बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. ( ५१ )
भये बटाऊ नेह तज, वाद वकति बेकाज ।
अब अलि देत उराहनो, उर उपर्जति अतिलाज
हे सखी ! यह तो प्रीति छोड़कर वटोही पथिक होगये तू
विना काज क्यों वकतीहै हे सखी। अब तो उराहना देत मनमें
बहुत लाज उपजतीहै आशय यह कि, स्नेहत्यागी और बटा-
ऊको उराहने देनेमें लाज आतीहै । काव्यलिंगआक्षेपालं-
कार ॥ १४० ॥
स्वकीया आगमलक्षितावर्णन ।
मृगनयनी दृगकी फरक, उर उछाह तनु फूल ।
बिनहीँपियआगम उमँगि, पलटनलगीदुकूल १४१
मृगलोचनीकी वाईँ आँख फड़कतेही उछाहसे शरीर फूल
गया,और विनाही प्रीतमके आगमनके प्रसन्नतासे अपना ओ-
ढना बदलने लगी अर्थात् नया पहरने लगी। अनुमान॥ १४१॥
वामबाहु फरकति मिलैं, जो हरि जीवनमूरि ।
तो तोहीसों भेंटिहौं, राखि दाहिनी दूरि ॥१४२॥
हे बाईं भुजा ! तेरे फड़कनेसे जो मेरे जीवनमूल कृष्ण
मिलजायँ तो दाहिनीभुजाको दूर रखकर तुझहींस आलिंगन
करूंगी । संभावना जोयों आदिपदसे ॥ १४२ ॥