बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें(४८) सतसई-सटीक ।
अजौं न आये सहज रँग, विरह दूबरे गात ।
अबहीं कहा चलाइयत, ललन चलनकी बात ॥ १३० ॥
जो सहजके रंगथे वह विरहके दुबले शरीरमें अभीतक
नहीं आये. फिर हे कृष्ण ! अभीसे क्या चलनेकी बातचलाते
हो अधैर्याक्षेपालंकार ॥ १३० ॥
पूसमास सुनि सखिनिपै, साईं चलत सवार ।
--गहि कर वीणा पाणि तिय, रोप्यो राग मलार १३१
बाजरहीथी, सो तैने -
लेखांलंकार, जो सौतों योंसे यह वचन सुनकर किं, प्यारे प्रातः-
टोनाके पदसे वह गु लगे, वीणा हाथमेंले नागरीने राग मलार
करै तैसे इसने सौ- यह कि, पूस महीनेके मेघसे अकाल वृष्टि
न नहीं। उपायाक्षेपालंकार ॥ १३१ ॥
रह्यो ऐंच अन्त ने पलनमें, अँसुआ झलके आय।
आली बाढत विर खिन हूं, झूठेही जमुहाय ॥ १३२ ॥
खैंचरहा है परन्तु नतेही पलकोंमें आँसू आ झलके सखियों
न पाया, हे सखी ! द्रोपै, कारण कि, झूठेही जँभाई लेनेलगी ।
जाताहै। पूर्णोपमा ॥ १२
हिय औरैसी होगई, ले, सबसुख संग लगाय ॥
दूजे करि डारी खरीर निशि, पिय मोपास बसाय ॥