बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)
Bihari Satsai with Hindi Commentary
महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ५४ ) सतसई-सटीक ।
विहँसी और आंखें हँसी, मित्रकी प्रीति छिपायेथी सो सखियें
उस समय बैठीथीं इसकारण प्रगट न कहा उपरोक्त चिह्नही
से प्रगट हुई ॥ १४९ ॥
अहै कहै न कहा कह्यो, तोसों नंदकिशोर ।
बडबोली कत होतहै, बड़े दृगनके जोर॥१५०॥
प्यारीके पास कृष्ण आये तब प्यारीने मान किया पीछे
कृष्णको बुलाने भेजा जब सखी आई तब उससे पूछती है
अरी कह तो तुझसे नंदकिशोरने क्या कहा सखी बोली अरी
आंखोंके बलसे बडबोली क्यों होती है, कृष्णको न्यून करके
नंदकिशोर क्यों कहती है । उत्तरालंकार ॥ १५० ॥
यदपि तेज रोहालयर, लगी न पलकौ बार ।
तउ गैंडों घरको भयो, पैंडों कोश हजार १५१
यद्यपि पराक्रमसे प्रीतमका घोडा तेज चलनेवाला है और
आतेमें एक पलभी देर न लगी तोभी गांवका मार्ग आते २
उत्कंठासे सहस्र कोशके समान होगया । विशेषोक्ति॥ १५१॥
नभलाली चाली निशा, चटकाटी धुनि कीन ।
रतिपाली आली अनत, आये वनमालीन १५२
आकाशमें लालीहुई, रात्रि चली, चिडिाएँ और भौंरे बोले
हे आली ! प्रीति कहीं और स्थानमें पाली इससे वनमाली
नहीं आये । वृत्त्यनुप्रास वासकसज्जा वर्णन ॥ १५२ ॥