बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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॥ शब्द ६ ॥
मातल मनुवाँ घटहिं समैबों हो ॥ टेक ॥
जौने गैलै संतै गैलें¹, तौने जइबों हो ।
सहज सरूपै लिहले, हरि गुन गइबों हो ॥ १ ॥
तीरथ तिरबेनी नहइबों, गगन में जइबों हो ।
अनहद धुनि सुनि, दीपक बरइबों हो ॥ २ ॥
बारि दीया देखो हीया, सुन² उँजियारो हो ।
यारी सतगुरु पूरो, निज भेदहिं सारो हो ॥ ३ ॥
देखि दरस मन तनहिं, छाड़ि दीया हो ।
जन बुल्ला बानी बोलै, मरि फिरि जीया हो ॥ ४ ॥
॥ शब्द १० ॥
अनहद ताल दग थेइ थेइ बाजै, सकल भुवन जा की जोति बिराजै॥१॥
ब्रह्मा बिस्नु खड़े सिव द्वारे, परम जोति सो करहिं जुहारे ॥२॥
गगन मँडल महँ निर्तन होय, सतगुरु मिलै तो देखै सोय ॥३॥
आठ पहर जन बुल्ला गाजै, भक्ति भाव माथे पर छाजै ॥४॥
॥ शब्द ११ ॥
जियरा तू जीवन जनम सुधारो, तातें भवसागर से तारो ॥टेक॥
परखि परखि तिरबेनी संगम, झिलमिलि जोति सितारो⁴ ॥१॥
उनमुनि लागो बंद सहज धुनि, जगमग जोति पसारो ॥२॥
जन बुल्ला सदा हुसियारो, सतगुरु सब्द बिचारो ॥३॥
निर्गुन नाम निरंतर पेखो, जीतो मन भय मारो ॥४॥
॥ शब्द १२ ॥
गुरु नाम मिलो सच पाया है ।
बिसरी देह गेह सुख संपति, जोतिहिं जोति समाया है ॥ १ ॥
जोतो नगर नवो दर मूँदो, ब्रह्म अगिन तन लाया है ।
दसवें द्वार कै ताला खोलो, गगन मँडल मठ छाया है ॥ २ ॥
(१) जिस मार्ग से संत गये । (२) सुन्न । (३) बंदगी । (४) तारा ।