दरिया साहिब की बानी: मारवाड़ वाले (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - सजीवन नाम व पद)
Dariya Sahib Marwad Wale Ki Bani: Belvedere Press
सन्त दरिया साहिब मारवाड़ (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
पृष्ठ 40, कुल 52 में से
संदर्भ में पढ़ेंमिश्रित अङ्ग ३७
काया का जंत्र सब्द मन मुठिया, सुषमन ताँत चढ़ाई ।
गगन मंडल में धुनुआँ बैठा, मेरे सतगुर कला लिखाई ॥१॥
पाप पान हर१ कुबुध काँकड़ा२, सहज सहज झड़ जाई ।
घुंडी गाँठ रहन नहिं पावै, इकरंगी होय आई ॥२॥
इकरँग हुआ भरा हरि चोला, हरि कहै कहा दिलाऊँ ।
मैं नाहीं मेहनत का लोभी, बक्सो मौज भक्ति निज पाऊँ ॥३॥
किरपा कर हरि बोले बानी, तुम तौ हौ मम दास ।
दरिया कह मेरे आतम भीतर, मेलौ राम भक्ति बिस्वास ॥४॥
आदि अन्त मेरा है राम, उन बिन और सकल बेकाम ॥१॥
कहा करूँ तेरा बेद पुराना, जिन है सकल जगत भरमाना ॥२॥
कहा करूँ तेरी अनुभ बानी, जिन तें मेरो बुद्धि भुतानी ॥३॥
कहा करूँ ये मान बड़ाई, राम बिना सबही दुखदाई ॥४॥
कहा करू तेरा सांख और जोग, राम बिना सब बंधन रोग ॥५॥
कहा करूँ इन्द्रिन का सुखव, राम बिना देवा सब दुखव ॥६॥
दरिया कहै राम गुरमुखिया, हरि बिन दुखी राम सँग सुखिया ।७॥
॥ राग पंचम ॥
पतिव्रता पति मिली है लाग,
जहँ गगन मँडल में परम भाग ॥ टेक ॥
जहँ जल बिन कँवला बहु अनंत ।
जहँ बपु३ बिन भौंरा गोह४ करंत ॥ १ ॥
अनहद बानी अगम खेल ।
जहँ दीपक जरै बिन बाती तेल ॥ २ ॥
जहँ अनहद सब्द है करत घोर ।
बिन मुख बोलै चात्रिक मोर ॥ ३ ॥
(१) पाप रूपा पत्ते दूर करके । (२) बिनौले । (३) शरीर । (४) गुंजार ।