बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५६ ) सतसई-सटीक ।
उठ वर्षाके समय नायकके पास चलनेमें इतनी अडचड़
क्यों है, वहां ऐसी विदित होगी कि, मानो बिजली बादलको
लिये अंधकारमें हैं। भ्रांतालंकार ॥ १५६ ॥
गोप अथाइनितै उठे, गोरज छाई गैल ।
चलिबलिअलिअभिसारिके, भलीसँजोखेसैल ॥
गोप चौबारों से उठे और गायके चरणोंसे उठकर धूलि
पंथमें छाई हे आली ! मैं बलिहारी जाऊं प्रीतमके पास चल,
हे सखी ! अभिसारिकाकी संध्या समय भली सैल है। काव्य-
लिंग ॥ १५७ ॥
छप्योछपाकरछितछयो, तमशशिहरन सँभारि ।
हँसति हँसति चल शशिमुखी,मुखतेआंचरटारि॥
शुक्ला अभिसारिकाको बाटमें जाते चंद्रमा छिपा, इसपर
सखी बोली, छपाकर(चंद्र) छिपा भूमिपर अंधकार छाया, तू
सकुचावे मत, अपनेको सँभालकर चन्द्रका अस्त सँभाल,
हे चन्द्रमुखी ! मुखपरसे घूँघटको हटाकर तू हँसती २ चल
अर्थात् हँसनेसे मुखपरसे घूँघट हटनेसे चाँदनी होगी।काव्य-
लिंगअलंकार ॥ १५८ ॥
सघन कुंज घन घन तिमिर,अधिकअँधेरीराति।
तऊ न दुरिहैश्यामयह,दीप शिखासीजाति १५९