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बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

बुल्ला साहिब का शब्दसार (बेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद - जीवन-चरित्र एवं अमर पद)

Bulla Sahib Ka Shabdasara: Belvedere Press Allahabad

सन्त बुल्ला साहिब (सम्पादक: बेलवेडियर प्रेस) द्वारा

DevanagariHindipublished36 पृष्ठ

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पृष्ठ 7

गुरु और नाम महिमा ५
॥ शब्द ६ ॥
समुझ मन मानि ले, जोगिया कहल सँदेस ।
रैनि दिवस रबि ससि वहँ नाहीं, तहवाँ कर उपदेस ॥ १ ॥
जटा भभूत बैराग जोग तप, यह तौ जोगिया न भाय ।
सुन्न निरंतर जोगी बोलै, आपा उलटि समाय ॥ २ ॥
आपै जोगी आपै भोगी, आपै सर्ब समान ।
वा जोगिया के दरस परस पर, किया सीस कुरबान ॥ ३ ॥
गगन मँडल अनहद धुनि बाजै, तहँ जोगिया कै फेर ।
कह जन बुल्ला वा जोगी बर, सत्त सब्द कै चेर ॥ ४ ॥
॥ शब्द ७ ॥
मन तुम सतगुरु चरन समाजी । अविगति गति ब्रह्म बिराजी ॥टेक॥
अचरज दियना बरो अधर में, प्रेम जोति छबि छाजी ॥ १ ॥
धरनि अकास तहाँ नहिं दीखत, अगम पुरुष इक गाजी ॥ २ ॥
आवै न जाइ मरै नहिं जीवै, अनहद धुनि तहँ बाजी ॥ ३ ॥
जन बुल्ला जानो वहि बीरा१, (जो) उलटि पवन घर साजी॥ ४ ॥
॥ शब्द ८ ॥
मन बैरागी हो, प्रभु गति लखहिं न कोई ॥ टेक ॥
ले कुंभक पूरक घर रखना, रेचक संजम देई ।
त्राटक२ ताड़ी लगलि केवारी, राम नाम जपि लेई ॥ १ ॥
आगे सुन्न अगम गति लीला, निरखि ध्यान धरि देख ।
जगमग जगमग जोति जगमगै, आपुहिं अलख अलेख ॥ २ ॥
आदि ब्रह्म सदा अबिनासी, बासी अगम अपार ।
आवै न जाय मरै नहिं जीवै, सदा रहै इक तार ॥ ३ ॥
अद्भुत बुंद समूह पुरुष से, तहाँ रह्यो मन छाई ।
जन बुल्ला बलि बलि सतगुरु की, जिन यह पंथ लखाई ॥ ४ ॥
(१) बहादुर । (२) तीन गुन जो अटकाने वाले हैं ।