बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्वितीयशतक २. ( ५५ )
झुकिझुकिझपकोंहेंपलक, फिरिफिरिजुरिजमुहाय।
जानिपियागम नींदमिस, दीसबसखीउठाय १५३
झुक २ के पलकें झपकाने लगा वारंवार ऐंडकर जंभाने
लगी पीतमका आगमन जानकर नींदका मिसकर सब
सखी उठादीं। पर्यायोक्ति ॥ १५३ ॥
ज्यों २ आवति निकट निशि, त्यों २ खरी उताल।
झमकि २ टहलें करै, लगी रहचटै बाल॥१५४॥
ज्यों ज्यों रात्रि आतीहै तैसे २ बड़ी उतावलीसे सब
टहल करती है कारण कि, मनोरथका चसका लगा हुआ है।
स्वभावोक्ति । रहचट-सोनेकी चाट ॥ १५४ ॥
फूली फाली फूलसी, फिरति जो विमल विकास ।
भोर तरैयां होहि ते, चलत तोहि पिय पास १५५॥
जोकि ( विमल विकास ) उज्ज्वल ज्योतिसे तेरी सौति
फूली हुई फूलसी फिरती हैं सो तुझे पीतमके पास चलने
देखकर भोरके तारोंके समना क्षीणकान्ति होजायँगी । उपमेय
लुप्ता और वाचकलुप्ता ॥ १५५ ॥
उठि ठक २ ए तो कहा, पावसके अनुमार्ग ।
जानपरेंगी देखियों, दामिनि घन अँधियार १५६