बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५८ ) सतसई-सटीक ।
ताहि प्रहर्षण कवि कहै, गुणियनको आधार ॥ १६२ ॥
दंपतिदिवाभिसार वर्णन ॥
मिसही मिस आतप दुसह, दई और बहकाय ।
चले ललनमनभावतिहिं,तनुकीछाँहछिपाय १६३
बहानेही बहाने कठिन धूप करदी औरोंको टालदिया
प्रीतमप्यारीको शरीरकी छाँहमें छिपाकर लेचले, आशय यह
किं, परकीया बाला है उसकी कांति छिपानेको वस्त्र उढ़ाय
लेचले। पर्यायोक्ति ॥ १६३ ॥
दम्पतिनिशाभिसारवर्णन ।
मिलि परछाहीं जौन्हसों, रहे दुहुँनके गात ।
हरि राधा इक संगही, चले गलीमें जात ॥ १६४ ॥
जैसे परछाईं चाँदनीमें मिलीहो, इस प्रकार प्रीतम और
प्यारीके शरीर मिले हैं श्रीकृष्ण और राधिका इसप्रकार एक
साथही मिले गलीमें चलेजाते हैं। मिलितालंकार॥१६४॥
स्वकीया खण्डिता ।
पलनि पीक अंजन अधर, धरे महावर भाल ।
आज मिले सुभली करी, भले बनेहो लाल १६५
पलकोंमें पीक, होठोंमें अंजन, माथेपर महावर, लगायेहो
आज मिले सो अच्छी करी, हे कृष्ण ! भले बनेहो धीराधीरा
दूसरा । असंगति अलंकार ॥ १६५ ॥