बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४६ ) सतसई-सटीक ।
यह अपने प्रीतमके प्राणोंकी पाहरूहै इसकारण इसके
प्रिय स्वयं सदा इसका यत्न करते हैं, जिसकी दुस्सह दशा देख
कर सौतोंकोभी दुःख हुआ आशय यह कि, इसके प्राण जायँगे
तो प्यारेकाभी मरण होगा। सम्बन्धातिशयोक्ति ॥ १२३ ॥
टुनहाई सब टोलमें, रही जु सौति कहाय !
सुतौ ऐंचिपियआपत्यौं, करीअदोषिलआय १२४
जो टोना करनेवाली सब सखियोंके समूहमें तेरी सौति
बाजरहीथी, सो तैने नायकको वशकर वह सौत बेछूत करदी
लेखांलकार, जो सौतोंका वशीभूत करना कर्म दोषमयथा
टोनाके पदसे वह गुण हुआ, जैसे टुट कहेरी भूतकी छूत दूर-
करै तैसे इसने सौतसे दूरकर निज वशकिया ॥ १२४ ॥
स्वकीया प्रोषितपतिका।
रह्यो ऐंच अन्त न लह्यो, अवधि दुशासनवीर ।
आली वाढति विरह ज्यों, पंचालीको चीर ॥ १२५॥
खैंचरहा है परन्तु अवधिरूप दुःशासनवीरने उसका अन्त
न पाया, हे सखी ! द्रौपदीके चीरके समान मेरा विरह बढता
जाताहै। पूर्णोपमा ॥ १२५ ॥
हिय औरैसी होगई, टरे अवधिके नाम ।
दूजे करि डारी खरी, बौरी बौरे आम ॥ १२६ ॥