बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. (४९)
चलते २ प्यारे हमारे सब सुख अपने साथ लेचले केव-
ल गरमीके दिन और शिशिर ऋतुकी रात हमारे साथको
बसा चले, अथवा ग्रीष्मके दिनके समान शिशिरकी रात
हमारे निकट छोड़ चले । लुप्तोत्प्रेक्षालंकार ॥ १३३ ॥
विलखी डबकोहैं चखन,तिय लखि गमन वराय ।
पिय गहवर आयो गरो,राखी गरे लगाय ॥१३४॥
प्यारेके जानेमें व्याकुलहो जब आंखें डबकाने लगीं तब
यह देख प्रीतमने अपना जाना टालदिया,और गलाभरि आया
प्यारीको गलेसे लगा रक्खा । लाटानुप्रास अलंकार ॥१३४॥
वामा भामा कामिनी, कहि बोलो प्राणेश ।
प्यारी कहत लजात नहिं, पावस चलत विदेश॥१३५
हे प्राणपति ! आप मुझे वामा भामा कामिनी इन साधा-
रण नामोंसे पुकारो, प्यारी कहते लजाते नहीं जो वर्षाकालमें
मुझे छोड़ विदेश जातेहो । विचित्रांलंकार ॥ १३५ ॥
मिलचलि चलिमिल मिलचलत, आँगन अथयो भान।
भयो मुहूरत भोरतें, पौरी प्रथम मिलान ॥१३६॥
मिलकर चलते चलकर मिलते फिर हाथ पकड़ चलते
इसप्रकार आँगनके मध्यहीमें सूर्य अस्त होगया दो घडी