बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. (४३)
कि, इसको महावरतक लगाना नहीं आता, पीछे उसे हँसता
देखकर जाना कि, यह प्रीतमने लगाया है, उसके हाथ
काँपनेसे यह फैल गया है। तृतीय विषमालंकार (इष्टसे अ-
निष्टमाना) ॥११५॥
छला परोसिनि हाथते, छलकर लियो पिछानि।
पियहिदिखायोलखिबिलखि,रिससूचकमुसकानि॥
प्यारेका छल्ला पहँचानकर पडोसनके हाथसे छलकरके
लेलिया बिलखकर प्रीतमको दिखाया और क्रोधसूचक मुस-
कानसे दुःखी हुई। पर्यायोक्ति अलंकार ॥११६॥
बिलखी लखै खरी खरी, भरी अनख वैराग।
मृगनैनी सैनन भजै, लखि वेणीके दाग॥११७॥
अनमनीहो खडी हुई बहुत क्रोध और उदासीसे देखने
लगी, मृगलोचनी प्यारी प्यारेकी सेजमें और स्त्रीकी चोटीका
चिह्न देखकर सेजपर जानेकी इच्छा नहीं करती। काव्य-
लिंग ॥११७॥
ढीठ परोसिन ईठ ह्वै, कहै जु गहै सयान ॥
सवै सँदेशै कहि कह्यो, मुसकाहटमें मान॥११८
ढीठ पडोसिनने चतुराई पकड़कर दृष्टतासे प्यारेके सब
संदेश कहकर कहा मुसकाहटमें मान न चाहिये, आशय यह