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बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

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पृष्ठ 11

प्रेम ६
लँगरा लुंजा ह्वै रहो, बहिरा अरु काना १।
राम नाम से खेल है, दीजै तन दाना ॥ २ ॥
भक्ति हेतु गृह छोड़िये, तजि गर्ब गुमाना ।
जन बुल्ला पायो बाक २ है, सुमिरो भगवाना ॥ ३ ॥
॥ शब्द २ ॥
लगन चकोर मानो चंद !
निरखि दहूँ दिसि हेरि आनो, होत जीव अनंद ॥ १ ॥
जस उदित उज्ज्वल सीप बरसें, नैन हूँ भरि लाय ।
होत अगम अगाध सोभा, मो पै बरनि न जाय ॥ २ ॥
जग आस बास निरास कीन्ही, लीन्ही प्रेम निचोय ।
पियत रुचि रुचि दास बुल्ला, नाम निर्मल जोय ॥ ३ ॥
॥ शब्द ३ ॥
या बिधि करहु आपुहिं पार ।
जस मीन जल की प्रीत जानै, देखु आपु बिचार ॥ १ ॥
जस सीप रहत समुद्र माहीं, गहत नाहिन बार ३।
वा की सुरत आकास लागी, स्वाँति बूंद अधार ॥ २ ॥
(जस) चकोर चन्द से दृष्टि लावै, अहार करत अँगार ।
दहत नाहिन पान कीन्हे, अधिक होत उजार ४ ॥ ३ ॥
कीट भृङ्ग की रहनि जानो, जाति पाँति गँवाय ।
बरन अबरन एक मिलि भे, निरंकार समाय ॥ ४ ॥
(अस) दास बुल्ला आस निरखहि, राम चरन अपार ।
देहु दरसन मुक्ति परसन, आवा गवन निवार ॥ ५ ॥
॥ शब्द ४ ॥
जोग की गति सुनत हिये में, गगन धाम गई ॥ १ ॥
पुलकि पुलकि हम लियो पतिबार ५, सत्त सब्द मई ॥ २ ॥
(१) मन की बहिर्मुख धावना बन्द करो तब मालिक की ओर अंतर में चाल चलेगा ।
(२) बचत । (३) पानी । (४) चकोर आग खाने से नहीं जलता बल्कि उसकी चेतन्यता
बढ़ती है । (५) श्रेष्ठ पति ।
२