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बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

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४ बुल्ला साहिब का शब्दसार
बिन दरसन परसन मन कैसो, ज्यों लूले को गाँव१ ॥ ३ ॥
पवन मथानी हिरदै ढूँढ़ो, तब पावै मन ठावँ ॥ ४ ॥
जन बुल्ला बोलहि कर जोरै, सतगुरु चरन समावँ ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
प्रभु निराधार अधार उज्ज्वल, बिन्दु सकल बिराजई ।
अनन्त रूप सरूप तेरो, मो पै बरनि न जावई ॥ १ ॥
बाँधि पवनहिं साधि गगनहिं, गरजि गरजि सुनावई ।
तहँ हंस मुनि जन चूगते मनि, रस परसि परसि अघावई ॥ २ ॥
बिना कर मुख बेनु२ बाजै, बीन स्रवनन गुंजई ।
बिना नैनन दरस देखो, अगति गतिहिं जनावई ॥ ३ ॥
वा के जाति पाँति न नेम धर्मा, भर्म सकल गँवावई ।
आपु आपु बिचारि देखो, ऐसो है वह रवई३ ॥ ४ ॥
जीति पाँच पचीस तीनों, चौथे जा ठहरावई ।
तब दास बुल्ला लियो गढ़, जब गुरु दीन्ह लखावई ॥ ५ ॥
॥ शब्द ५ ॥
निसु दिन गगन निरेखो जाय ।
छोड़ि दे बहु बात बिषया, मगन है गुन गाय ॥ १ ॥
तिरकुटी जहँ बसत संगम, गंग जमुन बहाय ।
बरत झिलमिलि होत जगमग, तहाँ रहु अरुझाय ॥ २ ॥
सुन्न के मनि भवन में, तहँ ध्यान रहु ठहराय ।
खोजि ले निज बस्तु अपनी, सकल घट रहि छाय ॥ ३ ॥
तीन लोक में गम्म४ जा के, द्वार सेवा लाय ।
जन बुल्ला कहि अगम मेला, बिरल जन कोइ पाय ॥ ४ ॥
(१) जिस तरह लूला अपने पैरों से चल कर गाँव (मुकाम) को नहीं पहुँच सकता
इसी तरह बिना नाम के दरस परस के मन की हालत है यानी अंतर में चाल नहीं चलती ।
(२) एक लम्बा बाजा जो मुँह से बजाया जाता है । (३) राजा । (४) गति ।