बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५० ) सतसई-सटीक ।
प्रातःकालके मुहूर्त्तसे ड्योढीमेंही प्रथम प्रस्थान (डेरा) हुआ
लाटानुप्रास ॥ १३६ ॥
चाहभरी अति रिसभरी, विरहभरी सब बात ॥
कोरि संदेशे दुहुँनके, चले पौरिलौं जात ॥ १३७॥
चाहभरी क्रोधभरी और रिसभरी सब बातें हैं घरसे
ड्योढीतक जानेमें दोनोंके करोड़ संदेशे चले । लाटानुप्रास
अलंकार ॥ १३७ ॥
नये विरह बढती विथा, भई विकल जिय बाल ।
दुखी देख परोसिन्यों, हरषि हँसी तिहि काल १३८
नये विरहकी बढती पीडासे बाल मनमें बहुत व्याकुल
हुई और परोसिनको व्याकुल हुई देखकर उसीसमय हँसपड़ी
आशय यह कि, अपने प्रीतमके गमनमें सौतको दुःखी देख
हँसी । अनुमानालंकार ॥ १३८ ॥
चलत देत आभार सुनि, वही परोसिनि नाह ।
लसी तमासेके दृगन, हांसी आँसुनि माँह ॥ १३९
प्रवत्सत्पतिका और मुदिता, चलते समय उसी परो-
सिनके पतिको घरका भार सौंपता सुनकर आंसूभरे चंचल
नयनोंमें हँसी शोभायमान हुई । प्रहर्षणा और पर्याया-
लंकार ॥ १३९ ॥