? It looks like चँवर!

Line 3:
कोट तेज जा के तपैं रमाय, बरुन कोट जा के नीर समाय ॥८॥
Wait, "तपैं" has 'ै' and dot.

Line 4:
पृथी कोट फुलवारी गंध, सुरत कोट जा के लाया बंध ॥६॥
Wait, let's check "कोट" vs "कांट":
If we look at "पृथी कांट" - wait, did the typesetter type "कांट"?
Wait, why does it have an anusvara? Look above: there is a dot!
Wait, in line 11: "किता कांट बरतावनहार" - there is also a dot!
Wait! Why would it say "कांट"?
Could it be "कोट" with a defective 'ो' matra?
In Belvedere press, the 'ो' matra is composed

मिश्रित अङ्ग ३७
काया का जंत्र सब्द मन मुठिया, सुषमन ताँत चढ़ाई ।
गगन मंडल में धुनुआँ बैठा, मेरे सतगुर कला लिखाई ॥१॥
पाप पान हर१ कुबुध काँकड़ा२, सहज सहज झड़ जाई ।
घुंडी गाँठ रहन नहिं पावै, इकरंगी होय आई ॥२॥
इकरँग हुआ भरा हरि चोला, हरि कहै कहा दिलाऊँ ।
मैं नाहीं मेहनत का लोभी, बक्सो मौज भक्ति निज पाऊँ ॥३॥
किरपा कर हरि बोले बानी, तुम तौ हौ मम दास ।
दरिया कह मेरे आतम भीतर, मेलौ राम भक्ति बिस्वास ॥४॥
आदि अन्त मेरा है राम, उन बिन और सकल बेकाम ॥१॥
कहा करूँ तेरा बेद पुराना, जिन है सकल जगत भरमाना ॥२॥
कहा करूँ तेरी अनुभ बानी, जिन तें मेरो बुद्धि भुतानी ॥३॥
कहा करूँ ये मान बड़ाई, राम बिना सबही दुखदाई ॥४॥
कहा करू तेरा सांख और जोग, राम बिना सब बंधन रोग ॥५॥
कहा करूँ इन्द्रिन का सुखव, राम बिना देवा सब दुखव ॥६॥
दरिया कहै राम गुरमुखिया, हरि बिन दुखी राम सँग सुखिया ।७॥
॥ राग पंचम ॥
पतिव्रता पति मिली है लाग,
जहँ गगन मँडल में परम भाग ॥ टेक ॥
जहँ जल बिन कँवला बहु अनंत ।
जहँ बपु३ बिन भौंरा गोह४ करंत ॥ १ ॥
अनहद बानी अगम खेल ।
जहँ दीपक जरै बिन बाती तेल ॥ २ ॥
जहँ अनहद सब्द है करत घोर ।
बिन मुख बोलै चात्रिक मोर ॥ ३ ॥
(१) पाप रूपा पत्ते दूर करके । (२) बिनौले । (३) शरीर । (४) गुंजार ।

२८ दरिया साहब मारवाड़
बिन रसना गुन उदत नार ।
पाँव बिन पातर १ निरतकार ॥ ४ ॥
जहँ जल बिन सरवर भरा पूर ।
जहँ अनंत जोत बिन चन्द सूर ॥ ५ ॥
बारह मास जहँ ऋतु बसंत ।
ध्यान धरैं जहँ अनंत संत ॥ ६ ॥
त्रिकुटी सुखमन चुवत खीर ।
बिन बादल बरखै मुक्ति नीर ॥ ७ ॥
अमृत धारा चलै सीर २ ।
कोइ पीवै बिरला संत धीर ॥ ८ ॥
ररंकार धुन अरूप एक ।
सुरत गही उनही की टेक ॥ ६ ॥
जन दरिया बैराट चूर ।
जहँ बिरला पहुँचे संत सूर ॥१०॥


चल चल रे हंसा राम सिंध ।
बागड़ ३ में क्या रह्यो बंध ॥ टेक ॥
जहँ निर्जल धरती बहुत धूर ।
जहँ साकित बस्ती दूर दूर ॥ १ ॥
ग्रीषम ४ ऋतु में तपै भोम ।
जहँ आतम दुखिया रोम रोम ॥ २ ॥
भूख प्यास दुख सहै आन ।
जहँ मुक्ताहल नहिं खान पान ॥३॥
जउवा ५ नारू ६ दुखित रोग ।
जहँ मैं तैं वानी हरष सोग ॥ ४ ॥
(१) वश्या । (२) ठंडी । (३) नूणी धरती । (४) गरमी । (५) एक तरह के कीड़े ।
(६) बीमारी का नाम ।

मिश्रित अंग ३६
माया बागड़१ बरनी येह ।
अब राम सिंध बरनूँ सुन लेह ॥ ५ ॥
अगम अगोचर कथ्या न जाय ।
अब अनुभव माहीं कहूँ सुनाय ॥ ६ ॥
अगम पंथ है राम नाम ।
गिरह बसौ जाय परम धाम ॥ ७ ॥
मान सरोवर बिमल नीर ।
जहँ हंस समागम तीर तीर ॥ ८ ॥
जहँ मुक्ताहल बहु खान पान ।
जहँ अवगत तीरथ नित सनान ॥ ९ ॥
पाप पुन्न की नहीं छोत ।
जहँ गुरु सिष मेला सहज होत ॥ १० ॥
गुन इंद्री मन रहे थाक ।
जहँ पहुँच न सके बेद बाक ॥ ११ ॥
अगम देस जहँ अभयराय ।
जन दरिया सुरत अकेली जाय ॥ १२ ॥


चल सूवा तेरे आद राज ।
पिंजरा में बैठा कौन काज ॥ टेक ॥
बिल्ली का दुख दहै जोर, मारे पिंजरा तोर तोर ॥१॥
मरने पहले मरो धीर, जो पाछे मुक्ता सहज खीर ॥२॥
सतगुर सब्द हृदे में धार, सहजाँ सहजाँ करो उचार ॥३॥
अमि प्रवाह धसै जब आभ, नाद प्रकासै परम लाभ ॥४॥
फेर गिरह बसावो गगन जाय, जहँ बिल्ली मृत्यु न पहुँचे आय ॥५॥
आम फलै जहँ रस अनंत, जहँ सुख में पावौ परम तंत ॥६॥
(१) सूखी धरती ।

मत गैला¹ ।" -> "थून मत गैला" - wait, look at footnote 1:
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"जन दरिया यह बड़ा अचंभा, कहे न समझै कोई ।"
(Wait, is it "बड़ा" or "वड़ा"? It is "वड़ा": व + ड़ + ा).
Line 26:
"भेड़ पूंछ गहि मागर लाँघै, निस्रय डूबै सोई । ५॥"
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Wait! In "मागर", it's "सागर" (ocean)! "भेड़ पूंछ गहि सागर लाँघै, निस्रय डूबै सोई ।"
Crossing the ocean by holding a sheep's tail! (भेड़ की पूँछ पकड़कर भवसागर पार करना).
The typesetter literally used

मिश्रित अंग ४१
मैं तोहि कैसे बिसरूँ देवा ।
ब्रह्मा बिस्नु महेसुर ईसा, ते भी बंधैं सेवा ॥ टेक ॥
सेस सहज मुख निस दिन ध्यावै, आतम ब्रह्म न पावै ।
चाँद सूर तेरी आरति गावैं, हिरदय भक्ति न आवै ॥१॥
अनंत जीव जा की करत भावना, भरमत बिकल आयाना ।
गुरु परताप अखँड लौ लागी, सो तेहि माहिं समाना ॥२॥
बैकुंठ आदि सो अँग माया का, नरक अंत अँग माया ।
पारब्रह्म सो तो अगम अगोचर, कोइ बिरला अलख लखाया ॥३॥
जन दरिया यह अकथ कथा है, अकथ कहा क्या जाई ।
पंछी का खोज मीन का मारग, घट घट रहा समाई ॥४॥


जीव बटाऊ रे बहता भाई मारग माईं ।
आठ पहर का चालना, घड़ी-इक ठहरै नाईं ॥१॥
गरभ जन्म बालक भयो रे, तरुनाये गर्भान ।
बृद्ध मृतक फिर गर्भ बसेरा, [तेरा] यह मारग परमान ॥२॥
पाप पुन्न सुख दुख की करनी, बेड़ी थारे लागी पाँय ।
पंच ठगों के बस पड़्यो रे, कब घर पहुँचै जाय ॥३॥
चौरासी बासो बस्यो रे, अपना कर कर जान ।
निस्चय निस्चल होयगो रे, पद पहुँचै निर्बान ॥४॥
राम बिना तो को ठौर नहीं रे, जहँ जावै तहँ काल ।
जन दरिया मन उलट जगत सूं, अपना राम सम्हाल ॥५॥
॥ राग सोरठ ॥
है कोइ संत राम अनुरागी,
जा की सुरत साहब से लागी ॥ टेक ॥
अरस परस पिव के सँग राती, होय रही पतिबरता ।
दुनिया भाव कछु नहिं समझै, ज्यों समुँद समानी सरिता ॥१॥
६

४२ दरिया साहब मारवाड़
मीन जाय कर समुंद समानी, जहाँ देखै तहँ पानी ।
काल कीर का जाल न पहुँचे, निर्भय ठौर लुभानी ॥३॥
बावन चंदन भौंरा पहुॅचा, जहं बैठे तहँ गंधा ।
उड़ना छोड़ के थिर हो बैठा, निस दिन करत अनंदा ॥४॥
जन दरिया इक राम भजन कर, भरम बासना खोई ।
पारस परस भया लोह कंचन, बहुर न लोहा होई ॥५॥


साधो राम अनूपम बानी ।
पूरा मिला तो वह पद पाया, मिट गइ खैंचा तानी ॥टेक॥
मूल चाँप दृढ़ आसन बैठा, ध्यान धनी से लाया ।
उलटा नाद कँवल के मारग, गगना माहिं समाया ॥१॥
गुरु के सब्द की कूंजी सेती, अनंत कोठरी खोली ।
ध्रू लोक पर कलस विराजै, ररंकार धुन बोली ॥२॥
जहँ बसत अगाध अगम सुख सागर, देख सुरत बौराई ।
वस्तु घनी पर बरतन ओछा, उलट अपूठी आई ॥३॥
सुरत सब्द मिल परचा हूआ, मेरु मद्ध का पाया ।
ता में पैस गगन में आया, वहँ जाय अलख लखाया ॥४॥
जहँ पग बिन पातर कर बिन बाजा, बिन मुख गावैं नारी ।
बिन बादल जहँ मेंह बरसै है, ठुमक ठुमक सुख क्यारी ॥५॥
जन दरियाव प्रेम गुन गाया, वहँ मेरा अरट चलाया ।
मेरु डंड होय नाल चली है, गगन बाग जहँ पाया ॥६॥


साधो ऐसी खेती करई, जासे काल अकाल न मरई ॥टेक॥
रसना का हल बैल मन पवना, विरह भोम तहँ बाई ।
राम नाम का बीजा बोया, मेरे सतगुर कला सिखाई ॥१॥