बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. (४५)
सो कहिये व्याघात । अपनो गूँथो हारभो, दुखद महा अन-
खात ] ॥ १२० ॥
सुरँग महावर सौतिपग, निरखरही अनखाय ॥
पियअँगुरिनलाली लखै,खरीउठी लगिजाय १२१
सुंदर अथवा लालरंग महावर सौतिके पांयमें देख प्यारी
महा क्रोधकर स्थितहुई, कारण कि, जो यह मुझे भावैहै तो
प्रीतमकोभी भावैगी, परन्तु जब प्रीतमकी अँगुलियोंमें महा-
वरकी लाली देखी तब तो अधिक आग लगउठी, । अनुगुण
अलंकार ॥ १२१ ॥
स्वकीया स्वाधीनपतिका वर्णन ।
रहो गुणी वेणी लखे, गुहिवेको त्यों नार ।
लागे नीर चुचावने,नीठ सुखाये वार ॥१२२॥
रहनेदो तुमने चोटी गूँथदी और तुम्हारे गूँथनेकी चतुराई
भी देखली, जो बाल हमने निचोडकर सुखायेथे वह पानीसे
चुचाने लगे आशय यह कि,दोनोंको स्पर्शसे सात्विक हुआ ।
परिवृत्तालंकार [ दोहा-परिवृत्त कीजै और कछु, और कछु
बनजाय।गुहिवेको कारज लग्यो, करने नीर चुवाय ] ॥१२२॥
प्रिय प्राणनिकी पाहरू, यत्नकरति नित आप ।
जाकी दुसह दशाभये, मोतिनहू संताप ॥ १२३ ॥