बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)
Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad
सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचेतावनी ७
जहँ नहिं अवन गवन कै चिंता, अनँद भयो घर आया है ।
संत साध मिलि खेलन लागे, दरसन को फल पाया है ॥ ३ ॥
सतगुरु मो को अलख लखाया, आदि अंत इक साया१ है ।
जन बुल्ला याही बिधि खेलो, तब अवधूत कहाया है ॥ ४ ॥
चेतावनी
।। शब्द १ ।।
बटोही खोजहु क्यों नहिं आप । सुमिरहु अजपा जाप ॥टेक॥
बिन खोजे कहुँ रह न पैहौ, कोटिन करहु बिलाप ॥ १ ॥
निकटहिं राम नाम अभि अंतर, जानहिं जाहि मिलाप ॥ २ ॥
हाजिर हजूर त्रिबेनी संगम, झिलिमिलि नूर जो जाप ॥ ३ ॥
जन बुल्ला महबूब नूर में, यारी पीर२ प्रताप ॥ ४ ॥
।। शब्द २ ।।
धन कुलवंती जिन जानल अपना नाह३ ॥टेक॥
जेकरे हेतू४ ये जग छोड़्यो, सो दहुँ कैसन बाट५ ।
रैन दिवस लव लाइ रहो है, हृदय निहारत बाट ॥ १ ॥
साध संगति मिलि बेड़ा बाँधल, भवजल उतरब पार ।
अबकी गवने बहुरि नहिं अवने, परखि परखि टकसार ॥ २ ॥
यारीदास परम गुरु मेरे, बेड़ा दिहल लखाय ।
जन बुल्ला चरनन बलिहारी, आनँद मंगल गाय ॥ ३ ॥
।। शब्द ३ ।।
उतहीं रहौ इतै जनि आव । निरगुन स्वामी से मन लाव ॥१॥
जनम मरन कै संस मिटाव । इत उत मन कहुँ नाहिं चलाव ॥२॥
जो जन गगन मँडल घर छाव । ता का आवागवन नसाव ॥३॥
यारी सतगुरु दिया लखाव । बुल्ला निरखि परम पद पाव ॥४॥
।। शब्द ४ ।।
हो नर हरिहिं हिये नहिं जाना । तौ का समुझि परै ब्रह्मज्ञाना ॥टेक॥
(१) एक सा । (२) गुरु । (३) पति । (४) जिसके वास्ते । (५) वह न जानें कैसा है ।