बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ६२ ) सतसई-सटीक ।
बड़े छबिके नसेके छककर अर्थात् उसकी सुन्दरताके
मदमें मतवारे होकर कन अंगुरीके छोर गडे छुटते नहीं उसी
नखमें लगाई हुई महँदीसे नेत्र लाल रंगसे रँगरहेहैं। नह-नाखून।
सुरंग-लाल रंग । व्याजोक्ति ॥ १७६ ॥
बेई गड गाडैं परी, उपड्यो हार हिये न ।
आन्यो मोरि मतंग मनु, मार गुरेरनि मैन १७७॥
नायकके आगमनमें सखी वेई गढके गढे पड़ेहैं मोतियोंका
हार छातीमें नहीं उमड़ाहै, मानो कामदेव हाथीको गुलेलोंसे
मारकर फेर लायाहै उसके चिह्न हैं । असिद्धास्पदउत्प्रेक्षा ।
अथवा खण्डिता प्रीतमके हृदयपर परकीया विहारका हार
चिह्न देख यह वचन बोली ॥ १७७ ॥
ह्या न चलै बलि रावरी, चतुराईकी चाल ।
सनख हिये क्षण क्षण नटत,अनख बढावत लाल॥
हे लाल ! यहां आपकी चतुराईकी चाल नहीं चलेगी यह
छातीपर नखके चिह्न लगेहुए छिपाकर मेरा क्रोध क्यों बढ़ा-
तेहो । विरोधाभास ॥ १७८ ॥
कत कहियत दुख देनको,रच रच वचन अलीक ।
सबै कहा उरहै लखै, लाल महाउर लीक॥ १७९॥
हे प्रीतम ! झूठी बातें बनाकर दुःख देनेको क्यों कहतेहो