बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. ( ५९ )
मरकत भाजन सलिलगत, इन्दुकलाके वेप ।
झीन झगामें झलमलै, श्यामगात नख रेप १६६
नीलमणिका पात्र जैसे पानीमें पड़ाहो और उसमें चन्द्र-
माकी कलाका प्रतिबिम्ब हो, इसप्रकार पतले झगे (जामे )
में श्याम शरीरके बीच नखकी रेखा चमकतीहै । लुप्तवस्तु-
त्प्रेक्षा ॥ १६६ ॥
वैसी यह जानी परत, झगा ऊजरे माँहिं ।
मृगनैनी लपटी जु हिय, वेणी उपटी बाँहिं । १६७
यह ऊजरे जामेमें वैसीही जानीजातीहै, मृगनैनी जो
हृदयसे लिपटी सो उसकी चोटी बांहमें उपड़आईहै । अनुमा-
नालंकार ॥ १६७ ॥
कत बेकाज चलाइयत, चतुराईकी चाल ।
कहैदेत गुण रावर, सब गुण निर्गुण माल ॥ १६८॥
विनाकाज चतुराईकी रीति क्यों चलानेहो, यह विना
डोरेकी मालाही आपके सब गुण प्रगट कियेदेतीहै, हृदयपर
मालाका चिह्न जो पड़ाहै सो रतिको प्रगट करताहै । विरो-
धाभास ॥ १६८ ॥
तुरत सुरत कैसे दुरत, मूरत नैन जुरि दीठि ।
डाडा दै गुण रावर, कहै कनौडी डीठि ॥ १६९॥