सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

बुल्ला साहिब का शब्दसार
[ जीवन-चरित्र सहित ]
—: ० :—
जिसमें उन महात्मा के चुने हुए शब्द
छपे हैं और गूढ़ शब्दों के
अर्थ फुट-नोट में
लिखे हैं।
—: * :—
[ All Rights Reserved ]
[ कोई साहिब बिना इजाज़त के इस पुस्तक को नहीं छाप सकते ]
प्रकाशक
बेलवीडियर प्रिंटिंग वर्क्स,
इलाहाबाद
[ पांचवीं बार ] अगस्त, १६७६ [ मूल्य २)
Printed at The Belvedere Printing Works, Allahabad, By Sheel Mohan.

जीवन-चरित्र
—* : ० : *—
बुल्ला साहिब यारी साहिब के गुरुमुख चेले और जगजीवन साहिब व गुलाल
साहिब के गुरु थे। यह जाति के कुनबी थे और असल नाम इनका बुलाकीराम था।
इन्होंने भुरकुड़ा गाँव जिला गाजीपुर में अपना सतसंग कायम किया जहाँ इनके बाद
गुलाल साहिब और भीखा साहिब भी सतसंग कराते रहे और अब तक वहाँ तीनों
की समाधें मौजूद हैं। इनके जीवन का समय विक्रमी सम्बत् १७५० और १८२५ के
बीच जान पड़ता है।
जैसा कि गुलाल साहिब के जीवन-चरित्र में लिखा गया है बुल्ला साहिब पहले
गुलाल साहिब के नौकर थे और हल चलाने के काम पर तैनात थे। बुल्ला साहिब जब
किसी काम को जाते तो भजन ध्यान में लग जाने से अक्सर देर कर देते थे। इनकी
सुस्ती की शिकायत लोगों ने गुलाल साहिब से की और गुलाल साहिब कई बार इन
पर खफा हुए। एक दिन का जिक्र है कि बुल्ला साहिब हल चलाने को गये थे और वहाँ
भगवंत के ध्यान और मानसी साध सेवा म लग गये। उसी समय गुलाल साहिब मौके
पर पहुँच गये और बैलों को हल के साथ फिरते और बुल्ला साहिब को खेत की मेड़ पर
आँख बंद किये हुए बैठा देखकर समझे कि वह औंध रहे हैं और क्रोध में भरकर एक
लात मारी। बुल्ला साहिब एकबारगी चौंक उठे और उनके हाथ से दही छलक पड़ा।
यह कौतुक देखकर गुलाल साहिब हक्के-बक्के हो गये क्योंकि पहले उन्होंने बुल्ला साहिब
के हाय में दही नहीं देखा था। पर बुल्ला साहिब बड़ी आधीनता से गुलाल साहिब से
बोले कि मेरा अपराध छमा करो मैं साधुओं की सेवा में लग गया था और भोजन
परोस चुका था केवल दही बाकी था उसे परोस ही रहा था जो आपके हिला देने से
हाथ से गिर गया। यह गति अपने नौकर की देख कर गुलाल साहिब चरणों पर गिरे
और उनको अपना गुरु धारन किया।
बुल्ला साहिब सुरत शब्द अभ्यासी थे जिनकी ऊँची गति और भारी महिमा उनकी
बानी से प्रगट होती है।
नीचे दी हुई वंशावली से उनके गुरु घराने का हाल जान पड़ता है।
बावरी साहिब (दिल्ली)
।
बीरू साहिब
।
यारी साहिब
।
बुल्ला साहिब (भुरकुड़ा, जिला गाजीपुर)
।
गुलाल साहिब
।
भीखा साहिब

बुल्ला साहिब का शब्दसार
गुरु और नाम महिमा
॥ शब्द १ ॥
धन्न धन्न गुरुदेव जो यह गति लाइया ।
परम जोति निरंकार ताहि गुन गाइया ॥ १ ॥
मिलि जुरि सखी सहेलरि चउक पुराइया ।
अर्ध उर्ध अरु मद्द तो कलस धराइया ॥ २ ॥
तिरगुन गुन करि तेल काया तन जारिया ।
अष्ट जाम बरै जोति कबहुँ न बुझाइया ॥ ३ ॥
ऐसो अद्भुत रंग साध जन रंगिया ।
बुल्ला सोभा धाम ताहि अंग अंगिया१ ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
सुखमनि सुरति डोरि बनाव ।
मेटि है सब कर्म जिय के, बहुरि इतहिं न आव ॥ १ ॥
पैठि अंदर देखु कंदर२, जहाँ जिय को बास ।
उलटि प्रान अपान मेटो, सेत सब्द निवास ॥ २ ॥
गंग जमुना मिलि सरस्वति, उमँगि सिखर बहाव ।
लवकंति३ बिजुली दामिनी, अनहद गरज सुनाव ॥ ३ ॥
जोति आया आपहीं, गुरु यारि सब्द सुनाव ।
तब दास बुल्ला भक्ति ठानो, सदा रामहिं गाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
सांई के नाम की बलि जावँ ।
सुमिरत नाम बहुत सुख पायो, अंत कतहूँ नहिं ठावँ ॥ १ ॥
नाम बिना मन स्वान मंजारी४, घर घर चित लै जावँ ॥ २ ॥
(१) पहिना । (२) गुफा । (३) चमकता है । (४) कुत्ता बिल्ली ।

४ बुल्ला साहिब का शब्दसार
बिन दरसन परसन मन कैसो, ज्यों लूले को गाँव१ ॥ ३ ॥
पवन मथानी हिरदै ढूँढ़ो, तब पावै मन ठावँ ॥ ४ ॥
जन बुल्ला बोलहि कर जोरै, सतगुरु चरन समावँ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
प्रभु निराधार अधार उज्ज्वल, बिन्दु सकल बिराजई ।
अनन्त रूप सरूप तेरो, मो पै बरनि न जावई ॥ १ ॥
बाँधि पवनहिं साधि गगनहिं, गरजि गरजि सुनावई ।
तहँ हंस मुनि जन चूगते मनि, रस परसि परसि अघावई ॥ २ ॥
बिना कर मुख बेनु२ बाजै, बीन स्रवनन गुंजई ।
बिना नैनन दरस देखो, अगति गतिहिं जनावई ॥ ३ ॥
वा के जाति पाँति न नेम धर्मा, भर्म सकल गँवावई ।
आपु आपु बिचारि देखो, ऐसो है वह रवई३ ॥ ४ ॥
जीति पाँच पचीस तीनों, चौथे जा ठहरावई ।
तब दास बुल्ला लियो गढ़, जब गुरु दीन्ह लखावई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५ ॥
निसु दिन गगन निरेखो जाय ।
छोड़ि दे बहु बात बिषया, मगन है गुन गाय ॥ १ ॥
तिरकुटी जहँ बसत संगम, गंग जमुन बहाय ।
बरत झिलमिलि होत जगमग, तहाँ रहु अरुझाय ॥ २ ॥
सुन्न के मनि भवन में, तहँ ध्यान रहु ठहराय ।
खोजि ले निज बस्तु अपनी, सकल घट रहि छाय ॥ ३ ॥
तीन लोक में गम्म४ जा के, द्वार सेवा लाय ।
जन बुल्ला कहि अगम मेला, बिरल जन कोइ पाय ॥ ४ ॥
(१) जिस तरह लूला अपने पैरों से चल कर गाँव (मुकाम) को नहीं पहुँच सकता
इसी तरह बिना नाम के दरस परस के मन की हालत है यानी अंतर में चाल नहीं चलती ।
(२) एक लम्बा बाजा जो मुँह से बजाया जाता है । (३) राजा । (४) गति ।

गुरु और नाम महिमा ५
॥ शब्द ६ ॥
समुझ मन मानि ले, जोगिया कहल सँदेस ।
रैनि दिवस रबि ससि वहँ नाहीं, तहवाँ कर उपदेस ॥ १ ॥
जटा भभूत बैराग जोग तप, यह तौ जोगिया न भाय ।
सुन्न निरंतर जोगी बोलै, आपा उलटि समाय ॥ २ ॥
आपै जोगी आपै भोगी, आपै सर्ब समान ।
वा जोगिया के दरस परस पर, किया सीस कुरबान ॥ ३ ॥
गगन मँडल अनहद धुनि बाजै, तहँ जोगिया कै फेर ।
कह जन बुल्ला वा जोगी बर, सत्त सब्द कै चेर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मन तुम सतगुरु चरन समाजी । अविगति गति ब्रह्म बिराजी ॥टेक॥
अचरज दियना बरो अधर में, प्रेम जोति छबि छाजी ॥ १ ॥
धरनि अकास तहाँ नहिं दीखत, अगम पुरुष इक गाजी ॥ २ ॥
आवै न जाइ मरै नहिं जीवै, अनहद धुनि तहँ बाजी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला जानो वहि बीरा१, (जो) उलटि पवन घर साजी॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
मन बैरागी हो, प्रभु गति लखहिं न कोई ॥ टेक ॥
ले कुंभक पूरक घर रखना, रेचक संजम देई ।
त्राटक२ ताड़ी लगलि केवारी, राम नाम जपि लेई ॥ १ ॥
आगे सुन्न अगम गति लीला, निरखि ध्यान धरि देख ।
जगमग जगमग जोति जगमगै, आपुहिं अलख अलेख ॥ २ ॥
आदि ब्रह्म सदा अबिनासी, बासी अगम अपार ।
आवै न जाय मरै नहिं जीवै, सदा रहै इक तार ॥ ३ ॥
अद्भुत बुंद समूह पुरुष से, तहाँ रह्यो मन छाई ।
जन बुल्ला बलि बलि सतगुरु की, जिन यह पंथ लखाई ॥ ४ ॥
(१) बहादुर । (२) तीन गुन जो अटकाने वाले हैं ।

६ बुल्ला साहिब का शब्दसार
॥ शब्द ६ ॥
मातल मनुवाँ घटहिं समैबों हो ॥ टेक ॥
जौने गैलै संतै गैलें¹, तौने जइबों हो ।
सहज सरूपै लिहले, हरि गुन गइबों हो ॥ १ ॥
तीरथ तिरबेनी नहइबों, गगन में जइबों हो ।
अनहद धुनि सुनि, दीपक बरइबों हो ॥ २ ॥
बारि दीया देखो हीया, सुन² उँजियारो हो ।
यारी सतगुरु पूरो, निज भेदहिं सारो हो ॥ ३ ॥
देखि दरस मन तनहिं, छाड़ि दीया हो ।
जन बुल्ला बानी बोलै, मरि फिरि जीया हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
अनहद ताल दग थेइ थेइ बाजै, सकल भुवन जा की जोति बिराजै॥१॥
ब्रह्मा बिस्नु खड़े सिव द्वारे, परम जोति सो करहिं जुहारे ॥२॥
गगन मँडल महँ निर्तन होय, सतगुरु मिलै तो देखै सोय ॥३॥
आठ पहर जन बुल्ला गाजै, भक्ति भाव माथे पर छाजै ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
जियरा तू जीवन जनम सुधारो, तातें भवसागर से तारो ॥टेक॥
परखि परखि तिरबेनी संगम, झिलमिलि जोति सितारो⁴ ॥१॥
उनमुनि लागो बंद सहज धुनि, जगमग जोति पसारो ॥२॥
जन बुल्ला सदा हुसियारो, सतगुरु सब्द बिचारो ॥३॥
निर्गुन नाम निरंतर पेखो, जीतो मन भय मारो ॥४॥
॥ शब्द १२ ॥
गुरु नाम मिलो सच पाया है ।
बिसरी देह गेह सुख संपति, जोतिहिं जोति समाया है ॥ १ ॥
जोतो नगर नवो दर मूँदो, ब्रह्म अगिन तन लाया है ।
दसवें द्वार कै ताला खोलो, गगन मँडल मठ छाया है ॥ २ ॥
(१) जिस मार्ग से संत गये । (२) सुन्न । (३) बंदगी । (४) तारा ।

चेतावनी ७
जहँ नहिं अवन गवन कै चिंता, अनँद भयो घर आया है ।
संत साध मिलि खेलन लागे, दरसन को फल पाया है ॥ ३ ॥
सतगुरु मो को अलख लखाया, आदि अंत इक साया१ है ।
जन बुल्ला याही बिधि खेलो, तब अवधूत कहाया है ॥ ४ ॥
चेतावनी
।। शब्द १ ।।
बटोही खोजहु क्यों नहिं आप । सुमिरहु अजपा जाप ॥टेक॥
बिन खोजे कहुँ रह न पैहौ, कोटिन करहु बिलाप ॥ १ ॥
निकटहिं राम नाम अभि अंतर, जानहिं जाहि मिलाप ॥ २ ॥
हाजिर हजूर त्रिबेनी संगम, झिलिमिलि नूर जो जाप ॥ ३ ॥
जन बुल्ला महबूब नूर में, यारी पीर२ प्रताप ॥ ४ ॥
।। शब्द २ ।।
धन कुलवंती जिन जानल अपना नाह३ ॥टेक॥
जेकरे हेतू४ ये जग छोड़्यो, सो दहुँ कैसन बाट५ ।
रैन दिवस लव लाइ रहो है, हृदय निहारत बाट ॥ १ ॥
साध संगति मिलि बेड़ा बाँधल, भवजल उतरब पार ।
अबकी गवने बहुरि नहिं अवने, परखि परखि टकसार ॥ २ ॥
यारीदास परम गुरु मेरे, बेड़ा दिहल लखाय ।
जन बुल्ला चरनन बलिहारी, आनँद मंगल गाय ॥ ३ ॥
।। शब्द ३ ।।
उतहीं रहौ इतै जनि आव । निरगुन स्वामी से मन लाव ॥१॥
जनम मरन कै संस मिटाव । इत उत मन कहुँ नाहिं चलाव ॥२॥
जो जन गगन मँडल घर छाव । ता का आवागवन नसाव ॥३॥
यारी सतगुरु दिया लखाव । बुल्ला निरखि परम पद पाव ॥४॥
।। शब्द ४ ।।
हो नर हरिहिं हिये नहिं जाना । तौ का समुझि परै ब्रह्मज्ञाना ॥टेक॥
(१) एक सा । (२) गुरु । (३) पति । (४) जिसके वास्ते । (५) वह न जानें कैसा है ।

८ बुल्ला साहिब का शब्दसार
करहि सिद्धि आसा गँठियाये, ता पर करत गुमाना ॥ १ ॥
आतम राम न नीके जानै, चौरासी लपटाना ॥ २ ॥
दूध पियाय रिझाय राखि मन, भाखहि बेद पुराना ॥ ३ ॥
कहत फिरै हम सब से ऊपर, भूलो फिरत दिवाना ॥ ४ ॥
बीज एक अंकुर है एकै, फल फुल रहत समाना ॥ ५ ॥
उपजत बिनसत होत हैं केते, अंत केहू नहिं आना ॥ ६ ॥
नाम प्रताप की महिमा सुनिये, तीन लोक धरि ध्याना ॥ ७ ॥
जन बुल्ला रामहिं को सेवक, बोलहिं सब्द निधाना ॥ ८ ॥
॥ शब्द ५ ॥
दया बिनु छार सकल माया, कबहौं राम नाम नहिं आया ॥टेक॥
पोखरा खनावहिं¹ बाग लगावहिं, पावहिं मन माया ॥ १ ॥
आतम राम न नीके जानहिं, ज्यों आया त्यों जाया² ॥ २ ॥
समुझि न परहि साध को मारग, जिन हरि नामहिं गाया ॥ ३ ॥
जन बुल्ला रामहिं को सेवक, मिथ्या जानहि माया ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
जीवन जनम सुधारन देह ।
देह छोड़ि बिदेह होना, अचल पद यहि लेह ॥ १ ॥
काको माता पिता काको, काको सुत बित देह ।
जीवतही का नात इनका, मुए काको केह ॥ २ ॥
देह धरि के राम कृस्नहुँ, जगत आनि बड़ेह ।
पारब्रह्म को सुमिरन करिकै, जोतिहिं जोति मिलेह ॥ ३ ॥
जानि कै अनजान होइये, पूजिये ब्रह्म नेह ।
दास बुल्ला बानि बोले, काल के मुख खेह³ ॥ ४ ॥
प्रेम
॥ शब्द १ ॥
साची भक्ति गुपाल की, मेरो मन माना ।
मनसा बाचा कर्मना, सुनु संत सुजाना ॥ १ ॥
(१) तालाब खोदाते हैं । (२) चला गया । (३) धूल ।

प्रथम भाग: शब्द संग्रह (गुरु, नाम व विरह अंग)

प्रेम ६
लँगरा लुंजा ह्वै रहो, बहिरा अरु काना १।
राम नाम से खेल है, दीजै तन दाना ॥ २ ॥
भक्ति हेतु गृह छोड़िये, तजि गर्ब गुमाना ।
जन बुल्ला पायो बाक २ है, सुमिरो भगवाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द २ ॥
लगन चकोर मानो चंद !
निरखि दहूँ दिसि हेरि आनो, होत जीव अनंद ॥ १ ॥
जस उदित उज्ज्वल सीप बरसें, नैन हूँ भरि लाय ।
होत अगम अगाध सोभा, मो पै बरनि न जाय ॥ २ ॥
जग आस बास निरास कीन्ही, लीन्ही प्रेम निचोय ।
पियत रुचि रुचि दास बुल्ला, नाम निर्मल जोय ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३ ॥
या बिधि करहु आपुहिं पार ।
जस मीन जल की प्रीत जानै, देखु आपु बिचार ॥ १ ॥
जस सीप रहत समुद्र माहीं, गहत नाहिन बार ३।
वा की सुरत आकास लागी, स्वाँति बूंद अधार ॥ २ ॥
(जस) चकोर चन्द से दृष्टि लावै, अहार करत अँगार ।
दहत नाहिन पान कीन्हे, अधिक होत उजार ४ ॥ ३ ॥
कीट भृङ्ग की रहनि जानो, जाति पाँति गँवाय ।
बरन अबरन एक मिलि भे, निरंकार समाय ॥ ४ ॥
(अस) दास बुल्ला आस निरखहि, राम चरन अपार ।
देहु दरसन मुक्ति परसन, आवा गवन निवार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
जोग की गति सुनत हिये में, गगन धाम गई ॥ १ ॥
पुलकि पुलकि हम लियो पतिबार ५, सत्त सब्द मई ॥ २ ॥
(१) मन की बहिर्मुख धावना बन्द करो तब मालिक की ओर अंतर में चाल चलेगा ।
(२) बचत । (३) पानी । (४) चकोर आग खाने से नहीं जलता बल्कि उसकी चेतन्यता
बढ़ती है । (५) श्रेष्ठ पति ।
२

१० बुल्ला साहिब का शब्दसार
जोग करि तुम भोग रस तजि, गंग जमुन थई१ ॥ ३ ॥
होत अनहद बानि त्रिकुटी, दरस आपु दई ॥ ४ ॥
प्रेम करु तुम नेम हिय में, सुरत डोरि धुनी ॥ ५ ॥
दास बुल्ला बानि बोलहि, आनि तिरबेनी२ ॥ ६ ॥
॥ शब्द ५ ॥
हौं अबला बनि आई, देहु दरस गति पाई ॥ टेक ॥
सुभ घरी सुभ दिन सुभ पल छिन, जब तुम्हीं लौ लाई ॥१॥
मनसा बाचा कर्मना, मेरे धन राम गुसाई ॥२॥
केतिक जन्म चूक प्रभु मेरो, कहँ लग बिनय सुनाई ॥३॥
जन बुल्ला सरनागति आयो, सुमिरि सुमिरि गुन गाई ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
संतो जोग जानै तौन।
आपु आपु बिचारि लेवै, रहै घट में मौन ॥ १ ॥
चाँद सूर एकत्र करिके, सुखमना धरि पौन।
तहँ होत है अनहद गहागह, मिटो मन को धौन३ ॥२॥
लाल पहिरि सपेद पहिरै, जरद हरिया४ जौन।
स्याम पहिरि के बनो दूलह, मिट्यो आवागौन ॥ ३ ॥
पहिरि के जब उलटि चलि भा, भयो घर में चैन।
तब दास बुल्ला बानि बोलै, निर्त ताथेइ औन ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
अब कि बार मो पै होहु दयाल। रोम रोम जन होइ निहाल ॥१॥
जन बिनवै आठौ पहवार५। तुम्हरे चरन पर आपा वार ॥२॥
तुम तौ राम हहु निर्गुन सार। मोरे हिय महँ तुम आधार ॥३॥
तुम बिन जीवन कौने काज। बार बार मो को आवै लाज ॥४॥
सतगुरु चरनन साज समाज। बुल्ला माँगै भक्ती राज ॥५॥
(१) दहिनी और बाईं स्वासा को ठहराओ। (२) सुन्न। (३) धावना, चंचलता।
(४) हरा। (५) पहर।

प्रेम ११
॥ शब्द ८ ॥
लगन धुनि लागी सो पागी, परम गति जागी । १ ॥
अस लागी जस चन्द्र चकोरहिं, चुगत निगुन¹ गति आगि ॥ २ ॥
जन बुल्ला जेहिं सहजहिं लागी, सो गुरु सब्द अनुरागी ॥३॥
॥ शब्द ९ ॥
मोर मनुवाँ मनावै धावै पिया नहिं आवै हो ॥ टेक ॥
सासु मोरी दारुनी² ससुर मोर भोला हो ॥ १ ॥
ननद बैरिन भैली काढ़ि दइ डोला हो ॥ २ ॥
सेंदुरा बाँधल पिय हिय की पाटे³ हो ॥ ३ ॥
बुल्ला डर मानै पिया की झपाटे⁴ हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
देखो पिया काली घटा मो पै भारी ॥ १ ॥
सूनी सेज भयावन लागी, मरों बिरह की जारी ॥ २ ॥
प्रेम प्रीति यहि रीति चरन लघु, पल छिन नाहिं बिसारी ॥ ३ ॥
चितवत पंथ अंत नहिं पायो, जन बुल्ला बलिहारी ॥ ४ ॥
॥ शब्द ११ ॥
अस धुनि में रहु मेरे मनुवाँ ॥ टेक ॥
निरखि त्रिबेनी छोड़ि दे तनुवाँ । अष्ट कँवल दल उलटि फुलनुवाँ ॥ १ ॥
गगन गुफा हँस कियो है पयनुवाँ५ । अनहद बाजा बाज बजनुवाँ ॥२॥
थकित भयो सुनि आयो गवनुवाँ । बैठि सभा साधु संत जननुवाँ ॥३।
अविगत लीला अलख लखनुवाँ । बुल्ला बलिहारी सतगुरु की,
जिन अस नाच नचनुवाँ ॥४॥
॥ शब्द १२ ॥
रँग लागो गोरिया आजु रँग लागो, आपा सोधि भ्रम भागो ॥टेक॥
तिरगुन गुन गुनहीं पर जोरा, निर्गुन नाम हिये पागो ॥१॥
झिलमिलि झिलमिलि तिर्बेनी संगम, अविगत गति ब्रह्म जागो। २।
(१) निर्गुन । (२) कट्टर । (३) पाटी, माँग । (४) जल्दी । (५) चलना ।

१२ बुल्ला साहिब का शब्दसार
सुर नर मुनि जाको अंत न पावहिं, सो मोरे नैनन आगो ॥३॥
हरि रँग जुगन जुगन उँजियारो, जन बुल्ला साधुन साँगों१ ॥४॥
॥ शब्द १३ ॥
भासत२ काहे न जोगिया, यह मरै बिरह दुख रोगिया ॥ १ ॥
बिनु जोगी समुझे कल न परतु है, क्यों जीबै जन रोगिया ।
घोर घनेरी सूल उठत है, यह दुख जानै रोगिया ॥ २ ॥
आवै जोगी करै तबीबी३, तब सुख पावै रोगिया ।
मथि मन पवन जे दारू४ लगाई, जन बुल्ला दुख भगिया ॥ ३ ॥
॥ शब्द १४ ॥
न्हान को गंग जमून तट जैबों ।
तन मन धन न्यौछावर वारों, जगमग जोति जगैबों ॥ १ ॥
पवना उलटि भजन नित करिबों, सुखमन सेज बिछैबों ।
प्रेम बिलास आस साधुन में, निर्गुन रूप कहैबों ॥ २ ॥
पाप पुन्न दुख सुखहिं बहैबों, अमृत नाम पियैबों ।
होत अनन्द बिनोद ब्रह्म को, बहुरि न या कलि ऐबों ॥ ३ ॥
दया धरम मेरे नाम खजाना, ज्ञान रतन भरि लैबों ।
अद्भुत रूप कहाँ लग बरनों, अनहद में हद कैबों ॥ ४ ॥
सुरति सुहागिन चरन मनावहि, खसम आपनो पैबों ।
जन बुल्ला है प्यारी खसम की, रहसि रहसि गुन गैबों ॥ ५ ॥
॥ शब्द १५ ॥
हे मन करु गोबिंद से प्रीत ।
बीच मैदान में देइयो, चौहट नगारा जीत ॥टेक ॥
स्त्रवन सुनि ले नाद प्रभु की, नैन दरसन पेख ।
अचल अमर अलेख प्रभुजी, देखही कोउ भेष ॥ १ ॥
भाव सँग तू भक्ति करि ले, प्रेम से लवलीन ।
सुरति से तू बेर५ बाँधो, मुलुक तीनो छीन ॥ २ ॥
(१) संग । (२) दरसना । (३) इलाज । (४) दवा । (५) बेड़ा ।

ब्रह्मज्ञान १३
अधम अधीन अजाति बुल्ला, नाम से लवलीन ।
अर्थ धर्म अरु काम मोछहिं, आपने पद दीन ॥ ३ ॥
ब्रह्मज्ञान
॥ शब्द १ ॥
जिन जिन जन्म लखो१, तिन को दरस भयो ।
आनंद मगन रहत निस बासर, दुबिधा धोख जँजाल गयो ॥ १ ॥
जन्म पदारथ यहि जो स्वारथ, पाँच तत्त गुन तीनी ।
उलटि निरंतर निरखि बिचारो, परम तत्त निज चीन्ही ॥ २ ॥
बार बार के अवन गवन में, कर्म भर्म की धार ।
खोजत खोजत सतगुरु पाये, उतरि परो भवपार ॥ ३ ॥
बैठो जाइ के संत सभा में, जहाँ अमरपुर लोग ।
आवागवन कबहिं नहिं होई, इहै हमारो जोग ॥ ४ ॥
जन बुल्ला ब्रह्मज्ञान बोलतु है, सकल बेद को मूल ।
बूझन वाले बूझि लहिंगे, जिन्ह देखी सब खूल२ ॥ ५ ॥
॥ शब्द २ ॥
हौं बौरहा दिवाना तातें बोलत हौं ब्रह्मज्ञाना ॥ टेक ॥
संतन जहाँ जहाँ मन माना, दूजा दूरि लुटाना ॥ १ ॥
परम जोति से ध्यान लगो है, आवा गवन नसाना ॥ २ ॥
उलटि सर्प जब माँद३ समाना, बिधि परपंच मिटाना ॥ ३ ॥
जन बुल्ला दाया सतगुरु की, ऐसा अमल कमाना ॥ ४ ॥
॥ शब्द ३ ॥
संतो अमल हमारे नाम की ॥ १ ॥
आठ पहर मन छकै रहतु है, परम तत्त निरकार४ की ॥२॥
रहत अधार सत्त सुकिरति कै, मेटे भरम बिकार की ॥३॥
(१) जिस जिस ने जन्म लखा यानी बारम्बार जनम मरन की पीड़ा को बिचारा ।
(२) जानकार (अभ्यासी) कि जिन्होंने अभ्यास की आँखों से सब भेद खुला देखा है वही
जान लेंगे । (३) बाँबी । (४) निरंकार ।

१४ बुल्ला साहिब का शब्दसार
सहजहिं चढ़ो अकास आस लै, लहरि उठत ब्रह्मज्ञान की ॥४॥
सुमिरत चरन कमल धरनी धर, उज्ज्वल बिमल बिकार की ॥५॥
जन बुल्ला यहि पदहिं समाने, फिरी दुहाई नाम की ॥६॥
॥ शब्द ४ ॥
उलटै पवन मवन१ ह्वै रहई । धरै ध्यान निर्गुन तत गहई ॥१॥
झलक झलक निर्गुन कै जोती । कोटिक भानु उदै छबि होती॥२॥
बाजत अनहद गगन अघोश । मगन भयो तहवाँ मन मोरा ॥३॥
जन बुल्ला कहैं इहै अधारा । राम राम कहि करहि पुकारा ॥४॥
॥ शब्द ५ ॥
ऐसी बिनय सुनहु अबिनासी । अब कि बार काटहु जम फाँसी॥१॥
भया प्रकास मिटा अँधियारा । आदि अंत मध भो उँजियारा ॥२॥
रूप रेख तहँ बरनि न जासी । निरंकार आपुहिं अबिनासी ॥३॥
जन बुल्ला तहँ रहै हजूरा । पूरन ब्रह्म देखा जहँ

भेद १५
तीनिउ जना त्रिबेनी आना, गंग जमुन कीन्हो अस्नाना ॥३॥
परम तत्त पर लागो ध्याना, जन बुल्ला बोलहि ब्रह्मज्ञाना ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
अहो मन ज्ञानी, तूँ तौ परम प्रीति पहिचानी ॥ टेक ॥
उदय अस्त जा कि महिमा बोलै, सब घट अमृत बानी ॥१॥
सुरति डोरि लव लागि रहानी, राम नाम निजु जानी ॥२॥
रबि ससि पवन बिलोकै मनुवाँ, गगन मगन मन मानी ॥३॥
अगम अपार सिंधु सागर प्रभु, कह बुल्ला जिन जानी ॥४॥
॥ शब्द १० ॥
महबूब दिवाना पियत पियाला, निर्गुन खाना ॥ १ ॥
निर्गुन खाना त्रिकुटी जाना, साध संगति पहिचाना ॥ २ ॥
निरगुन खाना हरदम जाना, अष्ट जाम मस्ताना ॥ ३ ॥
निरगुन रूप बोलहि जन बुल्ला, पाया गगन रकाना¹ ॥ ४ ॥
॥ भेद ॥
॥ शब्द १ ॥
सतगुरु मुक्ति बतावल, पावल जिव कर मूल ।
सुमिरि सुमिरि सुख बिलसहि², सूच्छम गुन अस्थूल ॥ १ ॥
ऐसन अद्भुत है सो, जुग जुग अचल अपार ।
आवै जाय न उपजै बिनसै, सदा रहै इकतार ॥ २ ॥
मन माने की कहिये, तौ लहिये औतार ।
अपने अपने रंग में, रँगा सकल संसार ॥ ३ ॥
मनसा बाचा कर्मना, दूजा नहिं भाव ।
जन बुल्ला गुन गावही, आनँद मँगल बधाव ॥ ४ ॥
॥ शब्द २ ॥
बूझहु पंडित अचरज एक । सेत बरन तहँ सदा अलेख ॥१॥
साधि पवन षट चक्र छुड़ावो । तिरबेनी के घाटै आवो ॥२॥
(१) तोशा, सामान । (२) बिलास करता है ।

१६ बुल्ला साहिब का शब्दसार
उनमुनि मुद्रा लगी समाधी । रबि ससि पवनहिं राखो बाँधी ॥३॥
चाचरि मुद्रा से प्रीति लगावो । भूचरि मुद्रा से प्रेम बढ़ावो ॥४॥
अगोचरि मुद्रा से आन भुगावो । खेचरि मुद्रा से दरस दिखावो॥५॥
जो पंडित तैं करु पंडिताई । चरन रेनु हिरदे लै लाई ॥६॥
चरन रेनु का करहु जनेवा । तौ तू पंडित पावहु भेवा ॥७॥
जो यह अचरज देइ बुझाई । सोई सतगुरु अगम कहाई ॥८॥
अगम जोति का धारै ध्यान । बुल्ला बोलहि सब्द निदान ॥६॥
॥ शब्द ३ ॥
राम राय लावल फुलवारी ॥ टेक ॥
मूल सींचि के बाग लगाया । कलियाँ भई तबहिं चुनवाया ॥१॥
एक फूल ते अनेक कहाय । फूल भरी भरि रहि कुम्हिलाय ॥२॥
काहू फूल क मरम न पाया । सरगुन मद्धे रहल समाया ॥३॥
जन बुल्ला सतगुरु बलिहारी । सेत फूल जिन लिहल बिचारी॥४॥
॥ शब्द ४ ॥
मोर सुमति भइल, मन जतन बिसारी रे ॥ टेक ॥
मूरहिं बाँधी सूरहिं१ साधी, पच्छिम बिचारी रे ॥ १ ॥
लोभ मोह अरु माया छाया, भरमन सब टारी रे ॥ २ ॥
छूटी माया तन पाया छाया, ब्रह्म की जोती रे ॥ ३ ॥
जन बुल्ला जोगी बोलहि, निझर भरै जहँ मोती रे ॥ ४ ॥
॥ शब्द ५ ॥
आनँद उदित अखंडित सोहं, मानो गगनद्वार गति जोहं ॥१॥
सिद्धी मूलि मूल मति पावन, जामन पवनहिं उलटि जमावन॥२॥
अर्ध उर्व के मद्ध निरंतर, जगमग जगमग जोति जगावन ॥३॥
देखि दिखावै कहावै अकेला, मेला अलख पुरुष सँग खेला ॥४॥
जन बुल्ला याही बिधि खेला, अनहद डंक निसंक को देला ॥५॥
(१) स्वर ।

भेद १७
॥ शब्द ६ ॥
आली आजु कि रैन प्रीति मन भावै ॥ १ ॥
गाय बजावत हँसत हँसावत, सब रस लेय मनावै ॥ २ ॥
जन बुल्ला हरि चरन मनावै, निरखि सुरति गति आपु में पावै ॥ ३ ॥
॥ शब्द ७ ॥
नैना मोरे निपट बिकट ठौर अटके ॥ १ ॥
सुख को साथ सबै कोइ चाहै, दुखहिं परे पर छटके ॥ २ ॥
भौंह कमान नैन दोउ गाँसी, जहाँ लगै तहँ लटके ॥ ३ ॥
जन बुल्ला दाया सतगुरु की, देखु सकल जग भटके ॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
पूरब देस कर आपुहिं बँभना, आपु भयल अबधूता ॥ टेक ॥
अपरम्पार पारब्रह्म बँभना, आयो हमरे घर अँगना ।
परम तत्त ले पूजि आपु हीं, सरल१ गावै अनहद ततना२ ॥ १ ॥
रजगुन तमगुन सतगुन सारल, हारल तन मन दोऊ ।
गगन मँडल में हरि रस चाखल, बूझै बिरला कोऊ ॥ २ ॥
ज्ञान कि तरकस सब्द तीर भरि, प्रेम धनुष धरि तानल ।
सुरति कै सीस निसाना मारल, भव का भंडा फोरल ॥ ३ ॥
निर्भय जन इक निर्गुन गावल, स्वासा सगुन भावल ।
जन बुल्ला बिन स्वासहि गावहि, सेत प्रकास समावल ॥ ४ ॥
॥ शब्द ६ ॥
चरन लागो इत तें हारो ॥ टेक ॥
ममता मान जान तन वारो । ब्रह्मा बिस्नु समाधी धारो ॥ १ ॥
तिरबेनी तिर घाट सँवारो । जगमग जगमग मनि उँजियारो ॥ २ ॥
भाग बड़ो जिन यह गति सारो । पवन पियाय नागिनी मारो ॥ ३ ॥
बिष उतरो तब भो उजियारो । बुल्ला रहै सदा हुसियारो ॥ ४ ॥
(१) साधारण ही । (२) तान ।
३

१८ बुल्ला साहिब का शब्दसार
॥ शब्द १० ॥
बुल्ला कवने द्वारा देखै आपु ॥टेक॥
कवने द्वारा आवै जाय । कवने द्वारा रहै समाय ॥ १ ॥
तिरबेनी द्वारे देखै आपु । सुखमन द्वारे सुमिरै जापु ॥ २ ॥
इँँगला पिंगला आवै जाय । दसव द्वारा रहै समाय ॥ ३ ॥
आरती
॥ शब्द १ ॥
ऐसी आरति मेरे मन भावै । रबि ससि पवन भवन मन लावै ॥१॥
ब्रह्मा बिसनु महेस लै आवै, एक मते ह्वै अरथ दिखावै ॥२॥
गंगा जमुना अरघ दिवावै, अस्तुति से जा प्रभुहिं मनावै ॥३॥
सुरति निरति लै घंट बजावै, जगमग जोति परम पद पावै ॥४॥
जन बुल्ला जो सरन बसि आवै, रंग महल बिच नाम जगावै ॥५॥
॥ शब्द २ ॥
पूजों निरकार बहु भाँती । जेकरे पुजत सितल१ मोरी छाती ॥१॥
जाके न चंद सूर दिन राती । नेम अरु धर्म न दीपक बाती ॥२॥
[

तहँ मिलै बिरही हंस जन कोउ, अगम दियो है लखाय ॥ ६ ॥
तहँ दास बुल्ला कियो संगति, रह्यो चरन समाय ॥ ७ ॥
( २ )
सतगुरु नावल अधर हिंडोलना ।
हम धन झुलब सुघर हिंडोलना ॥ १ ॥
झुलत झुलत गइलुँ गगनहिं तटना ।
तहवाँ साधन को अखरना१ ॥ २ ॥
सेत सुहावन जगमग देखलना ।
तहवाँ प्रान हमार समैलना२ ॥ ३ ॥
अब कि समैले फिर न अइबना३ ।
जन बुल्ला गावल निर्गुन हिंडोलना ॥ ४ ॥
बसंत और होली
( १ )
मन बसंत खेले अगम फाग, चरन कमल अनुराग जाग ॥१॥
खेले ब्रह्मा औ महादेव, खेले नारद औ जैदेव ॥२॥
खेले ध्रुव प्रहलाद जानि, खेले सुकदेव भक्ति मानि ॥३॥
हनुमत खेले सेवक होय, अरजुन खेले गति बिलोय४ ॥४॥
सहदेव खेले अगम गाय, परम जोति में रहे समाय ॥५॥
खेले नाभा औ कबीर, खेले नानक बड़े धीर ॥६॥
दसम द्वार पर दरस होय, जन बुल्ला देखे आपु सोय ॥७॥
( २ )
हरि हम देख्यो नैनन बीच, तहाँ बसंत धमारि कीच ॥१॥
आदि अंत मधि बन्यो बनाय, निरगुन सरगुन दोनों भाय५ ॥२॥
चीन्हेव तिन्हको लियो लगाय, अनबूझो रहि गो मुँह बाय ॥३॥
सुन्न भवन मन रह्यो समाय, तहँ ऊठत लहरि अनंत आय ॥४॥
जगमग जगमग है अँजोर, जन बुल्ला है सेवक तोर ॥५॥
(१) अखाड़ा । (२) समाया । (३) आना । (४) मथ कर । (५) भाव ।

२० बुल्ला साहिब का शब्दसार
( ३ )
होरी खेलो सतगुरु दयाल से ।
धन जोबन सपना करि जानो, मेलो जोति अपार से ॥१॥
होत अगाध अकास सब्द धुनि, सुनत रहो सुख चाह से ।
साहिब सुरति मुरति हिय लागी, केल करत हर हाल से ॥२॥
एक तान इक मान मनावै, एक ज्ञान इक ध्यान से ।
एक दसा इक भाव भक्ति लै, मिलो बुंद दरियाव से ॥३॥
अलख लखायो दरस दिखायो, खेलत फाग सुचाल से ।
जन बुल्ला ऐसी होरी खेले, उतरि गये भव जाल से ॥४॥
( ४ )
होरी खेलो रंग भरी, सब सखियन संग लगाई ॥ टेक ॥
फागुन आयो मास अनँद भो, खेलि लेहु नर नारी ॥ १ ॥
ऐसा समय बहुरि नहिं पैहो, जैहो जन्म जुवा हारी ॥ २ ॥
तीर त्रिबेनी होरी खेलो, अनहद डंक बजाई ॥ ३ ॥
ब्रह्मा बिस्नु महेस तिनों जन, रहे चरन लिपटाई ॥ ४ ॥
बनि बनि आवैं दरस दिखावें, अद्भुत कला बनाई ॥ ५ ॥
जन बुल्ला ऐसि होरी खेले, रहे नाम लौ लाई ॥ ६ ॥
( ५ )
निर्गुन बसंत को सुनहु भाव । दूजा अवरि न मोहिं चाव । १॥
हुलसी मनसा फलसी डाल । वा की साखा सर्ग पताल ॥२॥
बिना मूल अस्थूल आहि । वाकी पटतर लाउँ काहि१ ॥३॥
ज्ञान ध्यान बसि भयो मोर । तन से भागे सबहि चोर ॥४॥
दसौ दिसा में भयो सोर । बुल्ला सेवक प्रभू तोर ॥५॥
॥ शब्द ६ ॥
हौं खेलत फाग सुहावन, हरि आये मन भावन ॥१॥
जब तें कृपा कियो आ जन पर, मोच्छ मुक्ति फल पावन ॥२॥
(१) किस को ।