सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

बिहारी सतसई (महाकवि बिहारीलाल - लाला भगवानदीन कृत सविastार हिन्दी टीका सहित)

Bihari Satsai with Hindi Commentary

महाकवि बिहारीलाल (टीकाकार: लाला भगवानदीन) द्वारा

DevanagariHindipublished290 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 290 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 106

द्वितीयाशतक २. (५३)
हृदयसे लगाय रखती है। प्रेमालंकार[दोहा-कपट जहाँ नहिं
होय कछु, प्रीति होय भरपूरि ॥ सो प्रेमालंकारहै, जानत हैं
यह सूरि ॥ १४६ ॥
बिछुरे जिये सँकोच यह, मुखते कहत न बन ।
दोऊ दौरि लगे हिये, किये निचोहे नैन ॥१४७॥
बिछुरनेमें जीते रहे, यह बडा संकोच है, मुखसे बैन नहीं
कहेजाते, अन्तमें नीचे नेत्र किये दौड़के दोनों हृदयसे लिप-
टगये । काव्यालिंग ॥ १४७ ॥
ज्यों ज्यों पावक लपटसी, पियहियसों लिपटाति।
त्यों त्यों छुही गुलाबकी, छतियाँ अतिसियराति॥
प्रीतम परदेशसे आकर प्रियासे मिले इसपर सखीका
वचन ज्यों ज्यों अग्निकी लपटसी चाहसे प्रीतमके हृदयसे
लिपटती है, त्यों त्यों गुलाबके छिड़कनेकी भांति प्रीतमकी
छाती बहुत ठंढी होतीजाती है । विभावना पावकते
सियरात ॥ १४८ ॥
आयो मात विदेशते, काहू कह्यो पुकारि ।
सुनि हुलसी विहँसी हँसी, दोऊ दुहुँन निहारि॥
यह मित्र विदेशसे आये ऐसा किसीने पुकारकर कहा,
सुनकर प्रसन्न हुई हँसी, और मुस्काय दोनों दोनोंको देख-
कर आशय यह कि, नायकाकी छाती हुलसी, और बत्तीसी