बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० बुल्ला साहिब का शब्दसार
जोग करि तुम भोग रस तजि, गंग जमुन थई१ ॥ ३ ॥
होत अनहद बानि त्रिकुटी, दरस आपु दई ॥ ४ ॥
प्रेम करु तुम नेम हिय में, सुरत डोरि धुनी ॥ ५ ॥
दास बुल्ला बानि बोलहि, आनि तिरबेनी२ ॥ ६ ॥
॥ शब्द ५ ॥
हौं अबला बनि आई, देहु दरस गति पाई ॥ टेक ॥
सुभ घरी सुभ दिन सुभ पल छिन, जब तुम्हीं लौ लाई ॥१॥
मनसा बाचा कर्मना, मेरे धन राम गुसाई ॥२॥
केतिक जन्म चूक प्रभु मेरो, कहँ लग बिनय सुनाई ॥३॥
जन बुल्ला सरनागति आयो, सुमिरि सुमिरि गुन गाई ॥४॥
॥ शब्द ६ ॥
संतो जोग जानै तौन।
आपु आपु बिचारि लेवै, रहै घट में मौन ॥ १ ॥
चाँद सूर एकत्र करिके, सुखमना धरि पौन।
तहँ होत है अनहद गहागह, मिटो मन को धौन३ ॥२॥
लाल पहिरि सपेद पहिरै, जरद हरिया४ जौन।
स्याम पहिरि के बनो दूलह, मिट्यो आवागौन ॥ ३ ॥
पहिरि के जब उलटि चलि भा, भयो घर में चैन।
तब दास बुल्ला बानि बोलै, निर्त ताथेइ औन ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
अब कि बार मो पै होहु दयाल। रोम रोम जन होइ निहाल ॥१॥
जन बिनवै आठौ पहवार५। तुम्हरे चरन पर आपा वार ॥२॥
तुम तौ राम हहु निर्गुन सार। मोरे हिय महँ तुम आधार ॥३॥
तुम बिन जीवन कौने काज। बार बार मो को आवै लाज ॥४॥
सतगुरु चरनन साज समाज। बुल्ला माँगै भक्ती राज ॥५॥
(१) दहिनी और बाईं स्वासा को ठहराओ। (२) सुन्न। (३) धावना, चंचलता।
(४) हरा। (५) पहर।