बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
द्वितीयशतक २. (४३)
कि, इसको महावरतक लगाना नहीं आता, पीछे उसे हँसता
देखकर जाना कि, यह प्रीतमने लगाया है, उसके हाथ
काँपनेसे यह फैल गया है। तृतीय विषमालंकार (इष्टसे अ-
निष्टमाना) ॥११५॥
छला परोसिनि हाथते, छलकर लियो पिछानि।
पियहिदिखायोलखिबिलखि,रिससूचकमुसकानि॥
प्यारेका छल्ला पहँचानकर पडोसनके हाथसे छलकरके
लेलिया बिलखकर प्रीतमको दिखाया और क्रोधसूचक मुस-
कानसे दुःखी हुई। पर्यायोक्ति अलंकार ॥११६॥
बिलखी लखै खरी खरी, भरी अनख वैराग।
मृगनैनी सैनन भजै, लखि वेणीके दाग॥११७॥
अनमनीहो खडी हुई बहुत क्रोध और उदासीसे देखने
लगी, मृगलोचनी प्यारी प्यारेकी सेजमें और स्त्रीकी चोटीका
चिह्न देखकर सेजपर जानेकी इच्छा नहीं करती। काव्य-
लिंग ॥११७॥
ढीठ परोसिन ईठ ह्वै, कहै जु गहै सयान ॥
सवै सँदेशै कहि कह्यो, मुसकाहटमें मान॥११८
ढीठ पडोसिनने चतुराई पकड़कर दृष्टतासे प्यारेके सब
संदेश कहकर कहा मुसकाहटमें मान न चाहिये, आशय यह
( ४४ ) सतसई-सटीक ।
कि, पडोसिनके संग कुछ प्यारेने मुसकान की सो प्यारीने देख
लिया, मानकर बैठी तब वही परोसिन प्यारेकी ओरसे सम-
झाने आई, यही उसकी दृढ ढिठाई है, और हितकारी बनकर
प्रीतमके निरपराध होनेके संदेश चतुराईसे सुनाकर कहा
मुस्कुराहटमें मान नहीं चाहिये यदि रतिका चिह्न हो तो
मान चाहिये [काकोक्ति] काव्यलिंग सूक्ष्मालंकार ॥११८॥
परकीया अन्यसंभोग दुःखिता ।
गह्यो अबोलो बोलप्यो, आपै पठै वसीठ ॥
दीठ चुराई दुहुँनकी, लखि सकुचोहीं दीठ ११९
सखीको प्यारेके बुलानेको भेजकर प्रिया आप मौन गहे
रही, उनकी दोनोंकी सकुचोहीं दृष्टि देखकर अपनी दृष्टि
चुराई । अन्यसंभोगदुःखिता प्रियाकी सखीका वचन सखीसे।
आभिता अलंकार ॥ ११९ ॥
हठंहितकरप्रीतमलियो, कियो जु सौति शृंगार ॥
अपनेकर मोतिन गह्यो, भयो हराहरहार॥१२०॥
हठ और प्रीतिकरके जो प्यारेने हार लिया उससे सौति-
नका शृंगार किया, अपने हाथके मोतियोंका गुँथा हार सौ-
तिनके गलेमें देख वह हार महादेवजीके हार ( सर्पहार ) सा
हुआ । व्याघातालंकार [ दोहा-सुखद दुखद होजाय जो
द्वितीयशतक २. (४५)
सो कहिये व्याघात । अपनो गूँथो हारभो, दुखद महा अन-
खात ] ॥ १२० ॥
सुरँग महावर सौतिपग, निरखरही अनखाय ॥
पियअँगुरिनलाली लखै,खरीउठी लगिजाय १२१
सुंदर अथवा लालरंग महावर सौतिके पांयमें देख प्यारी
महा क्रोधकर स्थितहुई, कारण कि, जो यह मुझे भावैहै तो
प्रीतमकोभी भावैगी, परन्तु जब प्रीतमकी अँगुलियोंमें महा-
वरकी लाली देखी तब तो अधिक आग लगउठी, । अनुगुण
अलंकार ॥ १२१ ॥
स्वकीया स्वाधीनपतिका वर्णन ।
रहो गुणी वेणी लखे, गुहिवेको त्यों नार ।
लागे नीर चुचावने,नीठ सुखाये वार ॥१२२॥
रहनेदो तुमने चोटी गूँथदी और तुम्हारे गूँथनेकी चतुराई
भी देखली, जो बाल हमने निचोडकर सुखायेथे वह पानीसे
चुचाने लगे आशय यह कि,दोनोंको स्पर्शसे सात्विक हुआ ।
परिवृत्तालंकार [ दोहा-परिवृत्त कीजै और कछु, और कछु
बनजाय।गुहिवेको कारज लग्यो, करने नीर चुवाय ] ॥१२२॥
प्रिय प्राणनिकी पाहरू, यत्नकरति नित आप ।
जाकी दुसह दशाभये, मोतिनहू संताप ॥ १२३ ॥
( ४६ ) सतसई-सटीक ।
यह अपने प्रीतमके प्राणोंकी पाहरूहै इसकारण इसके
प्रिय स्वयं सदा इसका यत्न करते हैं, जिसकी दुस्सह दशा देख
कर सौतोंकोभी दुःख हुआ आशय यह कि, इसके प्राण जायँगे
तो प्यारेकाभी मरण होगा। सम्बन्धातिशयोक्ति ॥ १२३ ॥
टुनहाई सब टोलमें, रही जु सौति कहाय !
सुतौ ऐंचिपियआपत्यौं, करीअदोषिलआय १२४
जो टोना करनेवाली सब सखियोंके समूहमें तेरी सौति
बाजरहीथी, सो तैने नायकको वशकर वह सौत बेछूत करदी
लेखांलकार, जो सौतोंका वशीभूत करना कर्म दोषमयथा
टोनाके पदसे वह गुण हुआ, जैसे टुट कहेरी भूतकी छूत दूर-
करै तैसे इसने सौतसे दूरकर निज वशकिया ॥ १२४ ॥
स्वकीया प्रोषितपतिका।
रह्यो ऐंच अन्त न लह्यो, अवधि दुशासनवीर ।
आली वाढति विरह ज्यों, पंचालीको चीर ॥ १२५॥
खैंचरहा है परन्तु अवधिरूप दुःशासनवीरने उसका अन्त
न पाया, हे सखी ! द्रौपदीके चीरके समान मेरा विरह बढता
जाताहै। पूर्णोपमा ॥ १२५ ॥
हिय औरैसी होगई, टरे अवधिके नाम ।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम ॥ १२६ ॥
द्वितीयशतक २. (१७)
अवधिके नाम टलनेसे प्यारी मनमें ओरहीसी होगई और
दूसरे बौरे अर्थात् मौले हुए आमने तो उसे बावलीही करडा-
ला। भेदकातिशयोक्ति ॥ १२६ ॥
छप्यो नेह कागज हिये, भई लखाइ न टांक ।
विरहतचे उघऱ्योसु अब, सैहुँडकोसोआँक १२७
जो कागजरूपी प्रीति निर्मल मनमें छिपी थी और थोडी
भी प्रसिद्ध न हुई सो अब थूहरके दूधके लिखे अक्षरसी
विरहकी आगसे सिककर खुली। पूणो और गलोभांर आया
अक्षर आगपर सेकनेसे चमकते हैं ॥ प्र अलंकार ॥१२७॥
चित तरसत मिलत न बनत, वसाणेश ।
छाती फाटत जात सुनि, टाटी ओटविदेश १२८
मन तरसताहै परन्तु पडोसके घरमेंमिनी इन साधा-
नहीं बनता। टट्टीकी ओटमें लम्बी साँसों जो वर्षाकालमें
जातीहै नायकका वचन सखीसे विशेषो॥ १२८ ॥
रहि हैं चंचल प्राण यह, कहि भनअथ्यौभान।
ललनचलनकीचितधरी, करत मलान ॥ १२६ ॥
सखी अब यह मेरे चंचल प्राण हाथ पकड़ नटने
प्यारेने तो चलनेकी चित्तमें धरी है त होगया दो घडी
ओट होनेसे कल नहीं पड़तीहै, मग..
(४८) सतसई-सटीक ।
अजौं न आये सहज रँग, विरह दूबरे गात ।
अबहीं कहा चलाइयत, ललन चलनकी बात ॥ १३० ॥
जो सहजके रंगथे वह विरहके दुबले शरीरमें अभीतक
नहीं आये. फिर हे कृष्ण ! अभीसे क्या चलनेकी बातचलाते
हो अधैर्याक्षेपालंकार ॥ १३० ॥
पूसमास सुनि सखिनिपै, साईं चलत सवार ।
--गहि कर वीणा पाणि तिय, रोप्यो राग मलार १३१
बाजरहीथी, सो तैने -
लेखांलंकार, जो सौतों योंसे यह वचन सुनकर किं, प्यारे प्रातः-
टोनाके पदसे वह गु लगे, वीणा हाथमेंले नागरीने राग मलार
करै तैसे इसने सौ- यह कि, पूस महीनेके मेघसे अकाल वृष्टि
न नहीं। उपायाक्षेपालंकार ॥ १३१ ॥
रह्यो ऐंच अन्त ने पलनमें, अँसुआ झलके आय।
आली बाढत विर खिन हूं, झूठेही जमुहाय ॥ १३२ ॥
खैंचरहा है परन्तु नतेही पलकोंमें आँसू आ झलके सखियों
न पाया, हे सखी ! द्रोपै, कारण कि, झूठेही जँभाई लेनेलगी ।
जाताहै। पूर्णोपमा ॥ १२
हिय औरैसी होगई, ले, सबसुख संग लगाय ॥
दूजे करि डारी खरीर निशि, पिय मोपास बसाय ॥
द्वितीयशतक २. (४९)
चलते २ प्यारे हमारे सब सुख अपने साथ लेचले केव-
ल गरमीके दिन और शिशिर ऋतुकी रात हमारे साथको
बसा चले, अथवा ग्रीष्मके दिनके समान शिशिरकी रात
हमारे निकट छोड़ चले । लुप्तोत्प्रेक्षालंकार ॥ १३३ ॥
विलखी डबकोहैं चखन,तिय लखि गमन वराय ।
पिय गहवर आयो गरो,राखी गरे लगाय ॥१३४॥
प्यारेके जानेमें व्याकुलहो जब आंखें डबकाने लगीं तब
यह देख प्रीतमने अपना जाना टालदिया,और गलाभरि आया
प्यारीको गलेसे लगा रक्खा । लाटानुप्रास अलंकार ॥१३४॥
वामा भामा कामिनी, कहि बोलो प्राणेश ।
प्यारी कहत लजात नहिं, पावस चलत विदेश॥१३५
हे प्राणपति ! आप मुझे वामा भामा कामिनी इन साधा-
रण नामोंसे पुकारो, प्यारी कहते लजाते नहीं जो वर्षाकालमें
मुझे छोड़ विदेश जातेहो । विचित्रांलंकार ॥ १३५ ॥
मिलचलि चलिमिल मिलचलत, आँगन अथयो भान।
भयो मुहूरत भोरतें, पौरी प्रथम मिलान ॥१३६॥
मिलकर चलते चलकर मिलते फिर हाथ पकड़ चलते
इसप्रकार आँगनके मध्यहीमें सूर्य अस्त होगया दो घडी
( ५० ) सतसई-सटीक ।
प्रातःकालके मुहूर्त्तसे ड्योढीमेंही प्रथम प्रस्थान (डेरा) हुआ
लाटानुप्रास ॥ १३६ ॥
चाहभरी अति रिसभरी, विरहभरी सब बात ॥
कोरि संदेशे दुहुँनके, चले पौरिलौं जात ॥ १३७॥
चाहभरी क्रोधभरी और रिसभरी सब बातें हैं घरसे
ड्योढीतक जानेमें दोनोंके करोड़ संदेशे चले । लाटानुप्रास
अलंकार ॥ १३७ ॥
नये विरह बढती विथा, भई विकल जिय बाल ।
दुखी देख परोसिन्यों, हरषि हँसी तिहि काल १३८
नये विरहकी बढती पीडासे बाल मनमें बहुत व्याकुल
हुई और परोसिनको व्याकुल हुई देखकर उसीसमय हँसपड़ी
आशय यह कि, अपने प्रीतमके गमनमें सौतको दुःखी देख
हँसी । अनुमानालंकार ॥ १३८ ॥
चलत देत आभार सुनि, वही परोसिनि नाह ।
लसी तमासेके दृगन, हांसी आँसुनि माँह ॥ १३९
प्रवत्सत्पतिका और मुदिता, चलते समय उसी परो-
सिनके पतिको घरका भार सौंपता सुनकर आंसूभरे चंचल
नयनोंमें हँसी शोभायमान हुई । प्रहर्षणा और पर्याया-
लंकार ॥ १३९ ॥
द्वितीयशतक २. ( ५१ )
भये बटाऊ नेह तज, वाद वकति बेकाज ।
अब अलि देत उराहनो, उर उपर्जति अतिलाज
हे सखी ! यह तो प्रीति छोड़कर वटोही पथिक होगये तू
विना काज क्यों वकतीहै हे सखी। अब तो उराहना देत मनमें
बहुत लाज उपजतीहै आशय यह कि, स्नेहत्यागी और बटा-
ऊको उराहने देनेमें लाज आतीहै । काव्यलिंगआक्षेपालं-
कार ॥ १४० ॥
स्वकीया आगमलक्षितावर्णन ।
मृगनयनी दृगकी फरक, उर उछाह तनु फूल ।
बिनहीँपियआगम उमँगि, पलटनलगीदुकूल १४१
मृगलोचनीकी वाईँ आँख फड़कतेही उछाहसे शरीर फूल
गया,और विनाही प्रीतमके आगमनके प्रसन्नतासे अपना ओ-
ढना बदलने लगी अर्थात् नया पहरने लगी। अनुमान॥ १४१॥
वामबाहु फरकति मिलैं, जो हरि जीवनमूरि ।
तो तोहीसों भेंटिहौं, राखि दाहिनी दूरि ॥१४२॥
हे बाईं भुजा ! तेरे फड़कनेसे जो मेरे जीवनमूल कृष्ण
मिलजायँ तो दाहिनीभुजाको दूर रखकर तुझहींस आलिंगन
करूंगी । संभावना जोयों आदिपदसे ॥ १४२ ॥
( ५२ ) सतसई-सटीक ।
मलिन देह वेई वसन, मलिन विरहके रूप ।
पिय आगम औरै बढ़ी, आनन ओप अनूप १४३
मैली देह और वेई मलीन वस्त्र विरहके रूपमें हैं, परन्तु
प्रीतमके आगमनसे मुखपर अनूप ज्योति बढ़ी। भेदकांति-
शयोक्ति ॥ १४३ ॥
कियो सयानी सखिनसों, नहिं सयान यह भूल ।
दुरै दुराई फूललों, क्यों पिय आगम फूल ॥ १४४॥
हे आली ! तैने जो सखियोंसे यह चतुराईकी सो यह
तेरी भूल है, प्यारेकी आगमनकी प्रफुल्लता फूलकी सुगंधि
के समान छिपाये नहीं छिपती । पूर्णोपमा ॥ १४४ ॥
रहे बरोठेमें मिलत, पिय प्राणनके ईश ।
आवत आवतकी भई, विधिकी घरी घरीश १४५
द्वारके बाहर जो प्राणनाथ स्नेही जनोंसे मिलने लगे तो
वह आते आतेकी घड़ी प्यारीको ब्रह्माकी घड़ीके समान
हुई । धर्मवाचकलुप्तालंकार ॥ १४५ ॥
भेंटत बनत न भावतो, चित तरसत अतिप्यार ।
धरति उठाय लगाय उर, भूषण वसन हथ्यार ॥
ससुरालमें प्यारेसे मिलनातो बनता नहीं और प्यारसे
चित्त तरसता है, इसकारण उनके भूषण वसन हथियार उठाकर
द्वितीयाशतक २. (५३)
हृदयसे लगाय रखती है। प्रेमालंकार[दोहा-कपट जहाँ नहिं
होय कछु, प्रीति होय भरपूरि ॥ सो प्रेमालंकारहै, जानत हैं
यह सूरि ॥ १४६ ॥
बिछुरे जिये सँकोच यह, मुखते कहत न बन ।
दोऊ दौरि लगे हिये, किये निचोहे नैन ॥१४७॥
बिछुरनेमें जीते रहे, यह बडा संकोच है, मुखसे बैन नहीं
कहेजाते, अन्तमें नीचे नेत्र किये दौड़के दोनों हृदयसे लिप-
टगये । काव्यालिंग ॥ १४७ ॥
ज्यों ज्यों पावक लपटसी, पियहियसों लिपटाति।
त्यों त्यों छुही गुलाबकी, छतियाँ अतिसियराति॥
प्रीतम परदेशसे आकर प्रियासे मिले इसपर सखीका
वचन ज्यों ज्यों अग्निकी लपटसी चाहसे प्रीतमके हृदयसे
लिपटती है, त्यों त्यों गुलाबके छिड़कनेकी भांति प्रीतमकी
छाती बहुत ठंढी होतीजाती है । विभावना पावकते
सियरात ॥ १४८ ॥
आयो मात विदेशते, काहू कह्यो पुकारि ।
सुनि हुलसी विहँसी हँसी, दोऊ दुहुँन निहारि॥
यह मित्र विदेशसे आये ऐसा किसीने पुकारकर कहा,
सुनकर प्रसन्न हुई हँसी, और मुस्काय दोनों दोनोंको देख-
कर आशय यह कि, नायकाकी छाती हुलसी, और बत्तीसी
( ५४ ) सतसई-सटीक ।
विहँसी और आंखें हँसी, मित्रकी प्रीति छिपायेथी सो सखियें
उस समय बैठीथीं इसकारण प्रगट न कहा उपरोक्त चिह्नही
से प्रगट हुई ॥ १४९ ॥
अहै कहै न कहा कह्यो, तोसों नंदकिशोर ।
बडबोली कत होतहै, बड़े दृगनके जोर॥१५०॥
प्यारीके पास कृष्ण आये तब प्यारीने मान किया पीछे
कृष्णको बुलाने भेजा जब सखी आई तब उससे पूछती है
अरी कह तो तुझसे नंदकिशोरने क्या कहा सखी बोली अरी
आंखोंके बलसे बडबोली क्यों होती है, कृष्णको न्यून करके
नंदकिशोर क्यों कहती है । उत्तरालंकार ॥ १५० ॥
यदपि तेज रोहालयर, लगी न पलकौ बार ।
तउ गैंडों घरको भयो, पैंडों कोश हजार १५१
यद्यपि पराक्रमसे प्रीतमका घोडा तेज चलनेवाला है और
आतेमें एक पलभी देर न लगी तोभी गांवका मार्ग आते २
उत्कंठासे सहस्र कोशके समान होगया । विशेषोक्ति॥ १५१॥
नभलाली चाली निशा, चटकाटी धुनि कीन ।
रतिपाली आली अनत, आये वनमालीन १५२
आकाशमें लालीहुई, रात्रि चली, चिडिाएँ और भौंरे बोले
हे आली ! प्रीति कहीं और स्थानमें पाली इससे वनमाली
नहीं आये । वृत्त्यनुप्रास वासकसज्जा वर्णन ॥ १५२ ॥
द्वितीयशतक २. ( ५५ )
झुकिझुकिझपकोंहेंपलक, फिरिफिरिजुरिजमुहाय।
जानिपियागम नींदमिस, दीसबसखीउठाय १५३
झुक २ के पलकें झपकाने लगा वारंवार ऐंडकर जंभाने
लगी पीतमका आगमन जानकर नींदका मिसकर सब
सखी उठादीं। पर्यायोक्ति ॥ १५३ ॥
ज्यों २ आवति निकट निशि, त्यों २ खरी उताल।
झमकि २ टहलें करै, लगी रहचटै बाल॥१५४॥
ज्यों ज्यों रात्रि आतीहै तैसे २ बड़ी उतावलीसे सब
टहल करती है कारण कि, मनोरथका चसका लगा हुआ है।
स्वभावोक्ति । रहचट-सोनेकी चाट ॥ १५४ ॥
फूली फाली फूलसी, फिरति जो विमल विकास ।
भोर तरैयां होहि ते, चलत तोहि पिय पास १५५॥
जोकि ( विमल विकास ) उज्ज्वल ज्योतिसे तेरी सौति
फूली हुई फूलसी फिरती हैं सो तुझे पीतमके पास चलने
देखकर भोरके तारोंके समना क्षीणकान्ति होजायँगी । उपमेय
लुप्ता और वाचकलुप्ता ॥ १५५ ॥
उठि ठक २ ए तो कहा, पावसके अनुमार्ग ।
जानपरेंगी देखियों, दामिनि घन अँधियार १५६
( ५६ ) सतसई-सटीक ।
उठ वर्षाके समय नायकके पास चलनेमें इतनी अडचड़
क्यों है, वहां ऐसी विदित होगी कि, मानो बिजली बादलको
लिये अंधकारमें हैं। भ्रांतालंकार ॥ १५६ ॥
गोप अथाइनितै उठे, गोरज छाई गैल ।
चलिबलिअलिअभिसारिके, भलीसँजोखेसैल ॥
गोप चौबारों से उठे और गायके चरणोंसे उठकर धूलि
पंथमें छाई हे आली ! मैं बलिहारी जाऊं प्रीतमके पास चल,
हे सखी ! अभिसारिकाकी संध्या समय भली सैल है। काव्य-
लिंग ॥ १५७ ॥
छप्योछपाकरछितछयो, तमशशिहरन सँभारि ।
हँसति हँसति चल शशिमुखी,मुखतेआंचरटारि॥
शुक्ला अभिसारिकाको बाटमें जाते चंद्रमा छिपा, इसपर
सखी बोली, छपाकर(चंद्र) छिपा भूमिपर अंधकार छाया, तू
सकुचावे मत, अपनेको सँभालकर चन्द्रका अस्त सँभाल,
हे चन्द्रमुखी ! मुखपरसे घूँघटको हटाकर तू हँसती २ चल
अर्थात् हँसनेसे मुखपरसे घूँघट हटनेसे चाँदनी होगी।काव्य-
लिंगअलंकार ॥ १५८ ॥
सघन कुंज घन घन तिमिर,अधिकअँधेरीराति।
तऊ न दुरिहैश्यामयह,दीप शिखासीजाति १५९
द्वितीयशतक २. ( ५७ )
घनाकुंज है बहुतसे मेघोंका अँधेरा है महाकाली अँधेरी
रात है, हे कृष्ण ! तोभी यह बाला जाती हुई दीपशिखाके
समान नहीं छिपैगी । विशेषोक्ति लुप्तोपमेयसंकर ॥ १५९ ॥
युवति जौन्हमें मिलगई, नैक न होति लखाइ ।
सौंधेके डोरेलगी, अली चली सँगजाइ ॥१६०॥
वह बाला चाँदनीमें मिलगई किंचित् भी नहीं दिखाई
देती सुगंधकी डोरसे लगी सखी बालाके संग चली जाती है।
उन्मीलितालंकार । सुगंधिसे ज्ञान हुआ गौरतासे नहीं १६०॥
निशि अँधियारी नील पट, पहरिचली पियगेह ।
कहो दुराई क्यों दुरै, दीपशिखासी देह ॥१६१॥
अँधेरी रात है नीलपट पहरकर पियाके घर चली [गर्वि-
ताबोली] कहो इसपरभी यह दीपकी शिखासीदेह छिपायेसे
अबभी कैसे छिपेगी । विशेषोक्ति उत्तरालंकार ॥ १६१ ॥
अरी खरी सटपट परी, विधु आधे मग हेरि ।
संगलगे मधुपन लई, भागि न गली अँधेरि १६२
हे सखी ! आधे मार्गमें चन्द्रमाको देखकर मुझे बहुत
व्याकुलता हुई भौंरोंके संग लगनेपर भाग्यहीसे अँधेरी गली
पाई अर्थात् गली अँधेरेमें जाकर भौंरोंसे छुटी । प्रहर्ष-
णालंकार [दोहा-कार्यसिद्ध हो बिन यतन, मनमें हर्ष अपार॥
( ५८ ) सतसई-सटीक ।
ताहि प्रहर्षण कवि कहै, गुणियनको आधार ॥ १६२ ॥
दंपतिदिवाभिसार वर्णन ॥
मिसही मिस आतप दुसह, दई और बहकाय ।
चले ललनमनभावतिहिं,तनुकीछाँहछिपाय १६३
बहानेही बहाने कठिन धूप करदी औरोंको टालदिया
प्रीतमप्यारीको शरीरकी छाँहमें छिपाकर लेचले, आशय यह
किं, परकीया बाला है उसकी कांति छिपानेको वस्त्र उढ़ाय
लेचले। पर्यायोक्ति ॥ १६३ ॥
दम्पतिनिशाभिसारवर्णन ।
मिलि परछाहीं जौन्हसों, रहे दुहुँनके गात ।
हरि राधा इक संगही, चले गलीमें जात ॥ १६४ ॥
जैसे परछाईं चाँदनीमें मिलीहो, इस प्रकार प्रीतम और
प्यारीके शरीर मिले हैं श्रीकृष्ण और राधिका इसप्रकार एक
साथही मिले गलीमें चलेजाते हैं। मिलितालंकार॥१६४॥
स्वकीया खण्डिता ।
पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल ।
आज मिले सुभली करी, भले बनेहो लाल १६५
पलकोंमें पीक, होठोंमें अंजन, माथेपर महावर, लगायेहो
आज मिले सो अच्छी करी, हे कृष्ण ! भले बनेहो धीराधीरा
दूसरा । असंगति अलंकार ॥ १६५ ॥
द्वितीयशतक २. ( ५९ )
मरकत भाजन सलिलगत, इन्दुकलाके वेप ।
झीन झगामें झलमलै, श्यामगात नख रेप १६६
नीलमणिका पात्र जैसे पानीमें पड़ाहो और उसमें चन्द्र-
माकी कलाका प्रतिबिम्ब हो, इसप्रकार पतले झगे (जामे )
में श्याम शरीरके बीच नखकी रेखा चमकतीहै । लुप्तवस्तु-
त्प्रेक्षा ॥ १६६ ॥
वैसी यह जानी परत, झगा ऊजरे माँहिं ।
मृगनैनी लपटी जु हिय, वेणी उपटी बाँहिं । १६७
यह ऊजरे जामेमें वैसीही जानीजातीहै, मृगनैनी जो
हृदयसे लिपटी सो उसकी चोटी बांहमें उपड़आईहै । अनुमा-
नालंकार ॥ १६७ ॥
कत बेकाज चलाइयत, चतुराईकी चाल ।
कहैदेत गुण रावर, सब गुण निर्गुण माल ॥ १६८॥
विनाकाज चतुराईकी रीति क्यों चलानेहो, यह विना
डोरेकी मालाही आपके सब गुण प्रगट कियेदेतीहै, हृदयपर
मालाका चिह्न जो पड़ाहै सो रतिको प्रगट करताहै । विरो-
धाभास ॥ १६८ ॥
तुरत सुरत कैसे दुरत, मूरत नैन जुरि दीठि ।
डाडा दै गुण रावर, कहै कनौडी डीठि ॥ १६९॥
( ६० ) सतसई-सटीक ।
हेप्रीतम ! तुरतका मैथुन किसप्रकार छिपसकताहै, दृष्टि
मिल कर तुम्हारे नेत्र मुरतेहैं, और कनौड़ी दृष्टिही यह तु-
म्हारे दोष ढंढोरा देकर कथन करताह । वृत्यनुप्रासलो-
कोक्ति ॥ १६९ ॥
पावकसों नैननि लग्यो, जावक लाग्यो भाल ।
मुकर होहुगे नकम,मुकुर विलोको लाल ॥१७०॥
आँखोंमें आगसी लगीहै, माथेमें जो महावर लगाहै, थोड़ी
देरमें मुकर जाओगे,इसकारण हेलाल ! तनक दर्पणमें अपना
मुख तो देखो । पूर्णोपमा जमकलाटानुप्रास ॥ १७० ॥
प्राणप्रिया हियमें बसै, नखरेखा शशि भाल ।
भलो दिखायो आन यह, हरिहररूपरसाल १७१
प्राणप्यारी तुम्हारे हृदयमें निवास करतीहै, जैसे विष्णुके
हृदयमें लक्ष्मी, नखकी लकीर शिरपर है जैसे शिवके माथे
पर चन्द्रमा, यह अपना रसाल शिव और विष्णुका भलारूप
दिखाया । रूपकालंकार ॥ १७१ ॥
नखरेखा सोहै नई, अरु सोहै सब गात ।
सौहैं होत न नैन यह, तुम सौहैं कत खात १७२
नवीन नखप्रहारकी रेखा शोभा पातीहै, सब शरीर
आलस्य भरैहैं, और यह नेत्र सामने नहीं होतें फिर तुम सौ-
गन्ध क्यों खातेहो । जमकालंकार ॥ १७२ ॥
द्वितीयशतक २. (६१)
पल सोहैं पग पीकरँग,छल सो हैं सब वैन ।
बल सोहैं कत कीजियत, यह अलसोहैं नैन १७३
पीकके रंगसे पगी पलकें शोभित होतीहैं, और छलसे
तुम्हारी सब बातें शोभितहैं, वलसे सन्मुख यह आलस्य
भरी आँखें क्यों करतेहो । वृत्यनुप्रास ॥ १७३ ॥
पटसों पोंछ परी करो, खरी भयानक वेषि ।
नागनि ह्वै लागति दृगनि, नागवेलिरँगरेषि १७४
वस्त्रसे पोंछकर दूर करो यह तुम्हारा बहुत भयानक
वेषहै, यह तुम्हारी आँखोंमें लगी हुई पानकी रेख मेरी
आँखोंको सांपन होकर काटती है। लुप्तोत्प्रेक्षालंकार॥१७४॥
जिहि भामिनि भूषण रच्यो,चरण महाउर भाल।
उही मनो अँखियां रंगी,ओठनिके रँगलाल १७५
जिस प्रियाने शृंगार बनाय अपने पाँवका महावर तुम्हारे
माथेमें लगाई,उसीने अपने होठोंके रंगसे मानो तुम्हारी आंखें
रंगीहैं, आशय यह कि, उसने मान किया तुम पांव पडे इससे
माथेमें महावर लगगया और रतिमें जागे इससे नेत्र लालहैं ।
वस्तूत्प्रेक्षा असंगति ॥ १७५ ॥
गडेवडेछविछाकिछकि, छिगुनी छोर छुटै न ॥
रहे सुरँगरँग रंगि उही,नहदी महँदी नैन ॥१७६॥
( ६२ ) सतसई-सटीक ।
बड़े छबिके नसेके छककर अर्थात् उसकी सुन्दरताके
मदमें मतवारे होकर कन अंगुरीके छोर गडे छुटते नहीं उसी
नखमें लगाई हुई महँदीसे नेत्र लाल रंगसे रँगरहेहैं। नह-नाखून।
सुरंग-लाल रंग । व्याजोक्ति ॥ १७६ ॥
बेई गड गाडैं परी, उपड्यो हार हिये न ।
आन्यो मोरि मतंग मनु, मार गुरेरनि मैन १७७॥
नायकके आगमनमें सखी वेई गढके गढे पड़ेहैं मोतियोंका
हार छातीमें नहीं उमड़ाहै, मानो कामदेव हाथीको गुलेलोंसे
मारकर फेर लायाहै उसके चिह्न हैं । असिद्धास्पदउत्प्रेक्षा ।
अथवा खण्डिता प्रीतमके हृदयपर परकीया विहारका हार
चिह्न देख यह वचन बोली ॥ १७७ ॥
ह्या न चलै बलि रावरी, चतुराईकी चाल ।
सनख हिये क्षण क्षण नटत,अनख बढावत लाल॥
हे लाल ! यहां आपकी चतुराईकी चाल नहीं चलेगी यह
छातीपर नखके चिह्न लगेहुए छिपाकर मेरा क्रोध क्यों बढ़ा-
तेहो । विरोधाभास ॥ १७८ ॥
कत कहियत दुख देनको,रच रच वचन अलीक ।
सबै कहा उरहै लखै, लाल महाउर लीक॥ १७९॥
हे प्रीतम ! झूठी बातें बनाकर दुःख देनेको क्यों कहतेहो